राष्ट्रपति चुनाव में अपने-अपने दावँ एवं दावे

डॉ. अजय उपाध्याय

विश्व के सर्वाधिक बड़े प्रजातांत्रिक देश भारत में सर्वोच्च गणतांत्रिक पद राष्ट्रपति के चुनाव की तैयारी काफ़ी ज़ोर-शोर से जारी है। देश के दो परस्पर धूर विरोधी गठबंधनों ने  अपने-अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतार रखा है। एक ओर जहाँ भाजपा के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से बिहार के राज्यपाल रह चुके और भाजपा दलित मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के निवासी कोली  समाज से ताल्लुक़ रखने वाले नम्र स्वभाव के श्री रामनाथ कोविद मैदान में है, वही दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) ने एक मृदुभाषी, अनुभवी, पूर्व लोकसभा के अध्यक्षा, बिहार के मूर्द्धन्य नेता स्व. जगजीवन राम की बेटी श्रीमती मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बनाकर मुक़ाबले को काफ़ी रोचक बना दिया है।
.
शुरुआती दिनों में इस गरिमामयी पद के चुनाव को लेकर सर्वसहमति का सगुफा सत्तापक्ष के द्वारा छोड़ा गया था और इसको लेकर ऐसा नैतिक मापदंड स्थापित करने का माया फैलाया गया जैसे कि उम्मीदवार के नाम का चुनाव भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जगह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा द्वारा तय किया जाना हो। केंद्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में  तीन सदस्यीय समिति बनायी गई और विपक्ष के सभी छोटे बड़े नेताओं से औपचारिक मुलाक़ात कर देश के समक्ष एक ऐसा माहौल तैयार करने का प्रयास किया गया कि सबकी सहमति से ही राष्ट्रपति के गौरवमयी पद का चुनाव सम्पन्न होगा। पर जल्द ही यह भ्रम टूट गया, जब भाजपा ने अचानक उम्मीदवार की घोषणा कर डाली। हालाँकि भाजपा को अपने सहयोगियों के अतिरिक्त अन्य कई पार्टियों यथा चन्दबाबु नायडू की पार्टी टीआरएस, जगन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी, एआईडीएमके के एक गुट, नवीन पटनायक की बीजू जनता दल के साथ-साथ श्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड का भी समर्थन प्राप्त हुआ जो काफ़ी दिलचस्प माना जा रहा है। यह भविष्य के भारतीय राजनीति में निर्णायक साबित होगा।
.
विपक्षी एकता के चाणक्य रहे नीतीश कुमार की नयी चाल
विपक्षी एकता के स्तम्भ और राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार द्वारा पाला बदलकर एनडीए के समर्थन में आ जाना “मैक्यावेली की धूर्त लोमड़ी जैसी चाल” को फिर से यादगार बना दिया है, जिसकी चर्चा सर्वत्र हो रही है। श्री नीतीश कुमार का कहना है कि बिहार की बेटी मीरा कुमार को वोट देने का कोई औचित्य नहीं, क्योंकि वो हारने वाली उम्मीदवार है। संख्याबल की बात करें तो निश्चित तौर पर पलड़ा एनडीए के पक्ष में है। इसका अभिप्राय सिर्फ़ यही हुआ कि राजनीति में सत्ता का रास्ता जीत के द्वार से ही आगे बढ़ती है।  तब इसका अर्थ तो यही हुआ कि प्रजातंत्र में विचारधारा या प्रतिपक्षी आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं। परंतु वैसी बात नहीं है। राजनीति सदैव संभावनाओं का खेल है और तत्कालीन हितों की पूर्ति के अनिवार्यता के साथ-साथ दीर्घकालीन लक्ष्य को साधने का भी एक सशक्त माध्यम है। यदि ऐसा नहीं होता तो नीतीश जी ख़ुद भी आज राजनीतिक मंच पर इतनी सशक्त रूप से विराजमान नहीं होते। कब के अदृश्य हो चूकें होते, क्योंकि जब उन्होंने अपनी राजनीति पारी की शुरुआत की थी तो ख़ुद भी वे “प्रजातंत्र में पराजय की भाषा” से कई बार बख़ूबी रूबरू हो चुकें हैं। यदि  राजनीति के अन्य खिलाड़ियों की भी यहीं सोंच होती तो शायद सुशासन बाबू आपकी राजनीतिक भूमिका पर ही कब का ग्रहण लग चुका होता।
.
ख़ैर राजनीति में कभी-कभी यदि समझदार नेता भी “अवसरवादिता का परिचय” ना दे तो राजनीतिक गपशप ही बंद हो जाए। वैसे नीतीश कुमार कोविंद जी को समर्थन देने के दो कारण बतायें थे। पहला, एन॰डी॰ए॰ उम्मीदवार का सोबर व्यक्तित्व एवं दूसरे बिहार के राज्यपाल के नाते बिहारी समीप्यता। मीरा कुमार की उम्मीदवारी से सम्भवत उनके दोनों तर्कों को पूरी तरह से ख़ारिज कर उसी आधार को और मज़बूती के साथ कारगर बना दिया था, बावयुद उनका मन नहीं डोला। बिहारी अस्मिता पर हंगामा खड़ा करने की कई बार कोशिश कर चुके इस लोकप्रिय नेता की इसी दावँ पर अंततः कांग्रेस नेता श्री ग़ुलाम नबी आज़ाद को कहना पड़ा कि नीतीश कुमार “बिहार की बेटी” को हराना चाहते है। जिससे महागठबँधन के भविष्य को लेकर भी अटकने तेज़ हो गई है कि क्या 2019 के चुनाव तक सुशासन बाबू के साथ श्री लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल एवं कांग्रेस का महागठबँधन जारी रहेगा या फिर सबकी दिशाएँ अलग-अलग हो जाएँगी।
.
दलित बनाम दलित या विचारधारा की दलील
 इसी गपशप की दुनिया में एक चर्चा ये भी जारी है कि “सबका साथ और सबका विकास” करने वाले विकासपुरुष प्रधानमंत्री श्री नरेंद मोदीजी एवं उनके विश्वस्त रणनीतिकार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने इस बार दलित समाज के एक व्यक्ति को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की थी और अपने इस शातिर चाल में कुछ हदतक सफल होते हुए भी दिखें, जब बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती  तक को सोंचने पर मजबूर कर दिया था। शुरुआती दौड़ में उनके इस कार्ड ने विपक्षी खेमे के सामने एक बहुत बड़ा धर्मसंकट पैदा कर दिया था कि या तो दलित के नाम पर इस चेहरे को अपनायें या फिर दलित विरोधी का प्रमाण पत्र पायें और कहीं ना कहीं इसी का नतीजा हुआ कि काफ़ी पशोपेश के बाद 22 जून, 2017 को श्रीमति सोनिया गांधी के अगुवाई में सत्रह विपक्षी पार्टी के नुमाइंदों ने बैठक कर लम्बी विचार मंथन के उपरांत लोकसभा के भूतपूर्व स्पीकर श्रीमति मीरा कुमार के नाम पर अंतिम मुहर लगाई। एन॰डी॰ए॰ के “राम के सामने यू॰पी॰ए॰ के मीरा” का आना सत्तापक्ष द्वारा खेले गए दलित कार्ड का माक़ूल प्रतिपक्षी दाँव माना जा रहा है। हालाँकि, भाजपा एवं आर॰आर॰एस॰ परिवार के “विचारधारा से मुक़ाबलें” की दुहाइयाँ लगातार दी जा रहीं है।
राष्ट्रपति के लिए विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार का कहना है कि हम विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे। हमें जाति, धर्म, क्षेत्र, सम्प्रदाय से ऊपर होकर देशहित में राष्ट्रपति के चुनाव को देखना चाहिए। यह विचारधारा लोकतांत्रिक मूल्यों, समाज में समावेशीपन, प्रेस और लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी, ग़रीबी उन्मूलन, पारदर्शिता, जाति व्यवस्था के ख़ात्मा पर आधारित है। सैद्धांतिक तौर पर ही सही, कम से कम यह अच्छी बात है कि विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव को जातिवादी रंग देने के बजाए वैचारिक आधार पर लड़ने की बात की है। हालाँकि, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने तो स्वयं से ट्वीट कर एन॰डी॰ए॰ के अपने उम्मीदवार का परिचय एक दलित के रूप में करा कर इस गरिमामय पद को जातिगत रंग देने की शुरुआती कोशिश ज़रूर की थी, ताकि दलित समाज के साथ गुजरात के कोली समाज को साधा जा सके, जो राजनीतिक दृष्टिकोण काफ़ी चर्चा में रहा है।
.
राजनीतिक गणित की सच्चाई 
राजनीति सिद्धांतों की दुहाई चाहे जितनी क्यों ना दी जाय, पर हार जीत की सच्चाई को राजनीति में नकारा नहीं जा सकता। दावे और प्रतिदावों के बीच चुनाव में संख्या बल की भूमिका को कोई भी यथार्थवादी राजनीतिज्ञ नज़रअन्दाज़ नहीं करना चाहता है। जहाँ तक मतदाताओं के आँकड़ो की बात करें तो संख्या बल की दृष्टि से जीत का पलड़ा एन॰डी॰ए॰ उम्मीदवार की तरफ़ स्पष्ट रूप से झुकी हुई नज़र आ रही है। हालाँकि श्रीमती सोनिया गांधी की सक्रीयता से प्रतिपक्षी एकता को अमली जामा पहनाते हुए भाजपा और उनकी सहयोगियों के लिए जीत के अंतर को बहुत हद तक कम करने की लगातार कोशिश जारी है।  “अंतरात्मा की आवाज़” का नारा लगाकर विपक्षी उम्मीदवार ने कही ना कही एक सोंची समझी चाल ज़रूर चली है। ताकि चुनावी गणित को बिगाड़ा जा सके, परन्तु देखना यह भी होगा की सत्तापक्ष कहीं इसी का फ़ायदा अपने उम्मीदवार को दिलाने में ना सफल हों जाए। दोनों पक्षों के दावे एवं प्रतिदावे की सच्चाई तो तब देखने को मिलेंगी, जब इस महीने के सत्रह तारीख़ को होनेवाले चुनाव के मध्यनज़र इनकी राजनीतिक चाल कितनी सही, सटीक और सुलझी हुई होती है।
.
लेखक डॉ अजय उपाध्याय एक राजनीतिक विश्लेषक  है
राजनीति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *