श्रीनिवासन तो अब भी सक्रिय हैं !!

संजय श्रीवास्तव
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बीसीसीआई अध्यक्ष नारायणस्वामी श्रीनिवासन ने इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) की दुबई बैठक में हिस्सा लिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि वह भारतीय क्रिकेट बोर्ड से जुड़े किसी भी काम में दखल नहीं देंगे। शायद आईसीसी की मीटिंग में वह भारत का प्रतिनिधित्व ही कर रहे थे। कोर्ट के कड़े निर्देशों के बावजूद वह क्यों आईसीसी की मीटिंग में हिस्सा लेने गए? क्या ऐसा करने के लिए उन्होंने बोर्ड के अंतरिम अध्यक्षों सुनील गावस्कर और शिवलाल यादव से अनुमति ली.
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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड इस प्रकरण पर चुप्पी साधे हुए है। दोनों अंतरिम अध्यक्षों को साफ करना चाहिए कि श्रीनिवासन किस हैसियत से और किसकी अनुमति लेकर वहां गए हैं. अगर बगैर क्रिकेट बोर्ड को सूचित किए बगैर या अनुमित लिए बिना स्वयंभू वहां गए हैं तो बीसीसीआई को उनके इस कदम के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। कानून की दृष्टि से देखें तो उन पर अदालत की अवमानना का मामला भी बनता है। हां, अगर वह अनुमति लेकर गए हैं तो बीसीसीआई को इसे साफ करना चाहिए. बोर्ड की चुप्पी कहती है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी बीसीसीआई पर उसके अध्यक्ष का प्रभाव बरकरार है। आईपीएल के सीईओ सुंदर रमन अब भी अपने पद पर बने हुए हैं. वह इंडिया सीमेंट में भी हैं और आईपीएल में भी. अदालत ने फैसला लेना का अधिकार उन  पर ही छोड़ दिया है. माना जा रहा है कि वह तो पद छोड़ना चाहते हैं लेकिन श्रीनिवासन नहीं चाहते कि वह आईपीएल के सीईओ पद को छोड़ें। लिहाजा कुछ नहीं हो सकता। कायदे से तो गावस्कर को नए सीईओ की नियुक्ति करने की मार्ग प्रशस्त करना चाहिए था. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए। बल्कि कुछ भी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं जो श्रीनिवासन के हितों के आड़े आ रहा हो, कुछ नई गाइडलाइंस आईपीएल के लिए जरूर जारी हुई हैं, लेकिन उससे आईपीएल में पारदर्शिता कितनी बढ़ेगी, ये भविष्य ही बताएगा. शायद आईपीएल के कारोबारी कामों को वही पुरानी टीम देख रही है, जो श्रीनिवासन के नजदीक रही है. अगर देखें तो सबकुछ तो वही है. पर्दे के पीछे से श्रीनिवासन का सक्रिय होना, अंतरिम अध्यक्षों का कठपुतली की तरह काम करना और इंडिया सीमेंट-बीसीसीआई-आईपीएल के घालमेल के लक्षणों का अब भी मौजूद होना.
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पिछले एक साल से श्रीनिवासन जिस तरह विवादों से घिरे रहे हैं, उसके बाद कोई भी इस्तीफा दे देता लेकिन श्रीनिवासन के तौरतरीके और पदलिप्सा हैरान करने वाली है. सोचने वाली बात है कि वह लगातार ऐसा क्यों कर रहे हैं. उ्न्होंने आईसीसी में प्रमुख पद की व्यवस्था पहले ही कर ली. इसके लिए भी आईसीसी की संरचना जिस तरह बदली, उसने बड़े विवाद को जन्म दिया. श्रीनिवासन की कुर्सी पर चिपके रहने की प्रवृत्ति आने वाले समय में तमाम अपसंस्कृतियों की वाहक बनेगी. विश्व क्रिकेट में बाइबिल माने जाने वाली विजडन मैगजीन के वार्षिक अंक में श्रीनिवासन की कार्यशैली और भारत के तथाकथित क्रिकेट साम्राज्यवाद की बखिया उधेड़ी है.
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इस पूरे प्रकरण में जो चिंतनीय बात है, वो यही है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बीसीसीआई प्रशासन में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है. सुप्रीम कोर्ट के तमाम संकेतों के बावजूद जब उन्होंने पद से इस्तीफा नहीं दिया तो भारत की सर्वोच्च अदालत को उन्हें किनारे करने का कठोर कदम उठाना पड़ा. इतने सबके बाद माना जा रहा था कि बीसीसीआई अब श्रीनिवासन की छाया से दुर हो जाएगा बल्कि नए अंतरिम अध्यक्ष इसे साफ-सुथरा और पारदर्शी बना सकेंगे. लेकिन अब श्रीनिवासन का हठ फिर सारी व्यवस्था औऱ न्यायपालिका को चुनौती दे रहा है.
.बीसीसीआई को स्पष्ट करना ही चाहिए कि आखिर किस हैसियत से श्रीनिवासन आईसीसी की बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. अगर वह आईसीसी में पहले ही बनाई जा चुकी किसी कमेटी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं तो भी न्यायपालिका के निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसा नहीं करना चाहिए था। पिछले साल जब जगमोहन डालमिया को कुछ समय के बीसीसीआई का अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था तब भी ये सवाल उठा था, तब अंतिम समय में श्रीनिवासन ने आईसीसी की बैठक में शामिल होने को टाला था लेकिन वह चेन्नई से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए इस मीटिंग में शामिल हुए थे.
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुनील गावस्कर ने जोरशोर से कहा था कि वह नई चुनौती को कबूलने में पीछे नहीं हटेंगे औऱ अपने भरसक जो हो सकेगा वो करने की कोशिश करेंगे। लोगों को गावस्कर पर भरोसा इसलिए भी था क्योंकि बीसीसीआई की कार्यशैली को जितना ज्यादा वह समझते हैं, उतना कम लोग समझते हैं। चूंकि वह खुद प्रोफेशनल मैनजमेंट ग्रुप नाम की कंपनी को भी सफलता से चलाते रहे हैं लिहाजा उन्हें प्रशासन का बखूबी अनुभव है. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि गावस्कर की छवि हाल के बरसों
में डिप्लोमेटिक की ज्यादा रही है. एक ऐसे शख्स की जो अपने फायदे की हिसाब से नापतौल कर कदम बढाता है और शब्दों को जाहिर करता है. ऐसे में ये अब फिर बड़ा सवाल है कि क्या वाकई सुनील गावस्कर वाकई आईपीएल इस बार कोई ऐसा उदाहरण पेश कर पाएंगे जो पहले कभी नहीं देखा गया। लेकिन श्रीनिवासन के मौजूदा प्रकरण के बाद तो यही लगता है कि वह महज औपचारिकता निभाएंगे. जहां तक आईपीएल और बीसीसीआई में पारदर्शिता लाने की बात है तो ये वाकई बहुत बड़ी
चुनौती है.
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कुल मिलाकर बीसीसीआई बेशक दुनिया की सबसे धनी खेल संस्था जरूर हो लेकिन वह अपने खास तरीकों से संचालित की जाने वाली संस्था रही है। उसकी बहुत सी बातें किसी रहस्यलोक से कम नहीं।
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70 और 80 के दशक में सुनील गावस्कर भारतीय क्रिकेट म के खेवनहार थे। 16 साल तक उन्होंने भारतीय टीम का झंडा बुलंद किया। पिछले 27 सालों से वह अपनी कंपनी पीएमजी संचालित करने के साथ बीसीसीआई की कमेंटरी टीम का हिस्सा थे। ये सही है कि भारतीय क्रिकेट और बीसीसीआई की जितनी बारीकियों से वह वाकिफ होंगे शायद उतना कोई और खिलाड़ी हो। लेकिन उनके साथ हमेशा ये लेवल चस्पां रहा कि वह आमतौर पर भारतीय क्रिकेट बोर्ड में सत्ता प्रतिष्ठान के साथ जुडक़र रहने वाले क्रिकेटर हैं। एक ही बार वह बोर्ड के साथ टकराव लेते देखे गए, जब उनके भुगतान को लेकर विवाद हो गया। बोर्ड में उन्हें पहले भी कोच या चयनकतार् के रूप में सक्रिय भूमिका मिल सकती थी लेकिन शायद उन्होंने ही ऐसा करने में रूचि नहीं दिखाई। आमतौर पर कहा जाता रहा है कि वह कुछ सालों पहले तक इन भूमिकाओं से इसलिए बचते थे क्योंकि ये अवैतनिक भूमिकाएं थीं।
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आईपीएल के सामने सबसे बड़ी चुनौती फिक्सिंग और भ्रष्टाचार की है. इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि बीसीसीआई की एंटी करप्शन यूनिट को ज्यादा मजबूत ही नहीं बनाया जाए बल्कि आईसीसी की एंटी करप्शन यूनिट की भी सेवाएं ली जाएं। जिस खेल से आप हजारों करोड़ रुपए कमा रहे हैं, उसे साफ सुथरा रखने के लिए कुछ सौ करोड़ रुपए तो खर्च किए ही जा सकते हैं। हालांकि बीसीसीआई की पूरी संस्कृति, कार्यशैली और रहस्यलोक को देखते हुए यही लगता है कि उसे सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की
मांग कोई अनुचित नहीं है.
संजय श्रीवास्तव जाने माने खेल विश्लेषक हैं 
sanjayratan@gmail.com
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