‘सारा बजट तो सितारों पर खर्च करना पड़ता है’

मोटे तौर पर यह कहानियों का दशक रहा है। इस दौरान दर्शकों की तरफ से नई और अलग तरह की सामग्री की मांग आई और इसी मांग ने इन कहानियों को सफल बना दिया। ऐसी फिल्में जो अलग हटकर थीं, जो कुछ कहती थीं, दिलचस्प ढंग से कहती थीं, जो लीक से हटकर थीं, वे सभी सफल हुईं। कहानियों का बोलबाला रहा, जो अच्छी बात है और होना भी यही चाहिए।

वैसे यह शुरुआत 90 के दशक से ही हो गई थी, दर्शक सामान्य कहानियों से बिदकने लगे थे। और मैंने पाया कि नई पीढ़ी अच्छे सिनेमा की ओर जा रही है। इससे भारतीय सिनेमा में एक नई संवेदना जगी और इस दशक में तो वह पूरी तरह जमीन पर उतर आई। आज हम इस दशक के आखिरी वर्ष की संध्या वेला में हैं, इसलिए अब यह सोचने का समय है कि फिल्म उद्योग किस तरफ जा रहा है। मुझे लगता है कि हमें इसके लिए तीन चीजों पर ध्यान देना चाहिए।

पहला तो मुझे यह लगता है कि हमें ऐसा माहौल, ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिसमें नौजवान फिल्मकारों को ऐसी छोटी फिल्में बनाने का मौका मिले, जिसमें बड़े स्टार न हों। हमें यह कोशिश करनी होगी कि नई प्रतिभाएं न सिर्फ यहां आएं, बल्कि फलें-फूलें भी। मुझे चिंता इस बात की है कि मौजूदा बाजार वाले माहौल में यह हो नहीं सकता।

दर्शक तो ऐसी फिल्मों के लिए पहले से ही तैयार हैं, लेकिन बाजार की उस व्यवस्था को बदलना होगा जो स्टारकास्ट पर ही सारा ध्यान देती है। जब एक फिल्मकार फिल्म बना रहा हो, तो उसके दिमाग पर यह डर हावी नहीं होना चाहिए कि उसकी फिल्म में बड़े स्टार नहीं हैं, इसलिए इसे कौन खरीदगा, कौन इसका वितरण करेगा और कौन इसे दिखाएगा? हमारे पास ऐसे स्टूडियो तो हैं जो नए फिल्मकारों को प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन हमें ऐसे मल्टीप्लैक्स भी चाहिए जो ऐसी फिल्मों को दिखाएं।

बल्कि मुझे तो लगता है कि मल्टीप्लैक्स को छोटी फिल्मों को ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिए। अभी तक जो व्यवस्था है वह बड़ी फिल्मों की तरफ ज्यादा झुकी हुई है। ऐसे माहौल में छोटी फिल्म के लिए सफलता का कोई मौका नहीं है। छोटी फिल्म को सारा प्रचार एक दूसरे की बातचीत और कहने-सुनने से ही मिलता है, अगर इन्हें ज्यादा समय न मिले तो इनके पास आर्थिक रूप से कामयाब होने का मौका आएगा। इनमें ताजा दौर की वे फिल्में भी हैं, जिन्हें लोग सिर्फ जज्बे की वजह से बना रहे हैं।

हमें सिर्फ आंकड़ों पर ध्यान नहीं देना होगा, क्योंकि इसका तो मतलब होगा बहुत छोटी दूरी की सोच। अभी तो यह है कि अगर मैं एक छोटी फिल्म बनाऊं तो मैं सोचूंगा कि यह फिल्म दिखाई कहां जाएगी? इसके कितने शो होंगे ? किन शर्तो पर? तीन दिन बाद ही फिल्म को सिनेमा हॉल के बाहर कर दिया जाएगा। नौजवान प्रतिभाएं चाहती हैं कि उनकी फिल्म को कम से कम इतना समय तो मिले कि लोग उसे देख सकें। यहां मैं उन सारी प्रतिभाओं की बात कर रहा हूं जो अभिनेता हैं, निर्माता हैं, निर्देशक हैं या लेखक हैं।

दूसरी बात यह है कि नौजवान प्रतिभाओं को अपनी फिल्म की आर्थिक कामयाबी या नाकामी की जिम्मेदारी भी खुद ही लेनी होती है। जिन्होंने इस कारोबार में खासा नाम कमा लिया है और लोग उनकी साख के कारण उनकी फिल्म देखने आते हैं, उन्हें यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी चाहिए। अगर फिल्म चल जाती है तो उसकी कमाई पर आपका अधिकार है, नहीं चलती तो घाटा भी झेलना ही होगा।

काम की गुणवत्ता का जज्बा हममें होना चाहिए। हमने अगर अपने काम के कारण उद्योग में अपनी जगह बना ली है, और अपनी मर्जी के हिसाब से काम की आजादी चाहते हैं तो हमें यह जिम्मेदारी लेनी ही होगी। बदकिस्मती से बहुत सारे सितारे ऐसे हैं जो अपने काम के लिए भारी कीमत चाहते हैं। मेरा कहना है कि वे ऐसी परियोजनाओं की लागत न बढ़ाएं।

तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपने लेखकों को ज्यादा महत्व देना चाहिए। इसे मैं पिछले कई साल से कह रहा हूं। जब तक हम यह नहीं करते हम बहुत महान फिल्में बनाने की उम्मीद नहीं रख सकते। उन्हें ज्यादा पैसे दीजिए, उनमें निवेश कीजिए और फिर उनसे महान काम मांगिए। इस निवेश के फल आपको तुरंत नहीं मिलेंगे, लेकिन आप इससे दीर्घकालिक फायदों की नींव जरूर रख देंगे।

मानवीय संवेदनाएं हमारे पास सदियों से हैं। उनकी नए ढंग से व्याख्या करना ही लेखन का काम है। पर आपको ईमानदार होना पड़ेगा। ईमानदारी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है। बॉक्स आफिस की बात तो इसके बाद शुरू होती है।

मेरे हिसाब से एक अच्छी कहानी में एक मजबूत और स्पष्ट धारणा होनी चाहिए, साथ ही चाहिए तुरंत शुरू हो जाने वाला एक जोरदार अंतर्विरोध, जो कहानी को लक्ष्य की ओर ले जाए, दिलचस्प चरित्र, दिलचस्प अंतर्कथाएं और एक ऐसा अंत जो कहानी की धारणा को पुष्ट करता हो। पर सबसे बड़ी बात है कि अच्छी कहानी के कड़े नियम नहीं होते हैं।

फिल्म बनाना कहानी कहना ही है, लेकिन अगर आप एक ही कहानी को हर रोज कहेंगे तो वह कितनी दिलचस्प रह जाएगी? इस उद्योग की फितरत ही ऐसी है कि आपको कुछ नया देना ही होगा। यह कोई टूथपेस्ट नहीं है, कुछ नया कहना ही होगा। हममें से ज्यादातर को पता है कि कहना क्या है, दिक्कत यह है कि हम कामयाब की ओर देखते हैं और वही कहानी बार-बार कहते हैं।

धन्यवाद उन लेखकों का जिन्होंने एक सिरे से नई चीज रची। उनका काम ज्यादा मुश्किल है। मैं अभिनेता हूं, मैं दस बजे पहुंचता हूं और मेरे पास कई पटकथाओं में से चुनने की आजादी होती है। लेखकों और निर्देशकों को एक सिरे से यह काम शुरू करना होता है। मेरा काम इतना कठिन नहीं है। और अंत में इतना ही कि अगर हम नौजवान प्रतिभाओं को आगे लाते हैं, तो इससे विविधता आएगी। इस उद्योग की स्वस्थ तरक्की के लिए यह बहुत जरूरी है।

 हिन्दुस्तान से साभार

फिल्म, मनोरंजन, साहित्य

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