माँ भारती की सहज पुकार …!


पाषाण कलेजा कर के बोटियाँ चुन रही हूँ,
अपने ही जयचंदों की बातें, सुन रही हूँ।
तू कहता था! हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा!
चुनकर मारूंगी! सारे अफ़ज़ल ढूँढ रही हूँ।

अब तो रण का आगाज़ तुम्हारी ओर से हो!
दुश्मन पर पहला वार! तुम्हारी ओर से हो!
अब एक के बदले दस लाने की बात न कर,
अब गोलों की बौछार तुम्हारी ओर से हो।
अंदर – बाहर के सबके ताने सुन रही हूँ,
चुनकर मारूंगी! सारे अफ़ज़ल ढूँढ रही हूँ।

चौराहों पर कैंडिल मार्च किये से ना होगा,
किसका हाथ है? इसकी जाँच किये से ना होगा,
चौराहे पर अब तो टांग दो! उन गद्दारों को,
बस! जीप में उनको बांध दिए से ना होगा।
मैं, घर घर जाकर उन गद्दारों को ढूंढ रहीे हूँ,
चुनकर मारूंगी! सारे अफ़ज़ल ढूँढ रही हूँ।

विनय कुमार

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