राजनीति का हॉट केक आरक्षण

मनोहर मनोज
कथित निर्धन उंची जातियों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का मोदी सरकार का नया फरमान उन्हें लेश मात्र भी फायदा पहुंचाने वाला नहीं। चूंकि आरक्षण हमारी राजनीतिक परिसंवाद का एक इतना बड़ा हॉट इशू है जिसकी श्रेणी भी उसी कतार में बतौर मुद्दा खड़े होने की है जिस कतार मेें जाती, धर्म, भाषा ,प्रान्त जैसे कारक खड़े दिखते हैं और जिन मुद्दों से हमारी जनता जनार्दन बड़ी आसानी से भावनात्मक रूप से लामबंद हो जाती है।
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ऐसे में कोई भी राजनीतिदां इसमे सुधार लाने की हिम्मत ही नहीं कर सकता। होता ये है कि फार्मूला राजनीतिबाज आरक्षण के इसी बने बनाये गुलशन में ही नित नये फूल लगाने की मानसिक कसरथ करते रहते हैं। हाँ इससे हमारी प्रतियोगी राजनीती की मुख्य आधारशिला जो वर्गमित्र और वर्गशत्रुता पर आधारित है, उसे जरूर इससे पुरजोर समपुष्टि मिलती है। यह सबको पता है की अनुसूचित जाती व जनजाति तथा पिछड़े में से आरक्षण का फायदा वास्तव उनमे से सिर्फ 10 फीसदी परिवारों को मिलता है, वह भी फायदाप्राप्त एक परिवार की कई पीढ़ीयों को और शेष उनकी 90 फीेसदी आबादी सामाजिक ,आर्थिक और शैक्षिक सशक्तीकरण की मौलिक प्रक्रिया से तो अभी मीलों दूर दिखायी देती हैं।
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अब इनकी काट में या कहें उनके बरक्स इनमे एक सामाजिक संतुलन लाने में ऊँची जातियों के कथित निर्धन लोगो को 10 फीसदी आरक्षण देने का जो मामला आया है, उससे अब क्या दिखेगा। कायदे से देखा जाये तो 8 लाख से ऊपर सालाना आमदनी वाले वाले लोग सरकारी नौकरियों में तो जाते हीं नहीं। इस श्रेणी की आमदनी वाले परिवार या तो वे बड़े व्यसायी परिवार  से ताल्लुक रखते हैं या कोई और व्यवसाय करते हैं।  भई सबसे बड़ा मुद्दा तो ये है की सरकारें पक्की नौकरी देना ही नहीं चाहती। इसकी वजह ये है कि वे नहीं चाहतीं कि उनके यहां सरकारी दामादों की फेहरिश्त पहले से और ज्यादा बढ़े और सरकारी कार्यालयों में हरामखोरी की संस्कृति में और चार चांद लग जाए।
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इन सभी सरकारों के मन की बात ये है कि उन्हें नौकरी दो हीं ना। कल सिब्बल संसद में फर्मा रहे थे की मोदी सरकार नौकरी दे ही नहीं रही है, फिर आरक्षण क्या उन उंची निर्धन जातियों को  सिर्फ गुदगुदी का अहसास दिलाने के लिए लाया गया है। हकीकत ये है की कपिल सिब्बल की भी सरकार होती तो वह भी आरक्षण और नौकरी को लेकर इसी नीति पर चलती। कांग्रेस की सरकारें सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग गठित कर उनकी पक्की नौकरी को और पक्का करने में हमेशा आगे रहती आई हैं।
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इन सभी में बस अंतर ये है कि इनमे कौन सा राजनीतिक दल कब कौन सा दांव चल देगा और उनके प्रतिद्वंधी नाक मलते रह जाएं। कोई कभी लोकलुभावन कर्जमाफी का दांव चल देता है तो कोई इस भारत के अघोषित जातीय लोकतंत्र में विभिन्न जातियों को  आरक्षण सूची में डालकर अपनी वाहवाही लूट लेता है। कोई किसी मजहब के लिए तुष्टिकरण का दांव चल देता है। इन कदमों से क्या देश के वंचित पीडि़त व अल्पसंख्यकों की सामाजिक आर्थिक हैसियत में दरअसल कोई सचमुच बेहतरी हासिल हो पाती है । इसका जबाब नहीं में ही है।
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हकीकत ये है की आज हमारे भारत के सभी राजनीतिक दलों और उनकी सरकारों के बीच इस मामले में अघोषित संधि है की सरकारी नौकरी देने से बचा जाये। यह सच है की केंद्र सरकार में 10 लाख पद  और राज्यों में करीब 50 लाख पद रिक्त हैं। पर इन रिक्तियों को भरने में सबसे बड़ी बाधा इन सरकारों को पक्की नौकरी के कानूनी तमेचे का डर है। अरे भाई आरक्षण की भावुक घोषणा के बजाये और आरक्षण को लेकर देश के मराठों, पटेलों, जाटों, गुर्जरों के हो रहे राजनीतिक आंदोलनों की सबसे बड़ी काट तो ये बनती है कि ये सभी सरकारें एक बेहतर रोजगार व श्रम नीति के जरिये कॉन्ट्रेक्ट की नीति के ही मातहत देश में अविलम्ब 60 लाख नौकरी पैदा करतीं।
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एक नयी कार्मिक नीति के तहत जो बेहतर कार्य परिस्थितियों के साथ जितना काम उतना दाम की नीति पर चले तो सरकारों को 60 लाख नौकरी देने में कोई परेशानी नहीं होगी। बल्कि सरकारी महकमों में तमाम काम और योजनाओं के अमल में हो रही देरी पर भी इससे विराम लग जाएगा और देश में हाहाकार मचा रही बेरोजगारी की समस्या पर एक प्रभावी पहल होगी। परन्तु सवाल ये है कि इसके लिए कौन एक बोल्ड डिसीजन लेगा। बिना नौकरी दिए आरक्षण के भावुक मुलम्मे से लोगों को ठगिये और अपनी राजनीती चमकाईये। भारत में आरक्षण की राजनीति का तो यही समूचा फलसफा है। आरक्षण को लेकर मेरा यह क्लियर मत है कि ना आरक्षण के पिछड़ापरस्ती समर्थन में और ना ही इसके सवर्णपरस्ती विरोध में, हमारा मकसद केवल वंचितों को हर तरह के समान अवसर प्रदान करने में है।
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जाहिर है वंचितों की तादात ऊँची जातियों में जहां 25 फीसदी है तो वह दलितों और पिछड़ों में 75 फीसदी। ऐसे में सशक्तिकरण सबसे बड़ा मुद्दा है। ऐसा नहीं कि देश में सशक्तिकरण हो नहीं रहा है। पर यह कछूए की चाल से। कहीं अंधेरा ही अंधेरा है तो कहीं कई टार्चलाइटें जल रहीं हैं। वास्तव में तो हमारे यहां काबिलियत का तो तंत्र है ही नहीं। हमारे यहां सिर्फ चलता है जुगाड़ तंत्र। इस जुगाड़ और खुशामद तंत्र से कथित काबिलियत वाला तंत्र कहा जाने वाला निजी क्षेत्र तो मेरी नजर में कहीं ज्यादा प्रभावित दिखता है। क्या यह सही नहीं है कि निजी क्षेत्र में भी सवर्ण जुगाड़वाद की जड़ें गहरी जमी हुई है।
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वहां भी सार्वजानिक क्षेत्र की तरह आरक्षण क्यों नहीं लाया जाता। यह सोचना गलता है कि हमारे पिछड़े व दलित तबके में काबिल लोग नहीं है। हैं, पर उन्हें अवसर नहीं प्राप्त होता। आरक्षण यदि अयोगयता को पोषित करता है तो यह भी सही है कि जुगाड़वाद की काट के साथ साथ उपेक्षित योगयवरों को अवसर भी प्रदान करता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आरक्षण की नीति यदि न्याय और अवसर की समानता तथा सशक्तिकरण के सिद्धांतत: प्रतिकूल है परंतु यदि हम सार्वजनिक क्षेत्र में आरक्षण की नीति को लेकर चल रहे हैं तो फिर इसे निजी क्षेत्र में लागू नहीं करना भी उतना ही अन्यायकारक है। यदि दोनों में एक समान नीति नहीं लागू की जाती है तो फिर हमे लेवल प्लेइंग की स्थिति प्राप्त नहीं होगी। यदि सरकारी बीमा कंपनियों के जीवन बीमा पालिसी धारकों को कर रियायत मिलती है तो वह निजी बीमा कंपनी के पालिसीधारक को भी मिलती है। ऐसे में नौकरियों में आरक्षण की सुविधा भी सरकारी व निजी दोनों में एक समान मिलनी चाहिए।
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 बहरहाल उंची निर्धन जातियों को आरक्षण प्रदान कर हमारे इस अघोषित जातीय लोकतंत्र में मोदी सरकार ने बड़ा ही पोलिटकली राइट फैसला ले लिया है परंतु पब्लिक पर इसका एक्चुएली बड़ा असर नही दिखने वाला। क्योंकि अब तो देश के सभी जातियों को आरक्षण मिल गया फिर बंचित जमात  को क्या मिला बाबाजी का ठल्लू।
मनोहर मनोज वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं
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