यदि आपकी कंपनी करे आप ही से फर्जीवाड़ा

एस एस खान

पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में एक मजेदार खबर पढऩे को मिली। अखबार ने अपने पाठकों को सूचित किया था कि किंगफिशर एयरलाइंस ने अपने कर्मचारियों के तनख्वाह से काटे गए टीडीएस की रकम को इनकम टैक्स विभाग में जमा नहीं कराया है। टीडीएस की यह रकम करीब 422 करोड़ रुपये (पिछले दो सालों के दौरान) बताई जा रही है। मार्च 2011 को समाप्त हुए वित्त वर्ष की वार्षिक रिपोर्ट में कंपनी ने यह माना है कि उसके पास इनकम टैक्स विभाग की देनदारी है। खबर में इस बात का भी जिक्र किया गया था कि आयकर विभाग ने किंगफिशर के कुछ कर्मचारियों (जिनके खाते से उनकी कंपनी द्वारा टीडीएस तो काटा गया पर उसे सरकार के पास नहीं भेजा गया) को टैक्स देयता के संबंध में नोटिस भेजा, हालांकि इन कर्मचारियों ने अपना इंडिविजुअल टैक्स रिफंड अदा कर दिया था। कुछ मामलों में तो कर्मचारियों को 80 लाख रुपये टैक्स बकाए�� का नोटिस भेजा गया।

अब आप उन कर्मचारियों की मानसिक दशा को समझ सकते हैं जिनके पास यह नोटिस गया है। एक अन्य मामले में एक बड़ी सरकारी कंपनी ने भी अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में से टैक्स की कटौती तो कर� ली पर उसे सरकार के खाते में जमा नहीं करवाया। दूसरी तरफ आयकर विभाग संबंधित कंपनी से टीडीएस की राशि वसूलने की बजाए बेगुनाह कर्मचारियों पर अपनी पूरी जोर आजमाइश कर रहा है और उन्हें ही टैक्स देयता का नोटिस भेज रहा है।

अब यह देखने वाली बात है कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रावधान क्या है।

करदाता को बुलाना सही नहीं

इनकम टैक्स एक्ट 1961 की धारा 199 में क्रेडिट फॉर टैक्स डिडक्टेड के शीर्षक से यह जिक्र किया गया है कि धारा 192 के तहत (तनख्वाह से संबंधित)� एवं कई तरह की अन्य धाराओं (अन्य प्रकार के पेमेंट की सूरत में डिडक्शन) के अंतर्गत डिडक्शन का प्रावधान है एवं इसे सरकार के खाते में जमा कराने की बात कही गई है। इसमें यह भी जिक्र किया गया है कि इस रकम को संबंधित करदाता (जिसके खाते से रकम काटी गई है) की तरफ से टैक्स पेमेंट माना जाएगा एवं सेक्शन 203 के तहत उन्हें टीडीएस प्रमाणपत्र दिया जाएगा।

इनकम टैक्स की धारा 205 में साफ तौर पर यह कहा गया है कि जहां भी आय के स्रोत पर टैक्स की कटौती होगी वहां स्वयं करदाता को टीडीएस की राशि जमा करने के लिए� नहीं बुलाया जा सकता क्योंकि उसके खाते से टीडीएस की राशि तो संबंधित कंपनी ने पहले ही काटी ली है। इसने थोडा़ संशय की स्थिति उत्पन्न कर दी है। यदि आय के स्रोत पर कंपनी या अन्य डिडक्टर्स के द्वारा टैक्स की राशि काट ली गई है तो बाद में उस टैक्स राशि की देयता करदाता की नहीं बनती है। ऐसे में उसे कोई नोटिस नहीं दिया जा सकता।

इस तरह का एक मामला बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष भी आया था। मामला दरअसल यशपाल सिन्हा संग रेखा हजारनविस, असिस्टेंट कमिश्नर, इनकम टैक्स, 293 आईटीआर 539 के बीच था।� कोर्ट ने कहा कि एक बार जब टैक्स की राशि कर्मचारी के खाते से आय के स्रोत पर ही काट ली गई तो स्वत: ही इनकम टैक्स एक्ट की धारा 205 के तहत करदाता (कर्मचारी) की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। आयकर विभाग के प्रावधानों के तहत इनकम टैक्स विभाग को टीडीएस की राशि उस संस्था या व्यक्ति से वसूलनी है जिसने आय के स्रोत पर ही कर्मचारी के खाते से इसकी कटौती की है।

इस प्रकार, आयकर कानूनों के हिसाब से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि करदाता के खाते से एक बार टीडीएस कटौती किए जाने के बाद उसे फिर से उस रकम को अदा करने को नहीं कहा जा सकता है। यही कारण है कि आयकर विभाग ने डिडक्टर्स के लिए आवश्यक बना दिया है कि वह करदाता को टीडीएस सर्टिफिकेट जमा करे।� करदाता के लिए भी यह बेहद आवश्यक है कि वह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए डिडक्टर्स से टीडीएस सर्टिफिकेट ले ले। इनकम टैक्स एक्ट की धारा 272ए के तहत करदाता को यदि टीडीएस सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया तो डिडक्टर्स को सजा के तौर पर पेनाल्टी देनी पड़ सकती है। यदि डिडक्टर्स जान बूझकर करदाता को टीडीएस प्रमाण पत्र जारी नहीं करते हैं तो पीडि़त करदाता चाहे तो आयकर विभाग के संबंधित कमिश्नर के समक्ष उसकी शिकायत दर्ज करा सकता है।

क्या है सजा का प्रावधान

इतना ही नहीं इनकम टैक्स एक्ट की धारा 200 एवं रूल 37 के तहत इस बात का जिक्र किया गया है कि डिडक्टर्स द्वारा टीडीएस की राशि को संबंधित महीने की समाप्ति (जिस महीने के लिए काटा गया है) के 7 दिन के भीतर भारत सरकार के खाते में जमा कराया जाना चाहिए। डिडक्टर्स द्वारा टीडीएस की राशि को भारत सरकार के खाते में जमा नहीं कराने की सूरत में इनकम टैक्स की धारा 201 में इस बात का प्रावधान किया गया है कि इस राशि को जमा कराने की तय तिथि से लेकर जब जमा कराया जाता है, उस तारीख तक इस पर 1.5 फीसदी प्रति महीने के हिसाब से साधारण ब्याज वसूला जाएगा। डिडक्टर्स द्वारा ब्याज की इस राशि को चुकाना बेहद आवश्यक है एवं कोई भी इसे रोक नहीं सकता और न ही इसे रद्द भी नहीं किया जा सकता है।

� जहां तक डिफॉल्टर डिडक्टर्स के साथ किए जाने वाले व्यवहार की बात है तो इसके लिए इनकम टैक्स की धारा 221 एवं 222 में प्रावधान किए गए हैं। धारा 221 में� पेनाल्टी का जिक्र किया गया है जिसमें डिफॉल्टर डिडक्टर्स से पेनाल्टी वसूला जा सकता है जिसके तहत यह राशि टैक्स की राशि के बराबर भी हो सकती है। वहीं, धारा 222 आयकर अधिकारियों को यह अधिकार देता है कि वे डिफॉल्टर डिडक्टर्स� की चल या अचल संपत्ति को जब्त कर सकते हैं या बेच भी सकते हैं। उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है।

टीडीएस सर्टिफिकेट की अनिवार्यता

जहां तक भारत सरकार के खाते में टीडीएस राशि जमा करने की बात है धारा 203 और रूल 31 में यह प्रावधान किया गया है कि डिडक्टर्स फॉर्म 16 (वेतन भोगियों के लिए) एवं 16 ए (अन्य प्रकार के पेमेंट के लिए) में संबंधित कर्मचारी/डिडक्टी को टीडीएस सर्टिफिकेट जारी करेंगे। इन दोनों फॉर्म में भारत सरकार के खाते में जमा किए गए टीडीएस की राशि� से संबंधित सारी जानकारी जैसे डिपोजिट की तारीख, बैंक का नाम एवं चालान पहचान संख्या आदि का जिक्र होना चाहिए। दूसरे शब्दों में यदि कहें तो भारत सरकार के खाते में टीडीएस की रकम जमा किए बिना टीडीएस प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा सकता।� इनकम टैक्स एक्ट की धारा 206 के तहत इस बात का जिक्र किया गया है कि डिडक्टर्स को टीडीएस का त्रैमासिक एवं वार्षिक रिटर्न विभिन्न तरह की जानकारियों के साथ� भरना आवश्यक है जैसे कर्मचारी/डिडक्टी का नाम/पता और पैन तथा उनके द्वारा कितनी कर की राशि काटी गई।

इन टीडीएस सर्टिफिकेट पर आधारित इनकम टैक्स विभाग ने फॉर्म 26एए में सभी करदाताओं के लिए स्टेटमेंट तैयार किया है जिसमें पूरे वर्ष के दौरान डिडक्टर्स द्वारा उनके खाते से काटी गई टैक्स की राशि का विवरण उपलब्ध होगा। इनकम टैक्स विभाग ने� फॉर्म 26एए में दर्ज करदाता के टीडीएस की राशि को एनएसडीएल के जरिए ऑनलाइन पता करने की सुविधा दी है। इसे टैक्स इनफॉर्मेशन नेटवर्क की वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं।

आपराधिक मामलों की जिम्मेदारी

इनकम टैक्स की धारा 204 के तहत इस बात को स्पष्ट किया गया है कि विभिन्न धाराओं में से किसी के भी अंतर्गत कंपनी एवं उसका प्रमुख अधिकारी किसी भी तरह के मसले जैसे टीडीएस डिपोजिट, टीडीएस प्रमाण पत्र जारी करना और टीडीएस रिटर्न फाइल करने संबंधी सारे बातों के लिए जिम्मेदार होंगे। जहां तक डिडक्टर्स द्वारा डिफॉल्ट करने की बात है, इनकम टैक्स की धारा 272 ए (2) में इस बात का जिक्र किया गया है कि यदि डिडक्टर, टीडीएस सर्टिफिकेट जारी नहीं करता है या टीडीएस रिटर्न फाइल नहीं करता है तो प्रत्येक डिफॉल्ट के मामले में डिडक्टर्स को उस कार्य को नहीं करने तक 100 रुपये प्रति दिन के हिसाब से पेनाल्टी देना होगा।

इनकम टैक्स की धारा 276 बी में यह प्रावधान किया गया है कि यदि डिडक्टर्स भारत सरकार के खाते में टीडीएस की राशि जमा नहीं कराते हैं तो उन्हें कम से कम तीन महीने की सश्रम करावास की सजा हो सकती है परंतु इसे बढ़ाकर जुर्माने के साथ 7 साल की भी किया जा सकता है। इतना ही नहीं लगातार दूसरी बार इसी तरह की गलती करने पर न्यूनतम सश्रम करावास की सजा की अवधि 6 महीने तक की कर दी गई है।

इनकम टैक्स की धारा 278 बी में इस बात का जिक्र किया गया है कि अपराध किसी कंपनी के द्वारा करने की स्थिति में वे सभी व्यक्ति जिनके हाथों में कंपनी की जिम्मेदारी थी एवं कंपनी के हर फैसले में जिनकी भूमिका थी उन्हें इसके लिए दोषी ठहराया जाएगा।

आपसी विश्वास का है पूरा मामला

इन कानूनों एवं सजा के प्रावधानों के आधार पर हम कह सकते हैं कि टीडीएस से जुड़़े डिफॉल्ट की सूरत में बनाए गए कानून काफी कठिन हैं। जो कि जायज भी है क्योंकि टीडीएस की राशि डिडक्टर्स की संपत्ति नहीं है, दरअसल करदाता की कमाई होती है एवं डिडक्टर्स को इसे काटने का अधिकार इसलिए दिया गया है ताकि वह आसानी से इसे इकट्ठा कर ले एवं करदाता की तरफ से भारत सरकार के खाते में जमा करा दे। हालांकि विभाग ने कानूनी तौर पर टीडीएस जमा करने के मामले में डिडक्टर्स के लिए काफी उदारता बरती है। उन्हें कहा है कि वे टीडीएस काटने के ३७ दिनों के भीतर इसे सरकार के खाते में जमा कराएं। लेकिन यह सुविधा प्रशासनिक सहूलियत के लिए दी गई है न कि कंपनी का कैश फ्लो बढ़ाने के लिए।

मनी मंत्र से साभार

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