मैं तुम्हारा प्रेमी तलाश करता हूँ तुम्हें ……

दिनेश कुमार सिंह
मैं तुम्हारा प्रेमी
तलाश करता हूँ तुम्हें
उन सड़कों पर जहाँ तुम
पत्थर तोडा करती थी
लगता था जैसे कोई कलाकार
अपनी प्रेयसी की मूर्ती बना रही हों
मैं तुम्हारा प्रेमी
तलाश करता हूँ तुम्हें
उन जगहों पर जहाँ तुम
भोर में बैठकर बर्तन साफ़ करती थी
लगता था जैसे कहीं दूर
गिरिजाघर की घंटियाँ बज रही हो
मैं तुम्हारा प्रेमी
तलाश करता हूँ तुम्हें
उन घरों में जहाँ शाम को
गाते हुए तुम जात खीचा करती थी
लगता था जैसे किसी
मस्जिद में कोई अजांन दे रहा हो,
पर आज तुम दिखती हो,
बीयर बार में
तेज स्वर लहरियों के बीच
थिरकते हुए
जिसके शोर में मैं अपने,
सुलगतें अरमानो को कह नहीं पाता
आज तुम दिखती हो,
दोस्तों के साथ
सिगरेट का कश लगाते हुए
और मै दूर बैठा अपने दिल के जज्बात
इशरो से भी नहीं समझा पाता
मैं तुम्हारा प्रेमी तलाश करता हूँ तुम्हें …………………

(लेखक जेएनयू में शोधार्थी हैं)

नारी - सशक्तिकरण, फिल्म, युवा मंच, विचार, संस्कृति, साहित्य

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