हितों के दलदल में फंसा खेल विधेयक

बात पुरानी नहीं है, इसी दशक की है, पहले यूपीए सरकार के पहले टर्म में खेल मंत्री बनाये गये मणिशंकर अय्यर खेल पॉलिसी बनाना चाहते थे। उन्होंने ये पालिसी बनाई भी, लेकिन इसका इतना विरोध हुआ कि ये ऐसे ठंडे बस्ते में गई कि वहां से निकली ही नहीं फिर एम एस गिल जब खेल मंत्री बने तब उन्होंने खेल संघों को काबू में करने और भारतीय ओलंपिक संघ में पदाधिकारियों के कार्यकाल तय करने की बातें कहीं लेकिन उनके भी इस कदम का खेल संघों ने जिस तीव्रता से विरोध किया, उसके चलते उन्हें भी अपने पैर पीछे खींच लेने पड़े। इसके बाद अब मौजूदा खेल मंत्री अजय माकन ने करीब एक साल पहले पद संभालने के बाद अपनी जो प्राथमिकताएं गिनाईं थीं, उसमें सबसे पहली थी-एक खेल विधेयक लाकर देश में खेलों की बदरंग तस्वीर को सुधारना और खेल संघों के प्रशासन को दुरुस्त करना। हालांकि माकन के कदम का भी विरोध कम  नहीं हुआ लेकिन वो लगे रहे। उनके मंत्रालय और विशेषज्ञों की टीम ने, जिसमें जाने माने खिलाड़ी और खेल विशेषज्ञ शामिल थे, ने खेल विधेयक का मसौदा तैयार कर ही डाला। इसमें खेल संघों के साथ बीसीसीआई को भी नये खेल अधिनियम लाने का प्रस्ताव था।

इस खेल विधेयक की जो खास बातें थीं, उसमें खेल पदाधिकारियों  की अधिकतम उम्र ७० वर्ष करने, कार्यकाल अधिकतम तीन बार और खेल संघों की कार्यकारी समिति में कम से कम २५ फीसदी खिलाडिय़ों का कोटा तय करने की बातें थीं। इसके अलावा तमाम खेल संघों से जुड़ी शिकायतों के लिए एक आंबडुसमैन बनाने और सभी खेल संस्थाओं को एक राष्ट्रीय खेल विकास परिषद के तहत लाने का भी प्रस्ताव था। जाहिर है सरकार की मंशा सभी खेल संघों में कामकाज को ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की थी। इसके लिए खेल मंत्रालय ने सभी खेल संस्थाओं को आरटीआई के तहत लाने की बात भी की थी। खेल विधेयक पर अगर खेल संघों को विरोध था तो वो तो जगजाहिर ही था,लेकिन सबसे ज्यादा विरोध भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानि बीसीसीआई को था,जो किसी भी हालत में ऐसे किसी भी बिल के तहत नहीं आना चाहता था और न ही आरटीआई उसे मान्य थी।

जब ये मसौदा पिछले पखवाडे कैबिनेट की बैठक में पहुंचा तो इसे बगैर ज्यादा चर्चा के गिरा दिया गया, वजह ये थी कि खुद कैबिनेट में बैठे आला मंत्रियों में कई इस बिल के जबरदस्त खिलाफ थे। इस आला मंत्रियों में शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, विलासराव देशमुख, फारुख अब्दुल्ला, कमलनाथ जैसे लोग शामिल थे। इनके इस बिल के विरोध करने के कारण लगभग एक जैसे ही थे,क्योंकि इनमें से मंत्री बीसीसीआई से जुड़े हुए हैं तो कुछ अन्य खेल संघों से। लिहाजा इनका साफ कहना था कि उन्हें ये विधेयक मंजूर नहीं। इस बिल को लेकर कैबिनेट में कोई सार्थक चर्चा होती और फिर बिल को दोबारा संशोधन के लिए खेल मंत्रालय के पास भेजा जाता तो भी ठीक था, लेकिन बगैर ऐसी चर्चा के व्यक्तिगत बिंबों के आधार पर किसी महत्वपूर्ण मसौदे को खारिज करना देशभर में ज्यादातर लोगों की समझ में नहीं आया। लेकिन इससे देशभर में खिलाडिय़ों को खासी निराशा हुई। आमतौर पर उनका मानना है कि ये बिल देश में खेल सुधारों की दिशा में नई पहल करने वाला सिद्ध होता और भारतीय खेलों को इससे मदद मिलती। वहीं ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर खेल मंत्री अजय माकन को जमकर समर्थन मिला।

इस बिल में जिन मुद्दों को लेकर आमतौर पर कैबिनेट को इतराज था, वो उम्र को लेकर था। दूसरा एतराज बीसीसीआई के जुड़े लोगों को है कि क्रिकेट बोर्ड अगर सरकार से एक भी पैसे की मदद नहीं लेता तो उसे क्यों नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। वो किसी भी तरह सरकार के इस बिल से जुडऩा नहीं चाहता। हालांकि बीसीसीआई की ये बात सही है कि पिछले आठ दशकों से जब से ये बोर्ड हकीकत में आया है, तब से इसने कभी सरकार से कोई मदद नहीं ली, लिहाजा आरटीआई के प्रावधानों के तहत इसे लाया ही नहीं जा सकता। अलबत्ता बीसीसीआई में पदाधिकारियों के टर्म को लेकर बड़ा साफसुथरा नियम है और इसका लगातार पालन भी होता रहा है। बीसीसीआई का अपना मानना है कि सरकार हमें हमारे हाल पर छोड़ दे, हमें अपनी संस्था में सरकारी दखलंदाजी कतई पसंद नहीं। इसमें भी कोई शक नहीं कि हमारे देश में वाकई कोई खेल संस्था बेहतर तरीके से काम कर रही है और उसने हमेशा नये तौर तरीके अपनाये हैं तो वो बीसीसीआई है। उसके मार्केटिंग के तौरतरीकों ने उसे हमेशा सबसे अलग तो किया ही साथ ही बाजार का भी सबसे पसंदीदा खेल बना दिया। वर्तमान में बीसीसीआई दुनिया के सबसे धनी खेल संघों में हैं। जब भी दुनिया में खेल की संस्थाओं की बात चलती है तब उसका उदाहरण दिया जाता है। लेकिन ये भी सही है कि बीसीसीआई का मतलब कोई प्राइवेट कंपनी नहीं है, जैसा की बोर्ड के अधिकारी लगातार  साबित करने में लगे हैं, इसके साथ देश का नाम जुड़ा है, प्रतिष्ठा जुड़ी है और जब भी टीम देश या विदेशों में खेलती है तो वो भारतीय टीम के नाम से ही खेलती है।

लिहाजा बीसीसीआई का दृष्टिकोण एकदम साफ है कि न तो उसे सरकारी नियंत्रण के तहत आना है और न ही आरटीआई की बाध्यता उस पर लागू की जा सकती है। माना जाता है कि संसद में ढेर सारे असरदार मंत्री और विभिन्न पार्टियों के सांसद बीसीसीआई की इकाईयों से जुड़े हैं, लिहाजा इसे भविष्य में कैबिनेट और फिर संसद में पारित कराना मुश्किल होगा। जहां तक अन्य खेल संस्थाओं का सवाल है उनका कहना है कि उन्हें न तो जवाबदेही से गुरेज है और न ही पारदर्शिता से, वो सरकार को एक एक पैसे का हिसाब दे सकते हैं, यहां तक कि खेल संघों को आरटीआई के तहत आने में भी कोई मुश्किल नहीं लेकिन उनके रिजर्वेशन आयुसीमा और कार्यकाल को लेकर हैं। तमाम खेल संघों का कहना है कि वो इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल के चार्टर से संचालित स्वायत्तशासी संस्थाएं हैं, यहां तक इंटरनेशलन स्तर पर भी न तो इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल में उम्र और टर्म को लेकर कोई बाध्यता है और न ही फीफा और दूसरे खेल फेडरेशंस में। आईओसी के पूर्व अध्यक्ष जुआन अंतोनियो समारांच ७५ साल का होने के बाद इस संस्था के अध्यक्ष पद से हटे, इससे पहले वो अध्यक्ष के पद पर करीब बीस सालों पर रहे। मौजूदा अध्यक्ष जैक रोजे खुद वर्ष २००१ से ओआईसी के अध्यक्ष बने हुए हैं। फीफा के अध्यक्ष सैप ब्लाटर १९९८ से अध्यक्ष हैं, अगर वो अगले कार्यकाल में भी अध्यक्ष बनते हैं तो उनकी उम्र ७० साल से ऊपर निकल जायेगी। केवल ये ही नहीं बल्कि तमाम इंटरनेशनल स्पोट्र्स फेडरेशंस में अध्यक्ष पद पर लोग कई टर्म से काबिज हैं और कई सत्तर के आसपास हैं। खेल संघों के पदाधिकारियों का तर्क ये भी है कि अगर आयुसीमा की पाबंदी किसी केंद्रीय मंत्री या प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति जैसे पदों पर लागू नहीं होती तो उनपर इसकी पाबंदी क्यों। वैसे उनके इन तर्कों में दम तो है, लेकिन पूर्व स्टार एथलीट अश्विनी नाचप्पा का सवाल भी गौरतलब है, जो पूछती हैं कि भारतीय खेल संघों पर कई दशकों से अपने पदों पर काबिज लोगों ने पावर इंज्वाय करने के अलावा खेल के लिए कुछ नहीं किया है। वो अपील करती हैं बदलाव शाश्वत प्रक्रिया है, इसलिए किसी भी सकारात्मक बदलाव पर इतना विरोध क्यों।

निशानेबाजी में देश को बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड दिलाने वाले अभिनव बिंद्रा ट्विटर पर खेल मंत्री के कदम का स्वागत करते हैं। वो कहते हैं कि वो ऐसे खेल मंत्री हैं, जिनकी सचमुच तारीफ की जानी चाहिए।

विरोधाभास की स्थिति ये है कि खेल संघों पर काबिज लोग न तो कुर्सी छोडऩे को तैयार हैं और न ही भारतीय खेलों को तेजी से बढ़ाने का उनके पास अपना कोई विजन है, वो हमेशा सरकारी  सहायता और सिस्टम का रोना रोते मिलते हैं। वहीं खिलाडिय़ों की बड़ी जमात इन सारे खेल पदाधिकारियों से आजीज आ चुकी है, उनका मानना है कि इन सबको को वास्तव मे खेलों में कोई दिलचस्पी नहीं बल्कि  ये खेलों का बेड़ा गर्क ही कर रहे हैं।

रत्ना श्रीवास्तव

सी-७९, सेक्टर २३

नोएडा

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