“बड़बोलों” की विचित्रता

प्रत्युष राज 

देश में पन्द्रहवीं लोकसभा के लिए आम चुनाव जारी हैं। अपनी समस्याओं से निजात पाने के चक्कर में जनता भी इस बार के चुनाव में काफी दिलचस्पी दिखा रही है। सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता का सुख भोगने को बेकरार हैं, प्रचार में कोई कमी न रह जाए इसका पूरा ख्याल रखा जा रहा है और इसके लिए सभी जरुरी साधनों का भरपूर उपयोग किया जा रहा है, पैसा भी पानी की तरह बह रहा है। देश में फिलहाल दो राजनितीक पार्टी ऐसे हैं जो सही मायनों में राष्ट्रीय कहलाने के हकदार हैं और जो पूर्ण बहुमत लाकर, केवल अपने दम पर केंद्र में काबिज़ हो सकते है। हालांकि, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगा कि कोई एक दल चुनाव में अपने दम पर 272 सीटें लाकर केंद्र का राजा बनेगा। इस हकीकत को भी नही नाकारा जा सकता कि भारत में ऐसी हैसियत रखने वाली बस दो ही पार्टी हैं, कांग्रेस और बीजेपी. इस बार के चुनाव में जहां  कॉंग्रेस की साख दाव पर है वहीं भाजपा के लिए भी केंन्द्र में आने का इससे बेहतर मौका शायद कभी नहीं आएगा। दोनों ही पार्टी प्रचार- प्रसार के हर चरण को पास करना चाहती हैं। साम, दाम, दण्ड, भेद, हर फार्मूले पर काम हो रहा है। मतलब साफ है, भाजपा हर विकल्प की गहन पड़ताल कर रही है और कांग्रेस अपनी जमिन बचाने के लिए फिर से वादों की लड़ी लगा रही है। दस साल से लोकसभा में अपने हाथ के बदौलत प्रस्तावों को पास कराने वाली कोंग्रेस- प्रधानमंत्री के दावेदार के बिना ही चुनाव लड़ रही है वहीं नरेन्द्र मोदी के हाथों में कमल पकड़ा कर 10 साल से विपक्ष में बैठ झुंझला चुकी भाजपा भी गद्दी वाली कुर्सी पर बैठने के लिए कमर कस चुकी हैं।

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दिलचस्प सियासी जंग के इस खेल में ओपिनियन पोल का  छौंक भी ऐसा पड़ा की कहीं खुशी कहीं गम के बादल साफ नजर आ रहे हैं। तभी तो जनता की सोच पर वार करने की नौबत आगई है और जनप्रतिनिधी अनरगल बयानबाजी कर रहे हैं। चुनाव जीतने की चाह में अपने असल मुद्दों को गौण कर ये नेता सिधे, देश में भाईचारे और मुहब्बत से जी रही जनता के मस्तिष्क पर ऐसा चोट कर रहे हैं जैसे लगता है कि उन्हें इस भारत से कोई मतलब ही नहीं है। हमारे आज के नेता बस एक ही जुमले को सही बनाने में लगे हैं- (अपना काम बनता ……… में जाए……..).

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हालांकि, इस बार के चुनाव की शुरुआत करप्शन, विकास  और महंगाई  जैसे कुछ अच्छे मुद्दों से हुई पर चुनावी रंग में रंगते ही सारे मुद्दे ऐसे हवा होते जा रहे है जैसे हिमालय की सर्द हवाओं ने उन्हें कहीं दुबक के रहने पर मजबूर कर दिया हो। चुनाव में एकजुटता की बात करने वाले नेता धर्म की बात करने लगे हैं। एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में नेता इतना आगे बढ चुके हैं कि उनके जुबान  से कब क्या  निकल जाए यह शायद उन्हें भी नहीं पता। हिन्दु- मुस्लीम भाईचारे पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं और इतना भी नही समझ रहे कि उनके इन तल्ख बयानों का देश की जनता पर क्या असर पड़ेगा।

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किसी भी पार्टी के नेता हों या कार्यकर्ता, कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने दे रहा, मीडिया में छाये रहने के लिए हर कोई अपनी राय रख दे रहा है। एक बयान आया नहीं की बस बिना कोई देर किये अपनी प्रतिक्रिया उस पर दे देते हैं। नेता जी यह भी नहीं सोचते की किस माहौल में किन वजहों से ऐसा बयान आया है………. बस एक ही पैमाना है कि अगर वह बयान अपने या सहयोगी पार्टी का है तो जहां तक हो उसका समर्थन करना है और खुदा ना खास्ते वही बात विपक्ष से किसी ने कहा है तो बस उस पर टूट पड़ना है।

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देश में सौहाद्र और शान्तिपूर्ण माहोल में चुनाव कराने की जिम्मेदारी देश के चुनाव आयोग की है पर अभी के हालात को देखते हुए ऐसा साफ नजर आ रहा है कि आयोग भी लाचार है। हालांकि, आयोग अपना काम बखूबी कर रहा है और उसने स्थिती को काबू में रखने के लिए कुछ कड़े कदम भी उठाये हैं पर वह पर्याप्त नहीं लग रहे। अगर देश में कानून पर्याप्त होते तो एक के बाद एक ऐसे बयानों की कतार नहीं लगते। पहले दिग्वीजय सिंह, फिर उमा भारती, कपिल सिब्बल, आजम खां, अमित शाह, राज ठाकरे, मुलायम सिंह, बेनी प्रसाद, प्रविण तोगड़िया, शाजिया इल्मी, अरविन्द केजरीवाल, उमर अबदुल्लाह, गीरिराज सिंह, ऐसे दर्जनों नेताओं के नाम की लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने लोगों को उकसाने वाले बयान दिये या अपने तल्ख बयानों से एक दूसरे पर निजी हमले किये या फिर ऐसी हरकते की जिससे वे किसी खास वर्ग को रिझा सकें। पर एक सवाल- क्या फायदा ऐसा कर- कर, जब देश ही टूट कर बिखड़ जायेगा, तो वोट किस नाम पर मांगेगे। अपना ऊललू सीधा करने के चक्कर में लगे माननीय यह क्यों भूल जा रहे हैं कि आखिर उन्हें भी यहीं रहना है।

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इसी क्रम में, हाल में दिये बीजेपी नेता गिरिराज सिंह के बयान का विशलेषण करने पर बस एक ही चिज सामने आती है कि यह महज ही एक सियासी दाव है जिससे यह साबित हो सके कि गिरिराज सूबे में मोदी के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं। यह कुछ हद तक सही भी है तभी तो बिहार में गिरिराज को मोदी का सबसे भरोसेमंद माना जाता हैं। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि गिरि को मनमुताबिक सीट से चुनाव लड़ने की इजाजत पार्टी ने नहीं दी और उन्हें नवादा से चुनाव लड़ना पड़ा, जिस कारण उन्होंने पार्टी अध्यक्ष तक से गुहार लगाई पर किसी ने उनकी एक ना सुनी। बहरहाल, अब जब वहां चुनाव हो गये हैं तब वह बयानबाजी कर के मोदी के और करीब आने की कोशिश कर रहे हैं ताकि भविष्य में उनकी बातों को कोई अनसुना नहीं कर सके या फिर केन्द्र में बीजेपी की सरकार बनने पर गिरिराज मंत्रीमंडल में अपनी जगह अभी से आरक्षीत करने के लिये ऐसा दाव खेल रहे हैं। एक तरफ पार्टी ने उनके बयान पर पल्ला झाड़ लिया हैं और इसे उनका निजी मत करार दिया, वहीं अपने खिलाफ वारंट निकलने पर गिरिराज सिंह फरार चल रहे हैं। इस मजेदार ड्रामे को देख कर एक बात तो साफ है जनाब गिरिराज अपने मनसूबे में सफल साबित हुए क्योंकि मोदी ने उन की सुध ले ली, हालांकि नरेन्द्र भाई ने इशारों- इशारों में उन्हें इस तरह के संकीर्ण बयानों से बचने की नसीहत भी दे दी है।

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इस बार देश में युवा वोटरों की अच्छी संख्या है जो चुप होकर सब देख, सुन और समझ रहे हैं। ये न तो राम मंदिर के लिए लड़ेंगे और नाहीं बाबरी मस्जिद के लिए। ये वोटर अगर सड़कों पर उतरकर अपना खून बहायेंगे तो बस इंसाफ के लिए, भाईचारे के लिए, बहनों की सुरक्षा के लिए, इस देश के विकाश के लिए। इन्हें चाहिए तो बस शांति, तरक्की और खुशहाली अपनी और अपने इस सोने की चिड़िया की। आज का युवा हर पहलु की मोनिटरिंग कर रहा है, इसे आज भी लता ताई के देश भक्ति गाने सुनना और उनके गहराइयों में जाना अच्छा लगता है और हनी भाई के पार्टी वाले रैप भि। बॉलीवुड को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल मानने वाले ये युवा दिग्विजय सिंह, आज़म खान और प्रवीन तोगड़िया जैसे राजनीतिज्ञ के राजनीती से पूरी तरह वाकिफ हैं। ये जानते हैं कि मोदि की शादीशुदा जिन्दगी पर सवाल दागने वाले दिग्विजय की क्या हकीकत हैं। धर्म की राजनिति करने वाले नेताओं के परिवार की क्या हकिकत है। तभी तो इतनी तल्खी बढने पर भी ये युवा शान्त हैं। ये अपना कर्तवय निभाना जानते हैं।

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बहरहाल देश में जिस तरह की बयानबाजी हो रही है और अलगाव पैदा करने की साजिश रची जा रही है ऐसे में एक सवाल जो गूँज रहा है वह यह कि महामहिम राष्ट्रपति इस मामले में हस्तक्षेप क्यों नहीं कर रहे। इससे पहले की इस तरह की बयानबाजी वाले राजनीती का फायदा असामाजिक तत्व उठाये और 2012 के कोकराझाड़ में हुई घटना का मंजर हमें देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिले देश को जरुरत है ऐसे बयानों पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगाने की । मेरा आप सभी लोगों से अनूरोध है कृपया लोगों के बहकावे में ना आयें, अपने विवेक का इस्तमाल करें और शांत रहें, खुश रहें.।

Geography has made us neighbors. History has made us friends. Economics has made us partners, and necessity has made us allies. Those whom God has so joined together, let no man put asunder….- John F Kennedy.

 

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