डोकलाम विवाद: दाँव पर लगी नयी दिल्ली- बीजिंग की प्रतिष्ठा

डॉ. अजय उपाध्याय

 

डोकलाम विवाद एशिया के इन दो महाशक्तियों के मध्य प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि आज की स्थिति में यदि बिना किसी सार्थक वार्ता के भारत डोकलाम पठार से अपनी सेना को वापिस करता है तो विशेषकर दक्षिण एशिया और सामान्य रूप से विश्व स्तर पर यह संदेश जाएगा कि भारत अपने सबसे विश्वसनीय मित्र भूटान के सुरक्षात्मक सरोकारों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो सका और ना ही अपने पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर गम्भीर है। इससे क्षेत्रीय एवं वैश्विक फलक पर उभरते भारत की प्रतिष्ठा पर गहरा धक्का लगेगा। वही दूसरी ओर चीन के लिए भी पीछे हटना घाटे का सौदा है। चूँकि चीन का अपने कई पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद है। अतः वह भलीभाँति जनता है कि भारत के सामने यदि चीन झुकता है तो इसका संदेश उसके क्षेत्रीय कूटनीति एवं क्षमता पर विपरीत असर डालेगा। दूसरे, 21वीं सदी के प्रारम्भ से ही चीन एशिया से लेकर अफ़्रीकी महाद्वीप तक अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने की निरंतर कोशिश कर रहा है। डोकलाम पर मचा यह कोहराम उसके इस अश्वमेघ यज्ञ में एक बड़ी बाधा बन सकता है और इस कारण वैश्विक स्तर पर उसके सशक्त आर्थिक एवं सामरिक छवि को आघात पहुँच सकता है।
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डोकलाम पर मचा कोहराम विश्व राजनीति में सौदेबाज़ी सिद्धांत की बारीकियों और मान्यताओं की ओर इंगित करता है। इसके अनुसार दो संघर्षरत शक्तिशाली राष्ट्र के अपने-अपने दाँव व दावें होते है। चूँकि दोनों में से कोई भी देश आिण्वक युद्ध नहीं चाहता। अतः अपना राष्ट्रीय हित साधने के लिए अंततः उसे संधि वार्ता का सहारा लेना पड़ता है। परंतु वार्ता के समय दोनों ही पक्ष दृढ़ रूख अपनाते है। प्रत्येक पक्ष दूसरे के बल को कम करने के लिए धमकियाँ देता रहता है। सभी प्रकार के प्रचार और साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लिया जाता है। समय-समय पर नैतिकता की भी दुहाई दी जाती है। इन सबका एक ही उद्देश्य होता है कि बुरी से बुरी स्थिति में भी अधिक से अधिक लाभ कैसे प्राप्त किया जाए?  तत्कालीन भारत- चीन गतिरोध कहीं ना कहीं इसी सच्चाई को अभिव्यक्त करता है।
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    इसी प्रकार सामरिक क्षेत्र के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद का समाधान अंततः बातचीत के द्वारा ही मुमकिन है, जिसके संकेत दिखने लगें है। तीन से पाँच सितम्बर तक ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों की शिखर बैठक चीन के शियामन शहर में होना प्रस्तावित है। भारतीय प्रधानमंत्री ने इसमें हिस्सा लेने की स्वीकृति दे दी है। भारत और चीन दोनों देशों के राजनयिक चाहते हैं कि इस बैठक के पहले सिक्किम सेक्टर में सीमा पर तनातनी का हल निकल आए।
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भारत के पक्ष में सामरिक-कूटनीतिक फ़ायदें
 लगातार चीन के द्वारा सैन्य टकराव की धमकी दी जा रही है। परंतु प्रत्येक स्थिति में अंतिम लाभ भारत के पक्ष में ही रहेगा। इसके कई कारण हैं। पहला, डोकलाम भूटान का क्षेत्र है, जैसा कि अब चीन ने भी अधिकृत रूप से इसे स्वीकार लिया है। यह एक भू-रणनीतिक त्री-सन्धि क्षेत्र है। जहाँ भारत, भूटान और चीन की सीमाएँ मिलती है। सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए यह ट्राई- जंक्चर  काफ़ी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यहाँ से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर नीचे की ओर चुंबी घाटी से होकर जो मुख्य सड़क जाती है, उसी से सारा पूर्वोत्तर भारत जूड़ा हुआ है।
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दूसरे,  भूटान भारत का एक विश्वसनीय मित्र है जिसके साथ आपसी सुरक्षा संधि है। भूटान के कहने पर भारत ने डोकलाम में चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोकने के लिए आगे आया। इस प्रकार नैतिक दृष्टिकोण से भारत अपने पड़ोसी देशों को यह दर्शाने में पूर्णत  सफल हो चुका है कि ज़रूरत पड़ने पर भारत न्याय के साथ खड़ा होगा, चाहे इसके लिए कितनी बड़ी क़ीमत क्यों ना चुकानी पड़ें। तीसरे, यथार्थ में भारत अपनी संप्रभुता की सुरक्षा के साथ-साथ अपने मित्रवत पड़ोसियों की भी रक्षा के लिए वचनवद्ध है, दुश्मन चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हों। और अंतिम रूप से देखें तो नयी दिल्ली विश्व समुदाय के समक्ष यह संदेश देने में कामयाब रहा है कि एशिया में केवल चीन ही नहीं, अपितु भारत भी एक ताक़तवर भूमिका निभाने का माद्दा रखता है। यद्यपि ज़रूरत पड़ी तो पंचशील के आदर्शों को अपनाते हुए भी विस्तरवादी एवं आक्रामक ड्रैगन को टक्कर देने में आज केवल और केवल भारत ही सक्षम है।
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  इस प्रकार इस विवाद से  भारत की प्रतिष्ठा में इज़ाफ़ा हुआ है जो लाज़िमी है। हालाँकि वास्तविकता के धरातल पर देखना यह होगा कि प्रतिष्ठा की इस लड़ाई में दोनों के लिए कैसे एक सम्मानजनक समाधान निकलता है और इस दौरान कौन, कितना खोता एवं प्राप्त करता है। यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है।
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(लेखक विदेश नीति से सम्बंधित विषय पर कई पुस्तकों की रचना की है। इस आलेख में व्यक्त विचार निजी है)
अंतर्राष्ट्रीय, शिक्षा

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