हमें राजेंद्र प्रसाद जैसा व्यक्तित्व पैदा करना होगा: नीतू चंद्रा

 


(वह शोख है, वह चंचला है, वह साहसी और निडर भी है। उसमें सामर्थ्य है प्रतिकुल परिस्थितियों में लगातार लड़ते रहने की और सफ़लता के नये कीर्तिमान स्थापित करने की। वह बिहार की बेटी है, इसलिये उसमें अक्खड़ता भी है और बिहारी संस्कृति की छाप भी। उसके रग-रग में बिहार बसा है। वह बिहार को नई पहचान देने के लिये दृढनिश्चयी है। अपना बिहार के संपादक नवल किशोर कुमार ने बिहार की लाडली बेटी नीतू चंद्रा से अधूरी बातचीत की।)


नवल – बिहार में फ़िल्म इंडस्ट्री के भविष्य को आप किस रुप में देखती हैं?

नीतू चंद्रा – नवल जी, आप किसकी बात कर रहे हैं? यदि आप फ़िल्मसिटी की बात कर रहे हैं तो मैं आपको बता दूं कि बिहार में फ़िल्मों के विकास के लिये किसी फ़िल्मसिटी के निर्माण की आवश्यकता नहीं है। गया, हाजीपुर, मुजफ़्फ़रपुर, पटना, नालंदा और कितने नाम बताउं मैं आपको। बिहार का प्राकृतिक सौंदर्य अतुलनीय है। यदि बिहार सरकार इन्हीं स्थानों को विकसित कर दे तो यह फ़िल्मों के विकास के लिये काफ़ी है। आप पंजाब में देखिये, क्या वहां कोई फ़िल्मसिटी है? इसके बावजूद वहां फ़िल्में शूट की जाती हैं। हमलोग जब देसवा की शूटिंग कर रहे थे तब हमने इस सच्चाई को शिद्दत से महसूस किया।
रही बात फ़िल्मों के विकास की तो मैं आपको बता दूं कि आज जहां कहीं भी फ़िल्में बन रही हैं, वहां की सरकारों ने फ़िल्म निर्माताओं को कितना प्रोत्साहन दे रखा है। मसलन यदि आप मराठी में फ़िल्म बनाते हैं तो महाराष्ट्र सरकार आपकी विशेष सहायता करने को तैयार है। इसी प्रकार की कोशिश बिहार सरकार को भी करनी चाहिये। यदि ऐसा होता है तो बिहार में फ़िल्म उद्योग को स्थापित किये जाने में कोई बाधा नहीं होगी।

नवल – आपने अपनी फ़िल्म देसवा की बात की। कुछ इसके बारे में बताइये। यह बिहार में निर्मित होने फ़िल्मों के मामले में किस प्रकार मील का पत्थर साबित होगा?

नीतू – मेरी होम प्रोडक्शन चंपारण टाकीज की पहली फ़िल्म देसवा एक ऐसी फ़िल्म है जिसे एक छोटे बच्चे से लेकर परिवार के वरिष्ठ सदस्य भी एक साथ मिलकर देख सकते हैं। यह अन्य भोजपुरी फ़िल्मों के जैसी नहीं है, जिसके पोस्टरों पर खून के धब्बे और हिंसा स्पष्ट रुप से झलकती है। आज आप देखिये बांग्ला, आसामी, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम आदि भाषाओं में फ़िल्में बनाई जा रही हैं। इन प्रदेशों के लोग इस बात की चर्चा करते हैं। मुझे विश्वास है कि देसवा बिहार में निर्मित पहली फ़िल्म है, जिसे हम सभी बिहार वासी गर्व के साथ कह सकते हैं कि यह हमारे बिहार की फ़िल्म है। अच्छा आप चार फ़िल्मों के नाम बताइये।

नवल – मैंने तो बहुत बचपन में टीवी पर वह गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो देखा था। बस वही याद है।

नीतू चंद्रा – गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो बनी थी तब तो आप और हम पैदा भी नहीं हुए थे। आज हम राजेंद्र प्रसाद के नाम पर नहीं कूद सकते हैं। हमें राजेंद्र प्रसाद जैसा व्यक्तित्व पैदा करना होगा। तभी हम बेहतर भविष्य की बात कर सकते हैं।

नवल – वर्तमान में आप और क्या कर रही हैं?

नीतू चंद्रा – किस क्षेत्र में?

नवल – फ़िल्मों में और आपकी अन्य गतिविधियां?

नीतू चंद्रा – हिन्दी में या भोजपुरी में या फ़िर तेलुगू में?

नवल – इन सभी के बारे में?

नीतू चंद्रा (हंसते हुए) – सभी के बारे में तो नहीं बताऊंगी, लेकिन मैं आपको बता दूं कि जब मैं सांस भी लेती हूं तो उसमें बिहार शामिल होता है। मैंने बिहार में खेलों के विकास के लिये भी काम करना शुरु कर दिया है। क्रिकेट, बास्केटबाल। अभी मैंने बिहार सरकार के साथ मिलकर एक परियोजना पर काम करना शुरु दिया है, जिसके तहत बिहार में बास्केटबाल की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन शामिल है। मेरी लिस्ट में क्रिकेट भी शामिल है। अच्छा नवल जी, आप बताइये। बिहार में खेलों के बारे में आप कितना जानते हैं?

नवल – सच कहूं तो बहुत अधिक नहीं।

नीतू चंद्रा – मैं आपको बताती हूं बिहार में खेलों का सच। पिछले 10 सालों से बिहार ने रणजी नहीं खेला है। जरा सोचिये, सुबह-सुबह खेत में, मैदान में और गली में क्रिकेट खेलने वाले बच्चों का भविष्य क्या हो सकता है। जब बिहार की टीम रणजी में नहीं खेले। आखिर रणजी ही तो वह मंच है, जहां से हमारे प्लेयर्स नेशनल टीम में जाते हैं। आज आईपीएल चल रहा है। लोग कहते हैं युवराज पंजाब का है। रैना यूपी का है। क्या हम कुछ कह सकते हैं कि इनमें से कोई बिहार का क्यों नहीं है? नवल जी, हम बिहार के युवाओं में टैलेंट है। लेकिन दुर्भाग्य है कि चीजें जैसी होनी चाहिये, वैसी नहीं है।

नवल – आपकी आने वाली फ़िल्में?

नीतू चंद्रा – अभी 29 मई को मेरी एक फ़िल्म आ रही है। विपुल शाह द्वारा निर्देशित “लव जैसा कुछ” । इसके अलावा परेश रावल जी के साथ मेरी एक कामेडी फ़िल्म आ रही है “खुस्सर प्रसाद का भूत”।

नवल – इन सभी फ़िल्मों में आप लीड भूमिका में हैं?

नीतू चंद्रा – मैंने जब भी कोई फ़िल्म में काम किया, मैं लीड भूमिका में ही रही हूं। अच्छा आप बताइये, मेरी कोई ऐसी फ़िल्म, जिसमें मैंने लीड भूमिका नहीं निभाया हो।

नवल – मैंने तो आपकी केवल एक फ़िल्म वह मधुर भंडारकर साहब वाली फ़िल्म ट्रैफ़िक सिग्नल देखी है और मैंने अपार्टमेंट के बारे में सुना है।

नीतू चंद्रा (नाराज होते हुए) – जब आपने मेरी फ़िल्में ही नहीं देखी, तो फ़िर आपसे बात क्या करना। मैंने 11 हिन्दी फ़िल्मों में काम किया है। वह भी लीड भूमिका में। अपार्टमेंट को तो इस बार अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के लिये नामित किया जा रहा है। अब मैं वह बात नहीं करुंगी, क्योंकि आपने तो मेरी फ़िल्में देखी ही नहीं है।

नवल – मैं वादा करता हूं कि कल से मैं आपकी फ़िल्में अवश्य देखूंगा।

नीतू चंद्रा – चलिये जब आप वादा कर रहे हैं तो ठीक है। उसके बाद बात करते हैं।

साभार: अपना बिहार

 

फिल्म, मनोरंजन, संस्कृति

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