चीयरलीडर्स मतलब छोटे कपड़ों में अशालीन नुमाइश

संजय श्रीवास्तव  
पिछले साल आईपीएल-6 में जब फिक्सिंग को लेकर खासा हायतौबा मचा और बीसीसीआई के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन को अपनी जगह जगमोहन डालमिया को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना पड़ा था. तब डालमिया ने दो काम किए थे-चीयरलीडर्स पर रोक और आईपीएल में देर रात की पार्टियों पर पाबंदी.
आईपीएल-7 में ये दोनों ही पाबंदियां कैसे हट गईं-ये हैरत का विषय है. चीयरलीडर्स का जलवा आईपीएल-7 में फिर शवाब पर है. अप्रैल के दूसरे पखवाड़ें में जब आईपीएल संयुक्त अरब अमीरात के तीन शहरों- अबूधाबी, दुबई और शारजाह में शुरू हुआ तो चीयरलीडर्स की वेशभूषा और मुद्राएं दोनों काफी शालीन थे. ग्लैम डॉल्स सिर से लेकर पैर तक कपड़ों में ढकी थीं. हर शाट के साथ उत्साह का प्रदर्शन करते हुए थिरकती तो थीं लेकिन संतुलित तरीके से. ये बदला हुआ रूप सुखद था. लगा कि अब तक चीयरलीडर्स पर मचते रहे हो-हल्ले के बाद शायद बीसीसीआई ने सीख ले ली है. आईपीएल फ्रेंचाइजी को खास दिशा-निर्देश दिए गए हैं. लेकिन ऐसा था नहीं अगर चीयरलीडर्स सलीकेदार नजर आ रही थीं तो कारण संयुक्त अरब अमीरात के कानून थे, जहां महिलाओं की वेशभूषा को लेकर कड़े कानून हैं. लिहाजा इनके चलते आईबॉल्स कही जाने वाली चीयरलीडर्स को शालीनता के दायरे में रहने की ताकीद दी गई.  ज्योंही आईपीएल दूसरे चरण में भारत पहुंचा, चीयरलीडर्स के अंदाज और जलवे एकदम बदल गए. जहां यूएई में वो सभी अपने हाथ-पैरों को पूरी तरह ढक कर रखती थीं वहीं भारत में वह छोटे से छोटे स्कर्ट और तंग ब्लाउज में नजर आने लगीं. कुछ फ्रेंचाइजी ने तो चीयरलीडर्स की स्कर्ट इतनी छोटी कर दी कि देखकर लगा कि क्या वास्तव में उन्हें स्कर्ट पहनने की भी जरूरत है. केवल कपड़े ही छोटे नहीं हुए बल्कि इनकी भाव-भंगिमाएं और मुद्राएं भी बदल गईं. हर शॉट और आउट के बाद थिरकन भोंडे इजहार में बदल गई.
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आईपीएल के कमिश्नर रंजीब बिश्वाल कहते हैं, ” आईपीएल में कभी चीयरलीडर्स पर रोक थी ही नहीं.” लिहाजा वह आईपीएल में चीयरलीडर्स के होने को एकदम जाएज ठहराते हैं. बताना जरूरी है कि आईपीएल में इसी रोक के चलते पिछले साल चैंपियंस ट्राफी टी20 के दौरान पहली बार चीयरलीडर्स नजर नहीं आईं थीं. आईपीएल की फ्रेंचाइजी भी आमतौर पर मानकर चल रही थीं कि इस बार लीग में उन्हें चीयरलीडर्स रखने की जरूरत नहीं होगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. आईपीएल से ठीक पहले सभी फ्रेंचाइची के पास सूचना भेजी गई कि फ्रेंचाइचीज को अपनी चीयरलीडर्स को तैयार रखना है. आईपीएल फ्रेंचाइजी से जुड़े एक अधिकारी कहते हैं, ” आईपीएल-7 से ठीक पहले हमें सूचित किया गया कि चीयरलीडर्स पर प्रतिबंध नहीं है.”
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हालांकि ये जवाब किसी के पास नहीं कि संयुक्त अरब अमीरात में हुए आईपीएल की चीयरलीडर्स और अब भारत में चीयर कन्याओं के अंदाज औऱ पहनावे में इतना अंतर क्यों और कैसे आ गया. क्या इसलिए कि उनके सामने यूएई के कानूनों का भय था और अब भारत में उन्हें मालूम है कि कुछ नहीं होने वाला। कुछ  फ्रेंचाइजी की चीयरलीडर्स के बेहद छोटे औऱ तंग कपड़े वाकई सवाल खड़ा करते हैं.
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भारत में आईपीएल के पहले संस्करण से ही चीयरलीडर्स के पहनावे को लेकर बखेड़ा खड़ा होता रहा है. आईपीएल के पहले दो सीजन में तो इन चीयरलीडर्स के बोल्ड हावभाव और कम कपड़ों को लेकर खासा एतराज हुआ, तब कुछ फ्रेंचाइचीज ने अपनी चीयरलीडर्स को पारंपरिक भारतीय अंदाज में पेश करना शुरू किया.  पुणे वारियर्स की चीयरलीडर्स विशुद्ध भारतीय और मराठी संस्कृति में ढली दिखने लगीं और पारंपरिक मराठी लोकनृत्य करती थीं तो चेन्नई सुपर किंग्स की चीयरलीडर्स भरत नाट्यम के परिधान में होती थीं. ये हर शाट या गतिविधि पर पारंपरिक नृत्य के अंदाज में थिरकती थीं. तब किंग्स इलेवन पंजाब और दिल्ली डेयर डेविल्स जैसी टीमों ने भांगड़ा टोली बनाई हुई थी, जिनके रंग बिरंगे कपड़ों और ढोल की थाप के साथ भांगड़ा की थिरकन सबको मस्त कर देती थीं. कोलकाता नाइट राइडर्स की बालाएं पूरी साड़ी में होती थीं और रविंद्र संगीत पर नृत्य करती थीं. लेकिन  वो सब अब बीती बात हो चली है. चीयरलीडर्स उसी अंदाज में रू-ब-रू हैं, जिन्हें लेकर कुछ साल पहले काफी आपत्ति जताई जाती रही थी. चीयरलीडर्स को लगातार उत्तेजक ड्रेस और अंदाज में पेश करने में न पहले रायल चैलेंजर्स बेंगलूर, कोलकाता नाइट राइडर्स, राजस्थान रॉयल्स का कोई सानी था और न आज है.
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खेलों को ग्लैमरस बनाने के लिए दुनियाभर में पहल की जा रही है। खेल का अर्थतंत्र जब से टीवी प्रसारण और स्पांसर्स से जुड़ा है, उसके तौर तरीके बदल गये हैं। तमाम खेलों में खेल अधिकारी इन्हें ग्लैमरस लुक देने में जुटे हैं. टेनिस में पहले से ग्लैमरस खिलाडिय़ों की बाढ़ आई हुई है, उसकी खिलाड़ी ग्लैमरस पोशाकों में तो कोर्ट में नजर आती ही हैं. खेलों में ग्लैमर लाने के लिए ही बास्केटबाल, इंग्लिश प्रीमियर फुटबाल लीग में चीयरलीडर्स का प्रचलन शुरू हुआ। अब तो हाल ये है कि अमेरिका और यूरोप की तमाम खेल प्रतियोगिताओं में चीयरलीडर्स की ड्रेसेज, अंदाज, प्रस्तुति में काफी स्पर्धा होने लगी है.
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पिछले दिनों ड्रेस को ही लेकर बैडमिंटन में भी हंगामा बरपा था. वर्ल्ड  बैडमिंटन फेडरेशन ने तीन साल पहले महिला बैडमिंटन खिलाडिय़ों के लिए कोर्ट पर स्कर्ट पहनने का नियम लागू कर दिया था। बैडमिंटन फेडरेशन का  कहना था कि उसके इस नियम से खेल ज्यादा आकर्षक हो जायेगा और उसकी लोकप्रियता बढ़ेगी। इसका बहुत विरोध हुआ। आखिरकार वर्ल्ड बैडमिंटन फेडरेशन को इस नियम को रद्द करना पड़ा. कार रेसिंग और मोटरबाइक का कोई भी अंतरराष्ट्रीय इवेंट सुंदर मॉडल लड़कियों के बिना पूरा नहीं होता. भारत में एक बड़ी टायर कंपनी द्वारा स्पांसर की जाने वाली नेशनल कार रेसिंग चैंपियनशिप में एस्कोर्ट के तौर पर इस्तेमाल की जानी वाली सुंदर मॉडल्स विदेशों से बुलाई जाती हैं.
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वर्ष 2008 में जब आईपीएल की शुरुआत हुई तो उसमें क्रिकेट से कहीं ज्यादा बड़ा आकर्षण चीयरलीडर्स थीं। विदेशों से आई ये चीयरलीडर्स जब अपने छोटे और तंग कपड़ों में मोहक अंदाज में ठुमके लगाती थीं तो स्टेडियम में एक अजीब सी सनसनी मच जाती थी। टीवी के सामने लोग भी उनके आने का इंतजार करते रहते थे। कुल मिलाकर चीयरलीडर्स ने ऐसा गजब का समां बांधा कि वो अब आईपीएल की पहचान बन गई हैं. वैसे बहुत से सामाजिक संगठनों  ने उनके डांस मूवमेंट, अदाओं और कम कपड़ों पर नाराजगी भी जाहिर की. चीयरलीडर्स को लेकर संसद तक में सवाल उठाये गए. लेकिन हकीकत थी कि आईपीएल की गजब की सफलता को चीयरलीडर्स से किनारे करके देखा ही नहीं जा सकता.
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ज्यादार ये स्पाइस बालाएं अमरीका और पूर्व सोवियत देशों से आती हैं. दो महीने के आईपीएल में वो खासा पैसा कमाकर वापस अपने देश लौटती हैं. चीयरलीडर्स का ग्लैमर लोगों के दिलों पर भी बिजलियां गिराता है। आईपीएल के पहले तीन सीजन में टिकट खरीदकर स्टेडियम आने वाले पुरुष इस बात को स्वीकार करते थे कि वो खेल से कहीं ज्यादा इन ग्लैम गल्र्स को देखने आये हैं। आईपीएल के बाद चलने वाली देर रात की पार्टियों में भी धनी लोग इनका सानिध्य हासिल करने के लिए धन की थैलियों का मुंह खोल देते थे। इन पार्टियों में चीयरलीडर्स से सटने के चक्कर में कई बार अप्रिय हरकतें हुईं। यहां तक क्रिकेटर भी इनके साथ गलबहियां करने से खुद को नहीं रोक पाते थे। आईपीएल-३ में इसी बात को लेकर एक बड़ा विवाद ही छिड़ गया। मुंबई इंडियंस के लिए दक्षिण अफ्रीका से आई एक चीयर लीडर गैब्रिएला पासाक्यूलोटो  लगातार इन लेटनाइट पार्टीज के हाल पर अपना ब्लाग लिखा करती थी। इसी ब्लाग में उसने कुछ क्रिकेटरों का कच्चा चिट्ठा भी खोल डाला कि ये क्रिकेटर किस तरह इन पार्टीज में चीयरलीडर्स के इर्द गिर्द मंडराते हैं, अशालीन हरकतें करने से भी बाज नहीं आते। गैब्रिएला के ब्लॉग को एक बड़े पोर्टल ने जब लिंक कर दिया तो ब्लॉग की बातें बड़े पैमाने पर लोगों के बीच सार्वजनिक हो गईं। बस फिर इसके बाद तो मुंबई इंडियंस फ्रेंचाइजी ने तुरंत उस चीयरलीडर का बोरिया बिस्तर बंधवाकर उसे वापस भेज दिया। लेकिन उस आईपीएल के बाद देर रात की पार्टियों पर भी ब्रेक लग गया।
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वैसे आईपीएल को कम ही लोग विशुद्ध खेल मानते हैं. हर किसी की नजर में ये तीन घंटे के फिल्मी शो की तरह है. पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू कहते हैं ये मसालेदार फिल्म की तरह है, जिसमें लोगों को फिल्म की बांधने के सारे तत्व हैं। वो मौज भी लेते हैं-जब वनडे  क्रिकेट आया तो लोगों ने इसे पाजामा क्रिकेट कहा, जब ट्वेंटी20 आया तो इसे हाफ पेंट कहा गया लेकिन इंतजार करिये कहीं इससे भी आगे की और मसालेदार क्रिकेट भी न आ पहुंचे। बालीवुड के सुपरहीरो सलमान कहते हैं कि उन्हें तो आईपीएल इसी लिए पसंद है क्योंकि ये फिल्म की तरह है। इसी तरह के विचार तमाम और हस्तियों के भी हैं।
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सही मायनों में 1970  में अमेरिका फुटबाल लीग में चीयरलीडर्स को पहली बार पेश किया गया। तब वहां भी इसकी खासी आलोचना हुई लेकिन मैचों की लोकप्रियता जरूर इससे और ज्यादा बढ़ गई। लिहाजा 19६6 में सुपर बाउल के आयोजन में इनकी मौजूदगी को आधिकारिक तौर पर प्रतियोगिता का हिस्सा बना दिया गया। कह सकते हैं कि तब से चीयरलीडर्स ने लगातार आगे की ओर ही कदम बढ़ाए हैं। एक अनुमान के अनुसार दुनियाभर में एक लाख से कहीं अधिक चीयरलीडर हैं। अमेरिका के स्कूल कालेजों में इनका कोर्स है। कुछ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खासतौर पर इन्हें तैयार करते हैं। इसके लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। यूरीपीय और अमेरिकी मानदंडों के अनुसार एक अच्छे चीयरलीडर को फुटबाल खिलाड़ी सा मजबूत, किसी प्रोफेशनल डासंर का परफेक्ट और जिम्नास्ट की तरह लचीला भी होना चाहिए। हालांकि इन बातों का मिश्रण इसे दुनिया के सबसे खतरनाक प्रोफेशन में शुमार करा देता हैं। बड़े पैमाने पर चीयरलीडर्स चोटों का शिकार होती हैं। कई बार ये चोटें खासी गंभीर भी होती हैं। पश्चिमी देशों में चीयरलीडिंग को आमतौर पर एक खेल ही माना जाता है। इनकी अपनी प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। अर्से से इन्हें ओलंपिक तक में शामिल करने की मांग होती रही हैं।
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बहरहाल कहा जा सकता है कि चीयरलीडर्स का फार्मूला पूरी दुनिया के खेलों में जबरदस्त हिट है। अमेरिका में फुटबाल, बास्केटबाल, बेसबाल, आइस हाकी, कुश्ती, बाक्सिंग और सुपर बाउल के मैच तो अब इनके बिना सोचे भी नहीं जा सकते। ये अपने छोटे आउटफिट, डांसमूव, एरोबिक्स से मैच और इंटरवल के दौरान मनोरंजन में और तडक़ा लगाती हैं। कहा जा सकता है कि दुनिया के सौ से कहीं ज्यादा देशों में चीयरलीडर्स का जादू सिर चढक़र बोल रहा है। इसमें हमारा साम्यवादी पड़ोसी चीन भी है तो रूस सरीखा पूर्व बुर्जुआ देश भी। आस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, मैक्सिको, फिनलैंड…कितने देशों का नाम गिनाया जाये, हर जगह के खेलों के साथ अब मस्त मस्त और शोख अदाओं वाली चीयरगल्र्स या यूं कहिये चीयरलीडर्स फेवीकोल के जोड़ की तरह चस्पां हैं। जैसे जैसे इनकी दीवानगी बढ़ रही है वैसे वैसे ये एक अलग इंडस्ट्री में तब्दील हो रहा है। लेकिन ये भी देखना चाहिए कि मैदान पर चीयरलीडर्स के कपड़ों और भावभंगिमाओं को टीवी औऱ स्टेडियम में हर आयुवर्ग का दर्शक देखता है. लिहाजा  उसका प्रभाव भी सब पर अलग अलग तरीके से पड़ता है. लिहाजा जरूरी है कि चीयरलीडर्स, फ्रेंचाइजी और टीवी प्रसारण कंपनियां ये समझें कि पैसा कमाने के साथ साथ ये देखना भी जरूरी है कि समाज में ऐसा संदेश जाए जो सकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाला हो.
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अमेरिका में चीयरलीडिंग एक बड़ा व्यवसाय है। क्योंकि वहां स्कूल स्तर से ही चीयरलीडर्स काफी लोकप्रिय हैं। इस इंडस्ट्री के साथ म्युजिक, गारमेंट, उपकरण आदि की इंडस्ट्री भी जुड़ी हैं। सालभर में इनकी कमाई करोड़ों में होती है। अमेरिका में होने वाली नेशनल फुटबाल लीग से २५ टीमें जुड़ी हैं। सबकी अपनी अलग चीयरलीडर्स टीमें भी हैं। जो मैदान में दूसरों से अलग दिखने के लिए अपनी जान लड़ा देती हैं। चीयरलीडर्स की एक टीम एक सीजन में एक मिलियन डालर की कमाई करती हैं यानि भारतीय मुद्रा के हिसाब से प्रति सीजन करीब पांच से साढ़े करोड़ रुपये। रायल चैलंेजर बेंगलुर ने ही अमेरिका से रेडस्किन नाम की जिस चीयरलीडर्स टीम को बुलाया है उसे वो करोड़ो रुपये ही देते हैं। अमेरिका में मशहूर चीयरलीडर्स के कैलेंडर हर साल छापे जाते हैं, जो मोटी कीमत के होते हैं और देखते ही देखते बिक जाते हैं। टॉपलैस चीयरलीडर्स कैलेंडर्स की बिक्री भी जबरदस्त तरीके से होती है। २००३ में ईगल नाम के क्लब ने अपनी चीयरलीडर्स का ऐसा ही कैलेंडर करीब 13 डालर में रिलीज किया। इसकी २० हजार कापियां छापी गईं और ये खासी हिट साबित हुईं। इसके अलावा एक खेल सीजन में हर टीम की चीयरलीडर्स कारपोरेट बाक्स द्वारा खासतौर पर किराये पर ली जाती हैं, इनका किराया हर घंटे का ३०० से ५०० डालर तक का होता है। केवल इसी से टीमों की लाखों डालर की कमाई हो जाती है। हमारे देश में चीयरलीडर्स का इस तरह का रोल नहीं है लेकिन कोई हैरानी नहीं कि आगे हमारे ही देश में चीयरलीडर्स बनाने की संस्थाएं सामने आएं या फ्रेंचाइचीज ही उन्हें तैयार करें और उनसे भी मोटा मुनाफा कमाएं।
संजय श्रीवास्तव 
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