|

खेलों को ग्लैमरस बनाने की पहल

संजय श्रीवास्तव 

खेलों को ग्लैमरस बनाने की पहल संजय श्रीवास्तव खेलों को ग्लैमरस बनाने के लिए दुनियाभर में पहल की जा रही है। जब से खेल का अर्थतंत्र टीवी प्रसारण और स्पांसर्स से जुड़ा है, उसके तौर तरीके ही बदल गये हैं। तमाम खेलों में खेल अधिकारी इन्हें ग्लैमरस लुक देने में लगे हैं। टेनिस में तो पहले से ग्लैमरस खिलाडिय़ों की बाढ़ आई हुई है, उसकी खिलाड़ी ग्लैमरस पोशाकों में तो कोर्ट में नजर आती ही हैं, ब्रांड प्रोमोशन में भी बहुत सी टेनिस खिलाडिय़ों ने ग्लैमर गर्ल के रूप में खास जगह बना ली है।

.

एक जमाना था जब क्रिस एवर्ट को कोर्ट पर देखकर लोगों के दिल मचल जाते थे। एवर्ट छोटी स्कर्ट पहनकर कोर्ट पर उतरा करती थीं। उनकी देखादेखी में टेनिस की दूसरी खिलाडिय़ों ने भी यही करना शुरू कर दिया। इसके बाद गैब्रिएला सबातीनी लातीनी खूबसूरती के तौर पर कोर्ट में अवतरित हुईं। दुनियाभर में लोग उनकी सुंदरता के कायल थे। इसके बाद के दौर में अन्ना कोर्निकोवा के चर्चे शुरू हो गये। अन्ना को शायद ही टेनिस में कुछ खास सफलता मिली हो लेकिन टेनिस के जरिए उन्हें ब्रांड्स के साथ करार ज्यादा मिल गये। मारिया शारापोवा और एना इवानाकोविच तो सुंदर भी हैं और जबरदस्त खिलाड़ी भी। दोनों ने ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंटों में सफलता हासिल की, चैंपियन भी बनीं। दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी भी बनीं। अपनी पोशाकों को लेकर सेरना विलियम्स और वीनस विलियम्स भी धमाल मचाती रहती हैं। कुल मिलाकर अपनी टेनिस खिलाडिय़ों के इन तौरतरीकों से टेनिस के आयोजक तो खुश हैं ही, क्योंकि इससे न केवल टेनिस को ज्यादा चर्चाएं मिलती हैं बल्कि एड और ब्राडकास्टिंग रेवेन्यू में खासी बढोतरी भी होती है।

.

खेलों में ग्लैमर लाने के लिए ही बास्केटबाल, इंग्लिश प्रीमियर फुटबाल लीग में चीयरलीडर्स का प्रचलन शुरू हुआ। अब तो हाल ये है कि अमेरिका और यूरोप की तमाम खेल प्रतियोगिताओं में चीयरलीडर्स की ड्रेसेज, अंदाज, प्रस्तुति में भी काफी स्पर्धा होने लगी है, वजह यही है कि इनसे खेलों में ग्लैमर का तडक़ा लगने के बाद खेलों की मार्केटिंग ने केवल बेहतर तरीके से हो जाती है बल्कि खेलों से कमाई के अवसर भी ज्यादा बढ़ जाते हैं।

.

यही सब फार्मूले आईपीएल में भी आजमाये गये। यहां भी अलग अलग टीमों ने अपनी अलग अलग चीयरलीडर्स रखीं। आईपीएल के पहले दो सीजन में तो इन चीयरलीडर्स के बोल्ड हावभाव और कम कपड़ों को लेकर खासा इतराज भी हुआ लेकिन ये प्रयोग हिट रहा। अब भारत में ही चीयरलीडर्स को ही लेकर तमाम प्रयोग जारी हैं। पुणे वारियर्स की चीयरलीडर्स विशुद्ध भारतीय और मराठी संस्कृति में ढली होती हैं और पारंपरिक मराठी लोकनृत्य करती हैं। तो चेन्नई सुपर किंग्स की चीयरलीडर्स भरत नाट्यम के परिधान में होती हैं और इसी पारंपरिक नृत्य में लोगों के सामने पेश होती हैं। तो किंग्स इलेवन पंजाब और दिल्ली डेयर डेविल्स जैसी टीमों ने भांगड़ा टोली बनाई हुई है। जिनके रंग बिरंगे कपड़ों और ढोल की थाप के साथ भांगड़ा की थिरकन सबको मस्त कर देती है। वैसे कुछ टीमें अभी भी उत्तेजक ड्रेस और अंदाज वाली चीयरलीडर्स को पसंद करती हैं, उनमें रायल चैलेंजर्स, बेगलूर, कोलकाता नाइट राइडर्स, राजस्थान रायल्स और डेक्कन चार्जर्स जैसी फ्रेंचाइजी हैं। ये तो थी आईपीएल की बात।

.

पिछले दिनों ड्रेस को ही लेकर बैडमिंटन में हंगामा बरपा. वल्र्ड बैडमिंटन फेडरेशन ने तीन साल पहले महिला बैडमिंटन खिलाडिय़ों के लिए कोर्ट पर स्कर्ट पहनने का नियम तय कर दिया था। इसे लागू करने की तारीफ भी तय हो चुकी थी। बैडमिंटन फेडरेशन का कहना है कि उसके इस नियम से खेल ज्यादा आकर्षक हो जायेगा और उसकी लोकप्रियता बढ़ेगी। इसका बहुत विरोध हुआ। चीनी खिलाडिय़ों ने इसे बेतुका बताया है तो भारत की चोटी की खिलाडी सानिया नेहवाल भी इससे सहमत नहीं नजर आईं। उनका कहना था कि बैडमिंटन में न केवल कोर्ट में तेज मूवमेंट होता है बल्कि जंप भी काफी लगाने होते हैं, एेसे में स्कर्ट पहना बहुत असहज हो जायेगा। भारतीय बैडमिंटन की ग्लैमरस खिलाड़ी ज्वाला गट्टा ने तब कहा कि उन्हें स्कर्ट पहनने में कोई समस्या नहीं लेकिन खिलाडिय़ों के ड्रेस तय करने का अधिकार तो खिलाडिय़ों के पास ही होना चाहिए। स्वीडन के साथ कई और देशों ने इसकी खिलाफत की। आखिरकार वल्र्ड बैडमिंटन फेडरेशन को इस नियम को रद्द करना पड़ा।

.

लेकिन ये भी सच है कि यूरोप और अमेरिका की महिला खिलाडिय़ों ने अपने पहनावे से फैशन को नया रंग दिया है। खेलों का मैदान अक्सर उनके पहनावे से ग्लैमरस दिखता है. कार रेसिंग और मोटरबाइक का कोई भी अंतरराष्ट्रीय इवेंट सुंदर मॉडल लड़कियों के बिना पूरा नहीं होता. भारत में एक बड़ी टायर कंपनी द्वारा स्पांसर की जाने वाली नेशनल कार रेसिंग चैंपियनशिप में एस्कोर्ट के तौर पर इस्तेमाल की जानी वाली सुंदर मॉडल्स विदेशों से बुलाई जाती हैं. लगता है कि खेलों में ग्लैमर को मिक्स करने की प्रवृति बढेगी ही, लेकिन तमाम खेल ऐसे होते हैं, जिनका ग्लैमर से ज्यादा लेना देना नहीं होता, मसलन कुश्ती, भारोत्तोलन और बाक्सिंग …तो ऐसे में इन खेलों का भविष्य क्या होगा। या इन खेलों में भी आने वाले समय में ऐसे ही प्रयोग देखने को मिल सकते हैं।

 

Feed Back 

sanjayratan@gmail.com

Short URL: http://www.wisdomblow.com/hi/?p=977

Posted by on May 9 2014. Filed under Top Story, अंतर्राष्ट्रीय, खेल-कूद, मनोरंजन. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

Leave a Reply

120x600 ad code [Inner pages]
300x250 ad code [Inner pages]

Recently Commented