सांच को आंच

कफील एकबाल

कहावत है ‘सांच को आंच नहीं‘ लेकिन प्रेम कुमार मणि के मामले में सबकुछ इसके उल्टा हुआ है। साहित्यकार प्रेम कुमार मणि को सच कहने की सजा दी गई है। ग्यारह मार्च 2006 को इन्हें साहित्य के कोटा से राज्यपाल द्वारा बिहार विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया बाद में मणि जदयू से जुड़ गए। पहले इन्हें दल की सदस्यता से वंचित कर दिया गया, फिर विधान परिषद की सदस्यता समाप्त कर दी गई। एक राष्ट्रीय हिन्दी साप्ताहिक अखबार में इन्होंने लेख लिखा ‘ इन्दिरा की राह पर चले नीतीश‘ जिसे काफी चर्चा मिली । प्रेम कुमार मणि कहते हैं ‘मुझे राज्यपाल द्वारा विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। मैं कोई पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर विधान पार्षद नहीं बना। पार्टी के जो मुख्य सिद्वान्त हैं, उनसे नीतीश कुमार दूर हो गए हैं, मैं तो वहीं टिका हूँ। नीतीश जी को दंडित होना चाहिए था, उल्टे मुझे दंडित किया जा रहा है। फिर भी मैं इस कार्रवाई के लिए नीतीश जी को धन्यवाद देता हूँ। मैं नीतीश को तानाशाह कहता रहा हूँ मेरी सदस्यता खत्म करवाकर उन्होंने इसे साबित कर दिया।

दरअसल, राजनीतिक बिसात पर वैचारिक हथियारों से लैस प्रेम कुमार मणि पिछले विधानसभा चुनाव के समय ही नीतीश कुमार से काफी दूर हो गए थे। समाचार-पत्रों व टेलीविजन चैनलों में इन्होंने अपने विचारों को बेबाकी से रखा।

मणि के ये क्रियाकलाप सत्ता के मैनेजरों को रास नहीं आ रहे थे।  इसलिए 18 अपै्रल 2011 को मुख्य सचेतक संजय कुमार सिंह ने जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह के पत्र के साथ एक याचिका सभापति को दी। याचिका में दल विरोधी आचारण के लिए मणि की सदस्यता खत्म करने का निवेदन किया गया था। इस बीच 14 अगस्त को नीतीश कुमार का भी पत्र सभापति को मिला, जिसमें उन्होंने मुख्य सचेतक और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा मणि के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर सहमति व्यक्त की। मणि के खिलाफ कहा गया कि जिस प्रकार का व्यवहार और आचरण मणि का रहा है, उससे स्पष्ट है कि उन्होंने दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है। जबकि मणि ने सभापति को अपने उत्तर में बताया कि मैंने संविधान के अनुच्छेद 191-2 की अनुसूची 10 के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं किया है। उन्होंने दल के अनुशासन को परिषद की कार्यवाही के दौरान भंग नहीं किया है और उन्होंने दल की सदस्यता भी नहीं छोड़ी है और न किसी अन्य दल की सदस्यता ग्रहण की है।

इसलिए याचिकाकर्ता का यह कहना कि उन्होंने स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ दी है, निराधार, भ्रामक, तथ्यों के विपरीत और अपमानजनक है। मणि ने सभापति से कहा कि मैं अपनी ओर से दल की नीतियों के प्रति पूर्ण समर्पित हूं। मेरी जानकारी के अनुसार किसी विषय  पर दल के अंदर एक सदस्य का दूसरे सदस्य से भिन्न मत रखना, प्रत्येक सदस्य का भारत के संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार है। इसके लिए किसी को सदन की सदस्यता से अयोग्य करार नहीं किया जा सकता है, लेकिन मणि की सारी दलीलों को सभापति ने खारिज कर दिया। सभापति ने अपने फैसले में कहा कि दल की नीतियों, कार्यक्रमों एवं घोषणा पत्र, इन सबके खिलाफ मणि ने विचार प्रकट किए हैं। ये सारे विचार दल के मंच पर किसी प्रसंगवश यदि उठाए गए होते तो उनको छूट थी, लेकिन परिषद् सदस्य होते हुए जदयू की नीतियों एवं कार्यक्रमों के खिलाफ वक्तव्य और उनके द्वारा की गई भविष्यवाणी कि जदयू अपने भार से ही समाप्ता हो जाएगा और यह होकर रहेगा। उपरोक्त सारे वक्तव्य उन्हें परिषद् के सदस्य बने रहने के योग्य नहीं ठहराते हैं।

 प्रेम कुमार मणि कहते है कि मै लेखक व समालोचक हूं, लिखना पढ़ना मेरा काम हैं, यह मै कैसे छोड़ सकता हूं। खैर अब लड़ाई छिड़ गई हैं तो इसे अजांम तक पहुंचाऊंगा। सदस्यता तो छोटी चीज हैं सच्चाई के लिए मै कोई भी कुर्बानी देने को तैयार हूं। मणि कानूनी, राजनीतिक एवं व्यचारिक लड़ाई लड़ने का मन बना चूके हैं। मणि कहते हैं कि बिहार की जनता को  यह जानने का पूरा हक हैं कि विकास का दावा करना और सही मायनों में विकास करना दो अलग बातें हैं। मणि ने नीतीश सरकार के कार्यकलापों को लेकर कई सवाल उठाए हैं,  इनके अनुसार गरीबों की आवाज उठाने के लिए ‘बिहार परिर्वतन मोर्चा‘ का गठन किया गया है। जिसमें सभी तबके के लोगों को जोड़ने  का प्रयास जारी है।

मणि ने एक ओर स्वर्ण आयोग का विरोध किया वही दूसरी ओर भूमि सूधार आयोग के अध्यक्ष मुचकुन्द तथा समान स्कूल शिक्षा प्रणाली के अध्यक्ष देवव्रत की सिफारिशों को लागू करने की पुरजोर आवाज उठाई । उन्होंने कहा की इनके लागू किये बिना सरकार बिहार में मौलिक बदलाव नहीं ला सकती। उन्होंनें सवाल उठाया यह कैसा विकास है जिसमें पांच – छः वर्ष पहले 41 प्रतिशत लोग गरीब थे वही अब 58 प्रतिशत लोग गरीब हो गये है, यानि गरीबी रेखा से नीचे हैं गरीबों की आबादी 17 प्रतिशत बढ़ गई और सरकार विकास का दावा कर रही है। पार्टी के अन्दर लोकतंत्र को कुचला जा रहा है। संसदीय बोर्ड का गठन किये बिना ही नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों का चयन कर लिया । यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है जहां लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोक कर लालू यादव ने कभी मुसलमानों में अपनी लोकप्रियता में इजाफा करते हुए मुसलमानों में नायक बनकर उभरें थे ।

आज बाबरी मस्जिद गिराये जाने के मामले में जिस पर मुकदमा चल रहा हैं। उसी आठवाणी को रथ को हरी झंडी दिखाने की नीतीश ने स्वीकृति दे दी है। भागलपूर दंगा की जांच कराकर नीतीश कुमार मुसलमानों से हमदर्दी जता रहे हंै।  मणि का कहना है कि 1946 में नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा के नगरनौसा में दंगा हुआ था। जिसमें तीस हजार से एक लाख मुसलमान मारे गये थे। उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया गया था। अगर नीतीश कुमार मुसलमानों के सच्चे हमर्दद हैं तो क्यों नहीं उन मुसलमानों या उनके परिजनों को वह जमीन वापस कराने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है, जिन जमीनों पर कब्जा कर लिया गया था । 22 साल पहले हुए दंगे की जांच कराई जा रही है तो 60 साल पहले हुए दंगे की जांच क्यों नहीं कराई जा सकती।

 मणि पर हुई इस कार्रवाई के बाद जदयू के नाराज सांसदों पर कार्रवाई तेज हो सकती है। निशाने पर ललन सिंह, सुशील सिंह, मंगनीलाल मंडल और उपेंन्द्र कुशवाहा हैं। उनकी सदस्यता खत्म करने के लिए लोकसभा व राज्यसभा सचिवालय को पहले ही पत्र लिखा जा चुका है। जदयू प्रवक्ता नीजर कुमार सिंह  का कहना है कि लोकसभा सचिवालय ने पत्र के आलोक में संबंधित कागजात पार्टी से मांगे हैं, जिन्हें जल्द ही मुहैया करा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पार्टी से उपर कोई नहीं है। मणि पर हुई कार्रवाई को नीरज सिंह न्याय की जीत बताते हैं। उनका मानना है कि जदयू समग्र विकास के रास्ते पर है और उसमें बाधा पहुंचाने वाले हाशिये पर ही रहेंगे। इस पूर मामले पर उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं कि लोकसभा व राज्यसभा किसी व्यक्ति विशेष के इशारे पर नहीं, बल्कि नियम व कानून से चलती है, इसलिए वहां किसी की दादागिरी नहीं चलेगी। बहरहाल, प्रेम कुमार मणि अगले वार की तैयारी में लगे हैं। देखना है इस वार का जदयू क्या जवाब देता है।

इसके पहले भी जदयू नेतृत्व कई लोगों पर अनुशासन का डंडा चला चुका है। 11 सांसदों पर तलवार लटक गई। पार्टी के विधान पार्षद प्रेमकुमार मणि को निलंबित कर दिया गया। इसके अलावा पार्टी विरोधी कामों के लिए जदयू के 41 नेताओं को छह साल के लिए और 73 और अन्य नेताओं को तीन साल के लिए निलंबित कर दिया गया है। कार्रवाई यहीं नहीं रूकी, 73 अन्य नेताओं को तीन साल के लिए पद से वंचित कर दिया गया और 174 नेताओं को आगे गलती न करने की चेतावनी दी गई। कुछ पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक और पूर्व विधान पार्षदों का जांच प्रतिवेदन अभी और जांच के लिए लंबित रखा गया है। सांसदों का मामला केंद्रीय अनुशासन समिति को सौंप दिया गया है।

इतने बड़े स्तर पर अपने ही नेताओं पर कार्रवाई कर जदयू नेतृत्व ने यह साफ कर दिया कि पार्टी उनकी ही मर्जी से चलेगी। जिन्हें रहना है रहें या फिर दूसरा विकल्प देखें। जाहिर है जितना बड़ा जनादेश नीतीश कुमार को मिला है, उसने इस तरह के फैसले का रास्ता साफ कर दिया है। इतने बड़े स्तर पर पार्टी नेताओं पर कार्रवाई कोई मामूली बात नहीं थी। जनता से मिली ताकत के बूते ही यह संभव था और सही समय पर यह कर दिया गया, लेकिन एक कहानी बस यहीं से शूरू हो गई है। कार्रवाई के घेरे में आए नेताओं की गोलबंदी बताती है कि अभी बहुत सारा धूम धड़ाका बाकी है।

चुनाव नतीजों के बाद जो सिलसिला बंद हो गया था, उसे इस कर्रावाई ने आगे बढ़ा दिया। सासंद उपेंन्द्र कुशवाहा कहते हैं कि यह अनुशासन लाने का नहीं बल्कि कुछ लोगों को अपमानित करने की कार्रवाई है। इतने बड़े स्तर पर नेताओं को फरमान सुनाया गया है जिससे अंदाजा लगया जा सकता है कि पार्टी में लोकतंत्र मर गया है। उन्होंने कहा कि जनता पार्टी के साथ थी इसलिए दल के लोगों को ही चुनाव में मौका मिलता तो इससे भी बेहतर परिणाम आते, लेकिन दूसरे दलों से लोगों को बुलाकर टिकट से नवाजा गया। यही वजह रही की दल के समर्पित कार्यकर्ताओं ने अपनी आवाज बुलंद की और अब इन्हीं लोगों पर अनुशासन का डंडा चलाया जा रहा है। कुशवाहा मानते हैं कि यह कदम दल के लिए आत्मघाती है। 

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

kafileqbal@gmail.com

 

 

अध्यात्म, राजनीति, राज्य, विकास, विचार, शासन, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक, साहित्य