‘हिन्दी बचाओ मंच’ की अपील

मित्रो,

हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी आज टूटने के कगार पर है. जन भोजपुरी मंच नामक संगठन ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज कर दी है. भोजपुरी क्षेत्र के दो सांसदों ने संसद में भी यह मांग की है. दिल्ली के जंतर मंतर पर 8 अगस्त को इसके लिए धरना दिया गया था. जन भोजपुरी मंच ने अपनी मांग के पक्ष में जिन 9 आधारों का उल्लेख किया है उनमें से सभी आधार तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्ट, अतार्किक और भ्रामक हैं. हिन्दी बचाओ मंच ने उनकी व्यापक छानबीन की है और उन सभी आधारों पर क्रमश: अपना पक्ष प्रस्तुत करता है.
1. भाषा विज्ञान की दृष्टि से भोजपुरी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रजी, अवधी, मगही, अंगिका आदि हिन्दी की अन्य बोलियाँ.
2. भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है. हिन्दी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हमलोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिन्दी भी. लिखने पढ़ने का सारा काम हमलोग हिन्दी में करते है? इसीलिए राजभाषा अधिनियम 1976 के अनुसार हमें ‘क’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बँटने के बावजूद हमें ‘हिन्दी भाषी’ कहा गया है. वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की संख्या 33099497 ही है.
3. स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ हम भोजपुरी भाषी ही नहीं थे, देश भर के लोगों ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था. वैसे स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले अब संयोग से बचे नहीं हैं. वर्ना, वे अपने उत्तराधिकारियों की करनी देखकर सिर पीट रहे होते. उन्होंने तो पूरे देश के लिए लड़ाई लड़ी जबकि ज.भो.मं. के लोग अपना घर बाँटने के लिए लड़ रहे हैं.
4. ज.भो.मं. के अनुसार भोजपुरी देशी भाषा है तो क्या हिन्दी देशी भाषा नहीं है? फिर वह किस देश से आई है?
5. ज.भो.मं. का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी को कोई क्षति नहीं होगी. मगर सच यह है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी भाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या ( ज.भो.मं. के अनुसार 20 करोड़ ) घट जाएगी. याद रखिए, सिर्फ संख्याबल के कारण ही हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिन्दी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही अवधी, ब्रजी, छत्तीसगढ़ी, मगही, राजस्थानी, बुंदेली, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में हैं क्या? आठवीं अनुसूची में शामिल होने की माँग भयंकर आत्मघाती है. मुट्ठीभर लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके हमें धोखा दे रहे है. हम भोजपुरियों का दायित्व तो अपने अनुजों का संरक्षण होना चाहिए.
6. ज.भो.मं. ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भोजपुरी के पठन पाठन का जिक्र किया है. भोजपुरी हिन्दी का अभिन्न अंग है, वैसे ही जैसे राजस्थानी, अवधी, ब्रजी आदि और हम हिन्दी के पाठ्यक्रम में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिन्दी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है. हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रजी, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिन्दी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? क्योंकि तब कबीर हिन्दी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाय?
भोजपुरी की समृद्धि से हिन्दी को और हिन्दी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी, आज की तरह अभिन्न अंग बनकर रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बाँट लेना है. भोजपुरी तब हिन्दी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि. घर बँटने से लोग कमजोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. आज पाकिस्तान हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है.
7. ज.भो.मं.ने मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने का तर्क दिया है. मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने से हिन्दी भी गौरवान्वित हो रही है. इससे अपने देश में भोजपुरी को मान नहीं मिल रहा- यह कैसे प्रमाणित हो रहा है? क्या घर बाँट लेना ही मान मिलना होता है?  सच यह है कि हमारी भोजपुरी के पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या सीवान की ?
8. कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिन्दी भी. इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और व्यापक हिन्दी समाज का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.
9. क्या ज.भो.मं., मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएगा?  इससे पहले हिन्दी में तो कराइए. ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिन्दी की रोटी खाते हैं और मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की माँग कर रहे हैं, ताकि उनके आस पास की जनता गंवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.
भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से तथाकथित 20 करोड़ भोजपुरी भाषियों में आत्मगौरव का नहीं, आत्महीनताबोध पैदा होगा. आत्मगौरव तो साठ करोड़ हिन्दी भाषियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने से होगा.

 

लेखक डा. अमरनाथ शर्मा  हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय में  प्रोफेसर हैं .

मो-94 33 009898

ईमेल-amarnath.cu@gmail.com

 

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