विकासवादी आइने में गुजरात का चुनावी दंगल

डॉअजय उपाध्याय

गुजरात में विगत 15 वर्षों के भाजपा शासन एवं केंद्र सरकार के पिछले तीन वर्षों के दौरान जिस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई है, उसका असर आगामी गुजरात विधानसभा चुनाव पर स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। स्थानीय स्तर पर लोगों के बीच लगातार घटता रोज़गार का अवसर, नोटबंदी के कारण रोज़गार के मुद्धों पर लगातार बढ़ता दबाव, आर्थिक क्षेत्रों के कुप्रबंधन से उत्पन्न चुनौतियाँ और ऊपर से जीएसटी की मार ने आम लोगों की कमर तोड़ डाली है। आज गुजरात में सुदूर क्षेत्र के ग्रामीण युवाओं में निराशा का माहौल है। शहरी क्षेत्र में पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं है। व्यवसायिक वर्ग या छोटे-मध्यम वर्ग की हालत दिन ब दिन ख़राब होती जा रही है। जबकि कुछ गिने-चुने राजनीतिज्ञों या व्यवसायिक घरानों की आमदनी में कई गुणी वृद्धि दर्ज हुई है।

 

गुजरात माडल का मायाजाल: 2014 के आम चुनावी प्रचार के उस नज़ारे को शायद ही कोई आज तक भुला पाया हो, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी ने चिल्ला-चिल्ला कर “गुजरात माडल” का शोर पूरे देश में मचाया था। उस समय देश में सर्वत्र एक ही बात की चर्चा होती थी कि देखो गुजरात ने माननीय के नेतृत्व में ना जाने कितना विकास कर लिया और बाक़ी देश विकास की इस आँधी के बावयुद कितना पीछे छूट गया। दूसरे राज्यों के नागरिकों में कहीं ना कहीं एक सोंच बन गई थी कि काश, मोदीजी गुजरात के बदले मेरे राज्य के मुख्यमंत्री होते तो शायद हम भी गुजरात माडल के विकासवादी रास्ते पर दिखाई देते। लगता था सारा देश एक मादारी के खेल को देखने में मशगूल हो गया है। गुजरात को अपनी आँखों से बेशक थोड़े से लोगों ने ही देखी थी। कुछ थोड़ेसे लोग कभी किसी काम से कभी संयोगवश केवल एक-दो मेट्रोपॉलिटन या शहरी क्षेत्र में ही क्यों ना गए हों, पर विकास के नाम पर मचे इस शोर में उन लोगों ने भी कुछ ज़्यादा ही हाँ में हाँ मिलाया। उस वक़्त तो ऐसा लगने लगा था जैसे विकास का मतलब गुजरात। सरकार के द्वारा किए गए गुणगान का तो कहना ही क्या। परंतु, आश्चर्य तो तब होता था जब कुछ ऐसे लोग जो कभी गुजरात गए भी नहीं या वहाँ की समस्याओं से कभी रूबरू नहीं  हुए, वो भी अपने झूठी ज्ञान या बुद्धि से सुनी-सुनाई बातों के आधार पर या पेड मीडिया की रिपोर्ट के आधार पर लगातार एक अजीब सा माहौल क्रिएट करने में लगे रहें।

 

गुजरात देश के उन राज्यों में से एक है, जिसका काफ़ी समृद्ध इतिहास रहा है। वहाँ के लोगों की ईमानदार छवि और उद्धमशीलता की मिशाल पूरे देश के नागरिकों को शुरू से ही दी जाती है। तकनीकी जानकारी, कौशल विकास, व्यापारिक दृष्टिकोण और समुद्री समीप्यता ने इस राज्य को प्रकृतिक रूप से एक सम्पन्न एवं विकसित होने के आधार प्रदान किए है। गुजरात का विकास स्वभावत वहाँ की विरासत और प्रकृति की देन है। इस गौरवमयी राज्य का विकास होना ही है, कोई रोकना भी चाहे तो रोक नहीं सकता। इसलिए इस अहम या भ्रम में रहना कि जो भी होता है, उसका कारण केवल और केवल श्री नरेंद्र मोदी है, इससे बड़ा मुग़ालता पालना और कुछ भी नहीं। आज जो भी थोड़े बहुत विकास हुए है और जिसका गाना भाजपाई लगातार गा रहें है। साथ ही साथ वे यह दिखाने का प्रयास कर रहें है, जैसे कि उन्होंने गुजरात पर राज करके उलटे वहाँ के लोगों पर उपकार किया हो, तो उन्हें सबसे पहले गुजरात के इतिहास और भूगोल की सही जानकारी आरएसएस की शाखाओं के माध्यम से ही सही, प्राप्त कर लेनी चाहिए।

 

गुजरात का कम्पॉज़िट कल्चर: इसके विपरीत, जहाँ तक गुजरात की इस विकासवादी भ्रम के नेपथ्य में जो एक बड़ा नुक़सान देखने को मिला है, वह गुजरात के “कम्पोज़िट कल्वर” पर किया गया एक बहुत बड़ा कुठाराघात है जो विगत 12-15 वर्षों में स्पष्टत दिखाई दे रहीं है। सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से गुजरात का माडल “आड़ानी-अम्बानी” का या “शाह-मोदी का माडल” नहीं हो सकता। वैष्णव सम्प्रदाय की सोंच रखने वाला एक गुजराती भाई/ बहन कभी भी दूसरे धर्मावलंबियों के लिए हिंसा की भावना नहीं रख सकता। नरसिंग मेहता, महात्मा गांधी और सरदार पटेल की माटी से कभी भी दूसरे सम्प्रदाय के लिए घृणा की भाषा का उपयोग हो ही नहीं सकता।

 

अतः तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए जिन लोगों ने ऐसा किया या कर रहें है, वो लोग कभी भी गुजराती समाज के शुभचिंतक नहीं हो सकते। ऐसा वातावरण होने से गुजरात और हमारे गुजराती भाई- बहनों का दूरगामी लाभ नहीं हो सकता, बल्कि काफ़ी नुक़सान पहुँचाया जा रहा है। आज आवश्यकता है कि कैसे गुजरात की ऐतिहासिक धरोहर को वर्तमान विकासवादी मूल्यों के साथ तारतम्य स्थापित किया जाए और प्राचीन गुजराती गौरव को पुनःस्थापित किया जाय। आगामी विधानसभा के नतीजे चाहे भाजपा या कांग्रेस जिसके भी पक्ष में क्यों ना हो, पर गुजराती अस्मिता की लड़ाई वहाँ के नौजवानों को आगे कई वर्षों तक निरंतर लड़नी होंगी। तभी शायद इसकी क्षतिपूर्ति सम्भव हो पायें।

 

(डॉअजय उपाध्याय एक राजनीतिक विश्लेषक है)

 

 

राजनीति, राज्य, शासन

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