फार्मूला वन यानि बिजनेस रेस

कुछ साल पहले कोई सोच भी नहीं सोच सकता था कि फार्मूला वन रेस भारत में आ पायेगी, लेकिन अब चंद दिनों बाद ही ये हकीकत बनने जा रहा है। फार्मूला वन का मतलब है बिजनेस। दुनियाभर के बेहतरीन ब्रांड्स के साथ जुडाव।

 बिजनेस के एक नये ब्रिज का निर्माण। भारत में फार्मूला वन का मतलब विदेशी ब्रांड्स का भारत में प्रोमोशन तो देशी ब्रांड्स को विदेशी प्लेटफार्म पर ले आना। वैसे भी आजकल के ज्यादातर स्पोर्टस इवेंट्स बाजार के हितों को ज्यादा साधते हैं। हालांकि ये कोई नई बात नहीं है। जब १९३० के दशक में टीवी अमेरिकी बाजार में नये नये आये और टेलीविजन एक इंडस्ट्री के तौर पर पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था, तब सबसे बड़ी समस्या थी कि कैसे टीवी सेटों को बेचा जाये और ब्राडकास्टिंग की कीमत को निकाला जाये। तब टीवी पर खेलों के लाइव प्रसारण की शुरुआत की गई, जिससे वाकई टीवी का धंधा चल निकला और अब टीवी और खेल दोनों एक दूसरे के पूरक हो गये हैं। दोनों बाजार का हित भी साधते हैं और बाजार के जरिए अपना भी। फिर फार्मूला वन तो हमेशा से एक स्पोर्टस से कहीं ज्यादा ब्रांड्स की रेस है। आटोमोबाइल कंपनियों की ये पसंदीदा प्रतियोगिता है, क्योंकि इससे सबसे ज्यादा सपोर्ट उन्हीं को मिलता है। लिहाजा भारत में तो अब फार्मूला वन के आदर्श प्लेटफार्म बन चुका है। दुनियाभर की तमाम बड़ी आटोमोबाइल कंपनियां यहां आ पहुंची हैं, उन्हें अपने ब्रांड्स को भारत में मजबूत बनाना है, यहां के बाजार में पैठ जमानी है। फिर चूंकि ये हमेशा से बहुत बड़े पैमाने पर पैसे के निवेश का खेल है, लिहाजा पूरे बाजार को आकर्षित करती है।

 वैसे ये अजीब सी बात है कि इस रेस को अगर केवल खेल के तौर पर लिया जाये तो ये घाटे का सौदा है, दुनियाभर के तमाम रेस ट्रैक की इकोनामी घाटे में ही रहती है, लेकिन उसके आयोजक दूसरे तरीकों से फायदों में आने की कोशिश करता है। कुछ जगह स्पासंर साथ निभाते हैं तो कुछ जगहों पर आयोजकों के दूसरे बिजनेस को इससे सपोर्ट मिलता है। भारत में ही फार्मूला वन के आयोजक जेपी स्पोर्टस इंटरनेशनल को ही ले लीजिये, ये रेस उनके ब्रांड्स को अलग तरह से स्थापित करेगी। देशभर में उनके पास तमाम बड़े प्रोजेक्ट्स हैं, जिसमें पावर प्रोजेक्टस से लेकर रियल एस्टेट कारोबार शामिल हैं। फार्मूला वन पर उन्होंने करीब १७०० करोड़ रुपये निवेश किया है, फार्मूला वन के प्रमुख बर्नी एक्लेस्टोन से उन्होंने इस रेस को दस साल तक देश में कराने की डील की है, तब तक उन्हें उम्मीद है कि ये खेल देश में भी इतना लोकप्रिय हो चुका होगा कि उनके लिए मुनाफे का नया वेंचर खोलेगा।

ग्रेटर नोएडा के पास जहां उन्होंने ५.१३६ किलोमीटर के इस ट्रैक को बनाया है, वहां भविष्य में तमाम तरह की दूसरी रेस प्रतियोगिताएं भी आयोजित होनी शुरू होंगी, जो इस ट्रैक से फार्मूला वन के अलावा उनकी आय का नया स्रोत बनेगा। इस जगह को वो जेपी स्पोर्टस सिटी के नाम से विकसित करने जा रहे हैं, जहां क्रिकेट स्टेडियम के अलावा हॉकी का मैदान और तमाम दूसरे खेलों की सुविधा होगी। यहां ये भी नहीं भूलना चाहिए कि आने वाले सालों में खेल इस देश में बड़ी इंडस्ट्री के तौर पर उभर कार सामने आएंगे, ग्लोबल स्पोर्टस की अग्रणी इवेंट कंपनी इंटरनेशनल मैनेजमेंट ग्रुप (आईएमजी) का आकलन है कि भारत में आने वाले सालों में एक लाख करोड़ रुपये की खेल इंडस्ट्री की संभावना है, इसलिए बड़े स्पोर्टस इवेंट्स और बड़ी ग्लोबल स्पोर्टस मैनेजमेंट कंपनियां भारत का रुख कर रही हैं। खैर हम जेपी ग्रुप के फायदे की ओर लौटते हैं। जेपी ग्रुप का दावा है कि बेशक दुनियाभर के कई ट्रैक घाटे का सौदा बन गये हों लेकिन हमारे सामने वो स्थिति कभी नहीं आयेगी, क्योंकि इसके लिए कंपनी विशेष योजना बनाई हुई है।

जेपीएसआई के चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर समीर गौड़ का कहना है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि इंडियन ग्रां प्री घाटे का सौदा नहीं साबित होगी। दरअसल जहां सर्किट बनाया गया है वहां जेपी ग्रुप ने आने वाले समय में एक पूरी आधुनिक कालोनी बसाने की योजना बनाई हुई है, जिससे कंपनी को अच्छी आमदनी होगी। ज्योंही फार्मूला वन के भारत में आने पर मुहर लगी भारत की शीर्ष मोबाइल आपरेटर कंपनी भारती एयरटेल इसकी टाइटल स्पांसर बनने में जुट गई। इससे कंपनी को ग्लोबल ब्रांड के तौर पर खुद को स्थापित करने का मौका मिलेगा। कई देशों में कंपनी अपने कारोबार बढ़ाने या बिजनेस पार्टनर तलाशने में जुटी है, उसमें भी उसके ब्रांड को ये प्रतियोगिता नई पहचान देगी। हालांकि टाइटल स्पांसरशिप पाने की दौड़ में कई कंपनियां लगी थीं लेकिन एयरटेल ज्यादा जोरशोर से अपना अभियान चलाया। फार्मूला वन प्रमुख एक्लेस्टोन से कई दौर की मुलाकात के बाद बात बन गई।

कंपनी ने इसके लिए वास्तव में कितनी रकम लगाई इसका खुलासा न तो एयरटेल ने सही तरीके से किया और न ही फार्मूला वन आयोजकों ने लेकिन जो रकम एयरटेल की ओर से आधिकारिक तौर पर बताई गई वो ४० से ५० करोड़ के बीच की है। साथ ही तमाम अन्य ब्रांड खुद को इसके साथ जोडऩे की तैयारी में जुट गये हैं। मसलन हीरो मोटर्स ने तुरत फुरत भारत के सबसे तेज शख्स यानि नारायण कार्तिकेयन को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लिया। हिस्पानिया रेसिंग टीम, जिसके नारायण इंडियन ग्रां प्री के दौरान हिस्सा होंगे, उसमें भी हीरो मोटर्स एक स्पांसर के तौर पर जुड़ गया है। वहीं भारत में पहले से मौजूद ब्रांड रेड बुल और वोडाफोन मार्केटिंग में जुट गये हैं।

 ये दोनों ब्रांड लंबे समय से फार्मूला वन के साथ हैं, इस पर अपनी मार्केंटिंग के जमकर पैसा बहाते हैं, लिहाजा भारत में अपने ब्रांड प्रोमोशन के लिए उनके पास ये सुनहरा मौका है। फोर्स इंडिया भारतीय रेसिंग क्लब है। इसके मालिक यूूबी ग्रुप के विजय माल्या हैं। उनके लिए ये कोई कम अच्छा मौका नहीं, वो अपने डगमगाती हुई किंगफिशर एयरलाइंस, यूबी ग्रुप के दूसरे ब्रांड्स के साथ आईपीएल फ्रेंचाइजी रायल चैंलेंजर को एक नई इमेज दे सकते हैं। वैसे यहां ये बताना जरूरी है कि बेशक फोर्स इंडिया टीम फार्मूला वन रेस में बहुत बेहतर परिणाम नहीं दे रही है लेकिन स्पांसर्स के मामले में ये वो सर्किट की आला छह टीमों में शामिल हो चुकी है।

फार्मूला वन है तो आटोमोबाइल कंपनियां के लिए भी ब्रांड प्रोमोशन के लिए एक और सुनहरा अवसर है-वाक्स वैगन पहले से ही नेशनल रेसिंग चैंपियनशिप के साथ जुड़ी हुई है। मर्सीडिज फार्मूला वन की आफिशियल पार्टनर है, वो ग्रेटर नोएडा में अपनी ड्राइविंग एकेडमी खोलने जा रही है। उत्तर भारत में इस मेगा इवेंट के बाद रेसिंग को एक नये मायने मिलना है। अब तक रेसिंग का बड़ा बेस चेन्नई और कोयम्बटूर में था, लिहाजा रेसिंग के आला ड्राइवर्स वहीं से निकलते थे, ये तस्वीर अब बदलेगी, अब इसमें उत्तर क्षेत्र खासकर दिल्ली का दखल बढेगा। वैसे अभी भी दिल्ली के कुछ युवा नेशनल रेसिंग चैंपियनशिप में शिरकत करते हैं, लेकिन उन्हें जो एक्सपोजर और प्रैक्टिस मिलनी चाहिए, वो पर्याप्त नहीं है, लिहाजा उसमें भी बदलाव आयेगा।

आने वाले समय में अगर दिल्ली और उत्तर भारत से एफ वन के लिए नये चैंपियन निकलकर आयें तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। जैसा हमने पहले कहा खेल और टीवी का चोलीदामन का रिश्ता है, वो फार्मूला वन में भी है। बल्कि यों कह लीजिये कि फार्मूला वन असल टीवी इवेंट ही ज्यादा है। फार्मूला वन कंपनी को, जी हां, ये कंपनी है, जिसे नियंत्रित इंग्लैंड के बर्नी एक्लेस्टोन करते हैं, को सबसे ज्यादा फायदा इसके प्रसारण अधिकार बेचकर होता है। भारत में इसके प्रसारण अधिकार ईएसपीएन के पास हैं, सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि एशिया के २४ देशों के प्रसारण अधिकार उसी ने एक्लस्टोन की कंपनी से खरीदे हुए हैं। उसे भी इस रेस मेले से काफी बिजनेस की उम्मीद है। हालांकि इंडियन ग्रां प्री इवेंट के टीवी रेट पांच महिने पहले भारत में हुए वल्र्ड कप फाइनल की तुलना में चौथाई कम हैं, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि ये इवेंट भी भारत में पहली बार ही हो रहा है। आने वाले सालों में अगर इसके पैर जमे तो प्रसारण कंपनी का मुनाफा और बढेग़ा। आमतौर पर हमारे देश में क्रिकेट के बाद फुटबाल और रेसिंग टीवी पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले खेलों में है।

वर्ल्ड वाइड बात करें तो एफ वन को फुटबाल के बाद सबसे ज्यादा देखा जाता है। कुछ मिलाकर इस साल अब तक हुई दस एफ वन रेसिंग की व्युअरशिप २१.६ मिलियन की रही है। इंडियन ग्रां प्री में भारतीय दर्शकों के जुडऩे के कारण इसमें २० फीसदी की बढोतरी होने की उम्मीद है। अब जरा ये भी देखें कि बर्नी एक्लस्टोन अपने फार्मूला वन को भारत क्यों ला रहे हैं, क्या केवल इसलिए कि यहां से उन्हें एक मोटा आयोजक मिला, संरचना मिली, खेल को प्रोमोट करने की संभावना दिखी, इसलिए वो तैयार हो गये। ऐसा भी नहीं है। एक्ल्स्टोन इंग्लैंड के बिजनेसमैन हैं, उन्हें वहां के चौथा धनी शख्स माना जाता है। कहा जाता है कि दुनिया में एफ वन के विस्तार के साथ ही उनका अपना बिजनेस भी विस्तार लेता है।

टीवी प्रसारण के अधिकार उनकी कंपनी के पास हैं। एफ वन की कारों को दुनियाभर में ले जाने का काम उनके कार्गो करते हैं। फार्मूला वन से जुड़ी लाजिस्टिक कंपनी से उनके तार जुड़े हैं। फार्मूला वन के हर पहलू को उनकी कोई न कोई कंपनी नियंत्रित करती है। इसलिए हर विस्तार उनकी जेब को और मोटा करता है। उनकी एक फ्लाइट कंपनी भी है, जिसका कारोबार वो अब एशिया में फैलाना चाहते हैं,ऐसे में दुनिया की उभरती हुई आर्थिक ताकत भारत को नजरंदाज कैसे करते। ट्रैवल और टूरिज्म इंडस्ट्री को मिलेगी उछाल फार्मूला वन अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में ग्रेटर नोएडा में होगा, लेकिन हालत ये है कि अभी से दिल्ली, नोएडा और आसपास के होटल उन तारीखों में फुल हो चुके हैं। देश के टै्रवल और टूरिज्म को इससे खासी उछाल मिलने की संभावना है।

कई देशों में एफ वन ने वहां के टूरिज्म और ट्रैवल व्यवसाय को उछाल दी है। २००३ से एफ वन के लिए कोशिशें जारी थीं फार्मूला वन को सबसे पहले भारत में लाने की कोशिश २००३ के आसपास आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबु नायडु ने की थी। लेकिन तब एफवन सुप्रीमो बर्नी एक्लस्टोन को लगा था कि भारत में उसकी संभावना अभी नहीं है। फिर आंध्र प्रदेश में इसके लिए जो जगह देखी गई थी, उसमें ट्रांसपोर्टेन और दूसरी दिक्कतें थीं। इसके बाद भारतीय ओलंपिक संघ ने २००७ में इसके लिए गंभीर तरीके से कोशिशें शुरू कीं। तत्कालीन आईओए अध्यक्ष सुरेश कलमाडी ने बर्नी को भारत आमंत्रित किया था, खुद उनसे मुलाकात भी की थी। उन्होंने दावा किया था कि एफ वन २०१० तक भारत आ जायेगा। इस पहल में फोर्स इंडिया टीम के मालिक विजय माल्या भी उनकी मदद कर रहे थे। लेकिन न जाने कहां मामला बिगड़ गया और कलमाडी के सुर बदल गये। उन्होंने कहना शुरू कर दिया बड़े पैमाने पर एफ वन के लिए जमीन अधिग्रहित करना, पैसा इकट्ठा करना आईओए की जिम्मेदारी नहीं है। लिहाजा आईओए ने अपना हाथ एफवन को भारत में लाने की कोशिशों से खींच लिया।

तब तस्वीर में जेपी ग्रुप की एंट्री हुई। जो बर्नी से मिले। कई दौर की बातचीत के बाद जेपी ग्रुप ने 40 मिलियन डालर की राशि देकर लाइसेंस फीस खरीद ली। २००९ में जर्मनी के जाने माने फार्मूला वन आर्किटैक्ट हर्मन टिके की देखरेख में ग्रेटर नोएडा के पास काम शुरू हुआ। बड़े पैमाने पर मजदूर और इंजीनियर झौंक दिये गये। अब पिछले महिने इसका मोटा मोटा काम खत्म हो चुका है। इसे एफआईए यानि फेडेरेशन इंटरनेशनल आफ आटोमोबाइल ने हरी झंडी दे दी है। ये पूरा ट्रैक ८६५ एकड़ में फैला हुआ है।

ईशा श्रीवास्तव

खेल-कूद, मनोरंजन, युवा मंच, विकास, विचार, संस्कृति, स्वास्थ्य

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