अब बारिश गुदगुदाती क्यों नहीं?

राहुल डबास

मॉनसून मोहब्बत का वक्त या मातम का मंज़र, मैं बाढ़ या बहार की बात नहीं कर रहा केवल आम बारिश और हम लोगो की बात बता रहा हूं। मेरी दो महिला मित्र रही हैं। एक कॉलेज के जमाने में थी और दूसरी जब मैं नौकरी पेशा बन चुका हूं। कॉलेज के जमाने में हम आम युवओं की तरह हम बारिश का इतज़ार करते हैं, उसमें भीगने का, खेलने का, हसंने का और घूमने का…भीगी दिल्ली धुली-धुली सी लगती थी…खासतौर पर विजय-चौक (इंडिया गेट) पर, फिज़ा में गर्मी के बाद की ठंडक थी, रास्तों पर मस्ती की रंगीनियां। डीयू में दोस्तों के साथ पंडित की चाय– शर्मा की कचौड़ी खाना… उसमें पानी छलकना, बरिश में बाइक रेसिगं, रिंग रोड पर हल्ला-गुल्ला… बहुत याद आता है।

बमुश्किल तीन-चार साल गुज़रे होंगे लेकिन मस्ती का वो मंज़र बदल चुका है। आज मेरी महिला मित्र को मॉनसून मातम सा लगता है, पानी मानो मुसीबत की एसिड-रेन, कार है तो ठीक वरना सब बेकार है। आखिर भीगने के बाद मैट्रो की सवारी नहीं हो सकती, मॉल के एसी से ठंड लगने का खतरा है, कपड़े चिपचिपें हो जाते है। लेकिन क्या महज़ चंद सालों में मॉनसून का मंज़र बदल गया?

आपको ये कहानी मेरी लग सकती है, लेकिन इस बेगानी कहानी का सरोकार बुद्धू डिब्बे (कम्पूटर) के आगे बैठे आप से भी है। यकीन नहीं आता, तो चलो आपको थोड़ा फ्लैश-बैक में लिये चलता हूं। छुटपन में मां हमें बताती थी, कि जब चींटी के पंख निकल आयें या चीड़ियां रेत में नहाने लगे तो समझो बारिशों का मौसम करीब है। कुछ याद आया !! अख़बार के उस पन्नें में बारिश में नहातें गरीब बच्चो की तस्वीरें, मस्ती करती लड़कियों के फोटो..कितना सुकून देता था। पास के सोम-बाज़ार से हरियाली-तीज की शॉपिंग, सरकारी चैनल (डीडी-न्यूज) पर रोज़ रात देखना कि मॉनसून कितने दिनों बाद आ रहा है। पहली बारिश में मद-मस्त होकर नहाना..घर पर पूरे परिवार के साथ गर्मा-गर्म पकौड़े खाना। ये पढ़कर ही चहरे पर चमक आ जाती है ना !!

मैं स्कूल में हुआ करता था बॉबी देओल की एक फिल्म आई थी– बरसात। हिन्दी फिल्मी-फंसाने में भी बरसात बहार का सिम्बल हुआ करती थी..आज तो मुबंई में हुई आफती-बारिश पर इमरान हाशमी की फिल्मों का चलन है। कभी कक्षा पहली की किताबों में मुल्क का मासूम बचपन पढ़ता था, कि भारत एक कृषि-प्रधान देश है जिसकी लाइफ-लाइन मॉनसून है। त्योहार इसी शुरु होते थे..हसीं भी और खुशी भी…

आज कि किताबों में भारत कृषि-प्रधान देश से वैश्विक-आर्थिक महा-शक्ति बन गया हैं। दिल्ली का यमुना-खादर जहां कभी फसलें लहराती थी, बारिश में बच्चे तैरते थे, आज अक्षरधाम मंदिर और खेल-गांव खड़ा है। बारिश अब बहार नहीं ब्रेकिंग न्यूज बनकर आती है। कल किसी चैनल पर आ रहा था – ब्रेकिगं न्यूज राजधानी में बारिश, आफत में दिल्ली। मेरे भाई मॉनसून में बारिश नहीं होगी तो क्या रेत की आंधिया चलेंगी, और बारिशों में पानी गिरना भला कौन सी ब्रेकिंग-न्यूज है? ट्रैफिक जाम तो आये दिन होता है तो क्या भगवान पानी बरसाना छोड़ दें..यमुना आपके घरों तक बाढ़ लेकर नहीं पहुंची है साहब, आपके उसकी ज़मीन छीनकर वहां अपना बसेरा बना लिया है। पता नहीं आज-कल अख़बार से वो बारिश के पानी में खुशी में भीगती युवतियां और तैरते बच्चे कहा खो गये।

हम लोगों को एसी की आबो-हवा इतनी बेबस बना चकी है, कि ठंडी पुर्वा (बरसाती हवा) रास नहीं आती। डर तो इस बात का कि कहीं आते वाले पढ़ी पहली बरसात में भीगने के स्वाद ही भूल ना जाये। अपनी कार के शीशा को जरा उतारकर देखो नन्ही-बूदें कुछ कहना चाहती है। बारिश में आज भी पंछी अपने गीत गाते है, लेकिन हम एफएम के दीवानों का उनका सुर सुनाई नहीं देता। सुने भी तो कैसे, हमारे कान तो ईयर-फोन से बंद हो गये हैं। चिड़ियां के घोसलों को फ्लैटो में रहकर हम लोग बादलों को निहारना ही भूल चके हैं। भूल चुके ही बादलो में कभी परियों की कहानी दिखती थी..शक्ले पुरानी दिखती थी।

बारिश से बाहार आज भी आती है, दिल्ली पानी से धुली-धुली हो जाती है। मॉनसून मस्ती और मुहब्बत की राग-भैरवी गाता है, चंद दिनों के लिये सही गंदा-नाला बन चुकी यमुना नदीं सी नज़र आती है। परिवार वालो के पास एक दूसरे के लिये वक्त हो तो सरोईघर में पकोड़े तले जा सकते है। बेबस ट्रैफिक जाम में फंसे हम लोग अगर एक पल लिये बच्चे बन जाऐं, तो ये पानी आज भी प्यारा हैं, काग़ज की किश्ती की तरह, रिम-झिम फुहारें सनम की यादें आ भी दिलाती है, बारिश का शोर में मां की लोरी याद करते देखो.. मॉनसून के फिर मुहोब्बत हो जाएगी।

विचार, संस्कृति, सामाजिक, साहित्य

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