कितनी पारदर्शिता ला पाएंगे गावस्कर

संजय श्रीवास्तव
सुनील गावस्कर फिर मैदान में हैं. मैदान भी क्रिकेट का है लेकिन प्रशासन का. चुनौती बड़ी है. भारतीय क्रिकेट में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी खिलाड़ी को भारतीय क्रिकेट बोर्ड की कमान सौंपीं गई हो। आईपीएल-6 में फिक्सिंग विवाद के छींटे अध्यक्ष नारायणस्वामी श्रीनिवासन के घर तक पहुंचने के बाद उन्हें खुद ही इस्तीफा देकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए था. लेकिन वह किसी भी हाल में बीसीसीआई अध्यक्ष पद की कुर्सी से हिलने को तैयार नहीं थे। पदलिप्सा की ही चाह में उन्होंने बीसीसीआई में अध्यक्ष पद का कार्यकाल खत्म होने से पहले इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) में मनचाहे बदलाव कराकर उसके प्रमुख के तौर पर कुर्सी पक्की कर ली।
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इसमें कोई शक नहीं कि बीसीसीआई में उनके अध्यक्ष पद पर रहते फिक्सिंग जांच प्रभावित हो रही थी. जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना जांच पैनल गठित किया तब भी उसकी जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट को इस निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ा कि जब तक श्रीनिवासन पद पर रहेंगे तब तक न तो फिक्सिंग की निष्पक्ष जांच हो पाएगी और न ही क्रिकेट में गंदगी को साफ किया जा सकेगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने तरीके से श्रीनिवासन को कई बार संकेत दिया कि वह पद से इस्तीफा देकर किसी और को बीसीसीआई की कमान सौंपे ताकि क्रिकेट में स्वच्छता अभियान का रास्ता मजबूत हो सके। श्रीनिवासन ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह को भी जब अनसुना कर कुर्सी से चिपके रहने को प्राथमिककिसी की समझ में नहीं आया कि श्रीनिवासन करना क्या चाहते हैं, ऐसा करके वह कौन सा उदाहरण पेश करना चाहते हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और इसकी राज्य इकाइयों से जुड़े लोग उनकी कंपनी इंडिया सीमेंट के मुलाजिम रहे। इसमें भारतीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी तक शामिल रहे। जाहिर सी बात है कि जो उनका मुलाजिम होगा, वो बीसीसीआई से ज्यादा उनके प्रति निष्ठा की डोर से ज्यादा जुड़ा रहेगा। ऐसे में हितों का टकराव खुद ब खुद दिख जाता है। बहुत ढेर सारी बुराइयां यहीं से शुरू होती हैं। तब आप अपनी भूमिका के प्रति न तो निष्ठावान हो सकते हैं औऱ न ही समर्पित।
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हैरानी की ही बात है कि दुनिया के सबसे धनी खेल संस्था को अब भी जेबी संस्था की तरह से ज्यादा चलाया जाता है. हर अध्यक्ष इसे अपने हिसाब से अपने शहर से चलाता है। अभी तक बीसीसीआई और आईपीएल के वित्त संबंधी मामलों को इंडिया सीमेंट लिमिटेड से जुड़े लोग और श्रीनिवासन के परिचित चार्टेड अकाउंटेट देखते थे। अब तक बीसीसीआई में कारपोरेट आफिस की तरह काम की केंद्रीकृत व्यवस्था और संरचना नहीं है। हालांकि जब पारदर्शिता की बात करते हैं तो हमें ये देखना होगा कि बीसीसीआई की वित्तीय लेखा-जोखा आज भी सार्वजनिक नहीं किया जाता। उसके खाते किस बैंकों में कहां कहां हैं, ये एक रहस्य की तरह है। कुछ समय पहले तक बीसीसीआई पर गुपचुप तरीके से विदेशी बैंकों में अकाउंट रखने के आरोप लगे थे। बीसीसीआई किस तरह विदेशी टीमों और आईपीएल में खेलने वाले विदेशी खिलाड़ियों के साथ लेन-देन करता है, इसे जाहिर नहीं होता। बीसीसीआई को छोड़कर दुनिया के सभी क्रिकेट बोर्डों के वित्तीय लेखा-जोखा औऱ वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट उनकी वेबसाइट पर अपलोड की जाती है लेकिन ऐसा बीसीसीआई के साथ कभी नहीं होता।
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कुल मिलाकर बीसीसीआई बेशक दुनिया की सबसे धनी खेल संस्था जरूर हो लेकिन वह अपने खास तरीकों से संचालित की जाने वाली संस्था रही है। उसकी बहुत सी बातें किसी रहस्यलोक से कम नहीं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आईपीएल के अंतरिम अध्यक्ष बनाए गए सुनील गावस्कर के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। हर उन्हें वाकई आईपीएल की गंदगी साफ करनी है तो हर स्तर पर पारदर्शिया लानी होगी। अब तक उनकी छवि एक डिप्लोमेट और अपने फायदों के लिए बीसीसीआई का पैरोकार बनने की ज्यादा रही है। उन्हें न केवल आईपीएल की वित्तीय व्यवस्थाएं मुकम्मल करनी होंगी बल्कि तमाम आईपीएल  फ्रेंचाइचीज में एक सिस्टम विकसित करना होगा कि वो अपनी टीमों को अपनी फर्म की तरह से नहीं चलाएं। टीम में फ्रेंचाइजी के मालिकों के पक्ष से जुड़़े हर शख्स का दखल खत्म हो। बल्कि फ्रेंचाइजी में खेल और प्रशासन को बांटकर देखना होगा, तभी आगे मयप्पन जैसे मामले दोहराए नहीं जाएंगे। फ्रेंचाइचीज से भी हर साल वित्तीय लेखा-जोखा सार्वजनिक किए जाने को नियम बनाना चाहिए। ये पता लगे कि उनके पास धन कैसे आ रहा है और कैसे जा रहा है।
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वैसे वह अगर अपनी भूमिका में सफल रहे और आईपीएल में जरा सी पारदर्शिया का माहौल बनाने में असरदार काम किया तो वह तमाम खेल संघों में खिलाड़ियों को आगे लाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। तमाम दिग्गज पूर्व खिलाड़ी खेल संघों में आएं औऱ असरदार भूमिकाएं निभाएं , इसकी आज बहुत जरूरत है।
संजय श्रीवास्तव जाने माने खेल विश्लेषक हैं 
sanjayratan@gmail.com
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