खेल, खेलने की चीज है या देखने की

संजय श्रीवास्तव
टीवी के दबाव में आखिर हॉकी को बदलना पड़ा. इसके कुछ नियमों और फारमेंट में इस तरह बदलाव किया जाएगा कि ये खेल टीवी पर ज्यादा गतिपूर्ण, रोमांचक औऱ ग्लैमरस लगे।  अंतरराष्ट्रीय खेलों के हिसाब से देखें तो हॉकी पर ओलंपिक से बाहर होने का खतरा मंडरा रहा है। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी ने जिन तीन खेलों को लोकप्रियता के लिहाज से सबसे निचली पायदान पर पाया, उनमें एक हॉकी भी है. लिहाजा इसके बाद हॉकी को बचाने और इसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने की कवायद शुरू हुई। वर्ष 2016 के रियो ओलंपिक के बाद भी हॉकी जिंदा रहे औऱ ओलंपिक खेलों में शामिल रहे। इसी के मद्देनजर फेडरेशन इंटरनेशनल हॉकी (एफआईएच) ने खेल में कुछ बदलाव का फैसला किया.
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ये तय है कि अगर खेलों को जिंदा रहना है तो उन्हें बदलना होगा। इस तरह बदलना होगा कि टेलीविजन ब्राडकास्टिंग के खांचे और अनिवार्यताओं में फिट हो पाए। अगर टीवी पर खेल दर्शनीय और ग्लैमरस हो तो इसकी लोकप्रियता को चार चांद लग सकेगा, इसे ज्यादा दर्शक देखेंगे। टीवी पर ज्यादा टीआरपी हासिल होगी तो रेवेन्यू में उछाल मिलेगी। पिछले कुछ सालों में दुनिया के तमाम खेलों को टीवी के हिसाब से खुद को बदलना पड़ा है।
खैर हॉकी में हो रहे बदलावों की बात की जाए। अब तक हॉकी में 35-35 मिनट के दो हॉफ होते हैं औऱ बीच में दस मिनट का एक इंटरवल होता था. अब नए फारमेंट में एक मैच में 15 -15 मिनट के चार क्वाटर्र होंगे. दो क्वार्टर के बाद एक इंटरवल होगा जो दस मिनट का होगा। पहले क्वार्टर और तीसरे क्वार्टर के बाद दो मिनट का ब्रेक होगा। इसके बाद 40 सेकेंड का टाइमआउट होगा। ये सारे बदलाव एक सितंबर 2014 से लागू हो जाएंगे.
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हालांकि हॉकी इंडिया लीग को इसी नए फारमेट के साथ देश में पिछले दो साल से आय़ोजित किया जा रहा था। ये दर्शकों को पसंद आ रहा था और इसे ब्राडकास्ट करने वाले चैनल को भी। आमतौर पर रात के दूधिया प्रकाश में खेले जाने वाले मैचों में खेल रोमांचक और गतिपूर्ण रहता था. 15 मिनट के चार क्वार्टर खेल की गति तेज करने वाले और खिलाड़ियों की ऊर्जा को बनाए रखने वाले होते थे। अंतरराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन ने फारमेट में बदलाव की प्रेरणा यहीं से ली। शायद अब तक हाकी फेडरेशन खेल को ताकत देने वाले टीवी के प्रभाव को पूरी तरह आंक नहीं पाया था।
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भारत की सुपरहिट लीग आईपीएल से लेकर बेसबाल, बास्केटबाल, फुटबाल तमाम ऐसे खेल हैं जो समय के साथ टीवी के रंग में रंगते चले गए.  दुनियाभर में देखते ही देखते तहलका मचा देने वाली इंडियन प्रीमियर लीग का जब कांसेप्ट तैयार किया जा रहा था तो उसके केंद्र में सबसे पहली बात ये थी कि ये किस तरह से टीवी फ्रेंडली रहेगा यानि देखने में गजब का लगेगा। लिहाजा जितनी आईबॉल्स हो सकती थीं वो सबके सब इसके खांचे में फिट करने की कोशिश की गई। सिनेमा के तीन घंटे के शो सरीखे मैच, रंगीन पोशाकें, टाइमआउट सरीखे ब्रेक, चीयरलीडर्स और बॉलीवुड कनेक्शन। कहना नहीं होगा कि आईपीएल ने जब हकीकत का जामा पहना तो सुपरहिट हो गया। आप इसे डिजाइनर क्रिकेट भी कह सकते हैं। शुरू में जब सेट मैक्स टीवी चैनल ने 1.65 बिलियन डालर देकर नौ साल के लिए इसके प्रसारण अधिकार खरीदे तो लोगों को हैरानी होती थी कि क्या ये टीवी चैनल कभी इतनी बड़ी रकम वापस निकाल पायेगा। लेकिन आईपीएल के शुरुआती चार संस्करणों में ही सेट मैक्स ने एड के जरिए खासी मोटी कमाई कर ली
कुल मिलाकर आईपीएल नये जमाने का विशुद्ध टीवी के लिए बनाया गया खेल है। लेकिन ये मत सोचें ये काम अकेला आईपीएल ही कर रहा है बल्कि यों कह लें कि इसे तैयार करते समय अमेरिकी बेसबाल, बास्केटबाल और इंग्लिश प्रीमियर लीग से पूरी प्रेरणा ली गई। दुनिया की सारी बड़ी खेल लीग्स अब खेल से ज्यादा टीवी की परवाह करती है, उनका पूरा ध्यान इस पर होता है कि उनके मैच टीवी पर किस तरह ज्यादा दर्शनीय और ग्लैमरस नजर आयें। इसे आप खेलों का टेलीविजनकरण या खेलों का दर्शनीकरण भी कह सकते हैं, जहां खेलों से ज्यादा परवाह उनके दिखने की होती है। हां, चूंकि उसके लिए भी सबसे जरूरी शर्त मैदान या कोर्ट पर रोमांच को चरम पर ले जाना होता है, लिहाजा टीमों में बड़े सितारे लिये जाते हैं, उनकी मुंह मांगी कीमत लगाई जाती है। पिछले दो दशकों में अमेरिकी बेसबाल लीग, नेशनल बास्केटबाल एसोशिएसन लीग, इंग्लिश प्रीमियर लीग फुटबाल, यूरोप की दूसरी फुटबाल लीग्स और खुद आईपीएल में खिलाड़ी इतना बेशुमार पैसा पाते हैं कि लोगों की आंखें फटी की फटी रह जाती हैं।
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 इंग्लिश प्रीमियर लीग में क्रिस्टियानो रोनाल्डो, मैसी, रोनाल्डिन्हो और बेखम जैसे सितारों को फुटबाल क्लब इतने मोटे पैसों में खरीदते हैं कि उतने में एक बड़ी कंपनी खड़ी हो जाये, लेकिन यही वो सितारे हैं जो जब फुटबाल में ग्लैमर पैदा करते हैं, जब वो टीवी के जरिए दुनियाभर में दिखते हैं तो बाजार किसी भी कीमत पर पैसा बहाने को आतुर हो जाता है। इससे टीवी की भी बल्ले बल्ले होती है और इन सितारों को लेने वाले क्लबों की भी। दरअसल टीवी पर खेलों के प्रसारण का फायदा ही यही है कि इसके जरिए एक विशाल वर्ग तक पहुंच बेहद आसान हो जाती है।
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जब 1938 में पहली बार अमेरिका में टीवी पर एक यूनिवर्सिटी बास्केटबाल मैच का प्रसारण किया गया, तो इरादा कुछ और था। तब में बहुत कम टीवी सेट थे और टीवी सेटों की बिक्री बढ़ानी थी। टीवी सेटों की बिक्री तेजी से बढने लगी। 1948 में अगर अमेरिका में महज एक लाख 90 हजार सेट थे तो 19५0 के आते आते इनकी संख्या डेढ़ करोड़ के ऊपर जा पहुंची। 1955 में जब पहली बार आस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच डेविस कप टेनिस मैच का रंगीन टीवी प्रसारण किया गया, तो टीवी पर खेलों के एक नये युग की शुरुआत हुई। विज्ञापनदाताओं को भी संभावना दिखाने लगी। मैचों के बीच बीच में टीवी पर विज्ञापन आने लगेे। कहां तो स्पोट्र्स प्रसारण को टीवी पर इसलिए शुरू किया गया था कि इससे टीवी इंडस्ट्री को उछाल मिलेगी, लेकिन अब तक तो तस्वीर ही बदलने लगी, इससे टीवी प्रसारण करने वाली कंपनियों को भी फायदा मिलने लगा। जब खेलों ने ये देखा तो उन्होंने इस फायदे में अपनी कीमत मांगी। प्रसारण के बदले टीवी कंपनियों ने उन्हें एक तय शुल्क देना शुरू कर दिया। यानि पूरी एक अर्थव्यवस्था तैयार हो गई।
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ज्यों ज्यों टीवी प्रसारण की तकनीक बदली, ये ज्यादा उन्नत होने लगी, उसने खेलों की लोकप्रियता और दर्शनीयता को भी और बढ़ाना शुरू किया। साथ ही बाजार को भी और लुभाना शुरू किया। टीवी प्रसारण की अपनी सीमाएं थीं, प्रसारण के बीच में ही विज्ञापनों को दिखाने के लिए भी जगह ढूंढनी थी, लिहाजा टीवी की सीमाओ के लिहाज से खेल बदलने लगे। खिलाडिय़ो को रंगबिरंगी पोशाकें पहनाई जाने लगीं। नियम एेसे बनाये जाने लगे कि खेल ज्यादा तेज और रोमांचक हो जाएं। मैदान और स्टेडियम भी उसी हिसाब से रंग बिरंगे और आकर्षक होने लगे। मैदान की हरियाली या खेल की सतह पर काम होना शुरू हुआ। खेल के बारीक से बारीक लम्हों को पकडऩे के लिए टीवी में नई तकनीक की दरकार जब महसूस हुई तो वो भी आ पहुंची। अब एक मैच को कवर करने के लिए दर्जनों कैमरे लगे रहते हैं। जो मैच के हर क्षण को अलग अलग कोणों से कैच करते हैं, फिर ये पूरा नजारा आधुनिकतम ओबी बैन या प्रोडक्शन कंट्रोल रूम के जरिए लोगो के घरों में टीवी तक पहुंचाया जाता है।
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इस प्रक्रिया में बहुत से वो खेल पीछे छूट गये, जो खुद को टीवी की  दर्शनीयता के अनुकूल नहीं ढल पाये या बाजारवाद और टीवी की शर्तों को मानने में अडिय़ल रहे। अब तक तो पूरी दुनिया जानती है बगैर टीवी के खेलों की जगह ही नहीं। आप लाख तीर चला लें लेकिन अगर उन लम्हों को आप लाखों करोड़ों लोगों तक टीवी के जरिए नहीं पहुंचा पाये तो आप अपना प्रभाव छोडने में बेअसर रहेंगे।
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टेनिस में खेल एक नहीं बल्कि चार पांच तरह की कोर्ट होता है। हर कोर्ट की अलग अलग खासियतें हैं, उनके रंग भी अलग होते हैं, जो टीवी पर ज्यादा दर्शनीय लगते हैं। हाकी लंबे समय तक टीवी के खांचे में फिट नहीं हो पाायी क्योंकि उसमें टीवी के हिसाब से वो बदलाव नहीं किये गये लेकिन अब हाकी में तमाम बदलाव, लीग आधारित प्रतियोगिताओं की शुरुआत इसीलिए हो रही है। टेस्ट क्रिकेट को ज्यादा आकर्षक और टीवी फ्रेंडली बनाने के लिए पहले वन-डे क्रिकेट की शुरूआत हुई और अब ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट ने तो इस खेल में क्रांति ही ला दी है। टीवी पर भी क्रिकेट का ये रूप ज्यादा पसंद आ रहा है। कहा जाता है कि भविष्य की क्रिकेट ट्वेंटी ट्वेंटी ही है।
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फुटबाल, बेसबाल, बास्केटबाल हमेशा से टीवी की पसंद बने रहे और खुद को दर्शनीयता और रोमांच की अनिवार्य शर्तों में ढालने के लिए कदम बढाते रहे। फुटबाल तो दुनिया में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला खेल है। क्रिकेट तेजी से इस ओर कदम बढ़ा रहा है। टीवी रेटिंग और दर्शकों की संख्या के हिसाब से ये दूसरा लोकप्रिय खेल  बन चुका है। टेनिस तीसरे नंबर पर है तो हाकी, बेसबाल, बास्केटबाल और दूसरे खेल उसके बाद।
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यकीनन ये फंडा भले ही अजीब सा लगे कि जो दिखता है वही बिकता है- लेकिन खेलों में तो यही सच्चाई है। कहा जा सकता है कि अब खेल खेलने से कहीं ज्यादा देखने की चीज बन गये हैं। उनकी दर्शनीयता ने ही उनका पूरा अर्थशास्त्र बदला है। बेशक टीवी ने भी खेलों को न केवल ग्लैमराइज किया है बल्कि उसकी रोमांचकता को और बढाया ही है।
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भारत में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले दस खेल
१. क्रिकेट
२. कुश्ती
३. फुटबाल
४. टेनिस
५. गोल्फ
६. कार रेसिंग
७. हॉकी
८. बास्केटबाल
९. बेसबाल
१०. बिलियड्र्स
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टीवी पर खेलों का इतिहास
1938 – पहली बार अमेरिका में यूनिवर्सिटी बास्केटबाल का मैच टीवी पर प्रसारित किया गया
1955- पहली बार अमेरिका और आस्ट्रेलिया के बीच डेविस कप टेनिस मैच का रंगीन प्रसारण किया गया
1955- इसी साल टीवी पर खेलों के तुरंत रिप्ले सिस्टम को पेश किया गया।
1956- रिप्ले को और असरदार किया गया। इसे तीन अलग अलग स्पीड में दिखाने की तकनीक ही नहीं विकसित की गई बल्कि खास मूवमेंट को फ्रीज करने की तकनीक भी विकसित कर ली गई
1965- टीवी स्क्रीन पर खेलों के प्रसारण के दौरान ग्राफिक्स का इस्तेमाल शुरू हुआ
1978-खेलों को चौबीस घंटे दिखाने वाले पहला टीवी चैनल ईएसपीएन की शुरुआत
2005- लाइव स्पोट्र्स प्रसारण की शुुरुआत इंटरनेट पर
2009- स्पोट्र्स प्रसारण की थ्री डी टैक्नालाजी विकसित
संजय श्रीवास्तव
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