निर्मल पहले सबल अब निर्बल ..आखिर क्यों !!!

राजेश्वर प्रसाद जायसवाल 
कुछ दिनों से तमाम चैनलों पर निर्मल नरूला “बाबा” की लोकप्रियता अब बिना किसी भुगतान के उनकी चर्चा कर उन्हें अलोकप्रिय बनाने कि कोशिश सर्वत्र हो रही है. पहले तो चैनलों पर समय खरीदना होता होगा पर अब मुफ्त में हो रहा है.आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ! अचानक ही दो तीन हप्तों से लोगों में कुछ लोगों में और कुछ चैनलों में “साइअन्टिफिक टेम्परामेंट” जग गया है. नहीं मालूम पहले इस टेम्परामेंट को कुम्भकर्णी नींद क्यों आ गयी थी अब एक अभियान सा चल पड़ा है सबल लिए जा चुके निर्मल को निर्बल बनाने की. और निर्मल अकेला ऐसा प्राणी तो है नहीं कि ये तो गली मोहल्ले से लेकर राजधानियों तक टेंट से लेकर स्वर्गनुमा महल लगाये अपनी ज्ञान की फैक्ट्री चला रहे हैं साथ साथ बिना लाइसेंस टकसाल भी खोल लिया है. फिर प्रश्न पैदा होता है कि अकेले निर्मल को ही क्यों निर्बल बनाया जा रहा है. अब संविधान से लेकर अन्धविश्वास तक सारी चेतनाएं प्रबलता से दिल दिमाग में आ रही हैं, इनमे से कई लोग जो पहले सांस्थानिक स्तर पर ज्योतिषियों के लिए स्कूल और  कॉलेज खुलवाए थे और तभी से ही चैनलों पर “डेकोरेटेड आइटम” के रूप में बाबाओं के दर्शन होने लगे. बहुत पहले इण्डिया टुडे ने सत्यसाईं बाबा पर एक अंक प्रकाशित किया था जिनके यहाँ  राष्ट्रपति से लेकर कई मंत्रियों तक ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी.  उसी अंक में यह भी था कि उनके कुछ यूरोपियन अनुयायियों ने उनके खिलाफ मामला भी दर्ज कराया था क्योंकि सत्यसाई बाबा अपने दावे पर खरे नहीं उतरे थे साथ ही उनके विदेशी चेलों का विश्वास भंग हुआ था. अब ये समझ नहीं आता कि उस समय “टेम्परामेंट” क्यों पंक्चर होगया था. आशाराम बापू भी बड़े विवादों में रहे हैं लेकिन वे अन्धविश्वास के दोषी नहीं पाए गए उनपर इतना लंबा और जबरदस्त अभियान नहीं चलाया गया.
                                                     ऐसा लगता है कि बाबा निर्मल ने बड़ी निर्मलता और सबलता से कुछ बड़े बाबाओं का “शेयर” खा लिया है या उसी प्रक्रिया में हैं जिससे कईयों के पेट में दर्द और कलेजे में हुक सी उठने लगी होगी. क्योंकि निर्मल ने लोगों के लिए आसान सा फार्मूला डेवलप कर लिया है कि आप जितनी सरलता से चाहें आप पर “किरपा” हो जायेगी बस शुल्क अदा करते रहो. अगर आपको समोसे चटनी से “किरपा” चाहिए तो मिलेगी अगर सैंडविच खाना है तो खाइए और खिलाइए गली वाले भगवान को दो लड्डू चढा दीजिए जरुरी नहीं कि आप बद्री नाथ जाइये या अमरनाथ के दर्शन करें मात्र दो हजार रूपये की शुल्क अदा कर बीस हजार तो बच ही जायेंगे सात इ परम्परागत पाखंडियों द्वारा सुझाया गया कष्टसाध्य तरीकों से भी मुक्ति कहीं नहीं जाना है किरपा के लिए सब आपके हाथ है चढावा केवल मन्दिर में ना जाये उसे निर्मल दरबार में भेजा जाये किसी भी रूप में. यहीं वो आसान तरीके हैं जिनके कारण तमाम भूखे भौतिकवादी अपनी तनख्वाह बढ़वाने, नौकरियों में प्रोन्नत होने, व्यापार में सफल होकर “अम्बानी” बनने और कुछ अपने बच्चों को आई.आई.टी और अच्छे संस्थानों में नामांकन हेतु भी किरपा लेने आते हैं, निर्मल का क्या दोष वो बेचारा तो खुद ही सारा कर्म कर चुका है लेकिन चांदी नहीं काट पाया तो खुद ही उसने आसान रास्ता खुद के लिए भी और गैरों के लिए भी काल्पनिक रूप से इजाद कर लिया और करोड़ों का मालिक कुछ ही सालों में ..
                                                        निर्मल के लगभग सारे भक्त ही शिक्षित और मध्यवर्गीय लगते हैं अस्सी फीसद गरीब तो बीस रूपये रोज कमाने वाले हैं तो वो बेचारे कहां से दो हजार देंगे, तो क्या ये लालची लोग भी उसी तरह दोषी नहीं हैं जैसे घूस देने वाले भी होते हैं या डिस्क्लेमर लगा के निर्मल का विज्ञापन चलाने वाले. प्रायः निर्मल दरबार में कोई किशोरवय या बच्चा नहीं दिखता सभी युवा या प्रोढ लोग हैं सोचिये जरा जो लोग आई.आई.टी या आई.आई.एम की किरपा लेने आते हैं तो बड़े-बड़े कोचिंग चलाने वालों पर क्या गुजरती होगी. क्या वे भी निर्मल को निर्बल बनने कि नहीं सोचंगे क्या ?
                                                    निर्मल ने आध्यात्म को चाहने वालों के हिसाब से सरल बना दिया केवल एक निश्चित शुल्क लेकर. निर्मल दरबार में जाने वाले गरीब भूखे नंगे लोग नहीं हैं सारे मिड्ल क्लास वाले लोग हैं जो धन-सम्पति और कभी ना समाप्त होने वाली सम्पन्नता माँगने आते हैं, वहाँ जाने वाला मोक्ष या आत्मिक शांति की चाह नहीं रखता सभी माँग “दो” और “लो” पर आधारित है, निर्मल ने सभी कष्टों का सरलीकरण कर दिया रंगों से,चटनियों से, दैनिक कार्यों से लोगों की औकात और क्षमता के हिसाब से. लोगों को लगता होगा कि हमें बीस-पच्चीस हजार लगाकर कहीं किसी तीर्थ यात्रा पर जाने कि आवश्यकता नहीं ना ही कोई पत्थर या हीरा पहनने की. जब हमारे साधना का आधार ही केवल भौतिक सुख,और लालसा के लिए है तो कोई चतुर आदमी तो इसका फायदा उठाएगा ही.
                                                                                    यह किसी तरह क्षम्य नहीं है, लेकिन यह भी है कि वहाँ भूखे पेट मरने वाला कोई नहीं आता, भरे -पूरे लोग आते हैं आखिर कई सारे पाखंडी सभी चैनलों पर आते हैं क्या वे “साइअन्टिफिक टेम्परामेंट” विकसित कर रहे हैं .नहीं बिल्कुल नहीं. ऐसे ही सैकड़ों “बाबावाद” के कारण दर्जनों चैनलों की दुकानें चाल रही हैं. इसे बंद किये जाने कि जरुरत है. तभी देश में वैधानिक और संवैधानिक उदेश्यों की पूर्ति होगी.
लेखक  लोकसभा टीवी में कार्यरत हैं 
सौजन्य : www.nidanindia.blogspot.in
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