मोदी सरकार के दो साल

मनोहर मनोज 

राजनीतिक मामलों में आदर्शविहीन, कर्यक्रम योजनाओं के मामलों में बेहतरीन, बैंकिंग वित्तीय मामलों में विफल, मौलिक सुधारों के मामलों में यथास्थिति, वादे अमली के मामले में लचर पर विदेशी मामलों में अव्वल। यही है नरेन्द्र मोदी नीत एनडीए-2 सरकार के पिछले दो साल के समूचे प्रदर्शनों का पूरा आईना।
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जब भी किसी सरकार विशेष के प्रदर्शन की समीक्षा होती है तब आम तौर पर विपक्ष को उसमें मौजूद कमियां तो ज्यादा दिखती ही है तो दूसरी तरफ वे  सत्ता पक्ष की अच्छाइयां या तो अनदेखी करती हैं या वे उन्हें भी कमी के ही रूप में देखती है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष की बात करें तो उन्हें अपनी अच्छाइयां तो अच्छी लगती ही है पर उन्हें अपनी कमियों में हीं अच्छाइयों के बल्ब ज्यादा जलते दिखायी देते हैं।
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ऐसे में तीसरा एक तटस्थ दृष्टिकोण मीडिया का बनता है। पर दूर्भागय से मीडिया एक निष्पक्ष आकलनकर्ता होने के बजाए या तो सरकार के समर्थक या फिर सरकार के विरोधी गुट में बंटकर सरकार के प्रदर्शन की समीक्षा करता है जिसमें वह सरकार के कार्य प्रदर्शन व निर्णयों में निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता व सदनीयता का आकलन न कर उसे अपने हितों, संबंधों, पूर्वाग्रहों और दूराग्रहों के आधार पर साधने का प्रयास करता है।
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देखा जाए तो किसी भी सरकार की हर तरह से यदि आलोचना ही आलोचना की जाए या हर तरह से तारीफ ही तारीफ किया जाए तो इन दोनो स्थितियों में या तो इसमे राजनीतिक विरोध की बूं आती है या फिर राजनीतिक तारीफ की। ऐसे में सच्चे व सार्थक विशेषण से हमे महरूम हो जाना पड़ता है और देश में सरकारों का वास्तविक मूल्यांकन नहीं हो पाता है।
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राजनीतिक आदर्शवाद का अभाव
काफी अरसे के बाद पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सत्ता में आनेे वाली नरेन्द्र मोदी नीति एनडीए-2 सरकार ने अपनी राजनीतिक रीति नीति व अपनी तमाम शैली से इस बात का परिचय नहीं दे पायी वह देश में एक नये राजनीतिक आदर्शवाद का आगाज करना चाहती है। शायद वह यह मानकर चली कि इस कलियुगी दौर में आदर्शवादी राजनीति से मनमाफिक परिणाम नहीं मिला करते। ये स्थितियां कई उदाहरणों से झलकी। हालंाकि ये चीजें करना सरकार के लिये कोई बाध्यता नहीं थी परंतु उनसे अपेक्षित जरूर थी। मसलन एनडीए ने अपने साझेदार दलों से सदाशयता का परिचय नहीं दिया और परिस्थिति व ताकत के मुताबिक उनकी उपेक्षा शुरू कर दी। पहले शिवसेना के साथ उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अपना गठबंधन तोड़ा पर जब अकेले बहुमत नहीं आया तब बाद में उनके साथ मिलकर सरकार बनायी। पंजाब में अकालियों के साथ भी कुछ दिनों तक दूराव की स्थिति रही। बाद में संसद में गतिरोध की स्थिति जब पनपी तब वह अपने साझेदार दलों के साथ मिलकर चलने की नीति दोबारा अपनाने के लिये बाध्य हुए।
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नरेन्द्र मोदी की सरकार ने राज्यों में विपक्ष शासित सरकार में जहां भी उनमें असंतोष की झलक दिखी उसका बेजा फायदा उठाने में तनिक भी देर नहीं की। ऐसे में मोदी सरकार ने इंदिरा गांधी के शासन की याद दिला दी जब आए दिन विपक्ष शासित सरकारों को केन्द्र द्वारा पलटते देर नहीं लगती थी। यही हाल मोदी सरकार ने अरूणाचल, हिमाचल, उत्तरांचल में दोहराया गया। बिहार में मांझी सरकार के दौरान भी नीतिश को कमजोर करने के लिये मांझी को मोदी सरकार द्वारा कई पांसे फेंके गए। मोदी सरकार का यह कदम ना केवल अनैतिक था बल्कि उनकी पार्टी को राजनीतिक रूप से नुकसान देने वाला रहा है। इसी वजह से बिहार में उनकी हार हुई और उत्तरांचल में कांग्रेस पार्टी में आए आंतरिक खींचतान से भाजपा को अगली बार जो फायदा मिलता उस पर संदेह के बादल घिर गए हैं।
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इंदिरा गांधी के दौरान राज्यों में मुख्यमंत्री बनाने की कवायद केन्द्र से शुरू हो गयी थी। यही हाल मोदी सरकार में दिखा। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में मुख्यमंत्री का चयन किसी पूर्वघोषित प्रक्रिया से नहीं किया गया। दिल्ली व बिहार के विधान सभा चुनावों में मुख्यमंत्री की घोषणा या तो नहीं की गयी या फिर देर से की गयी। प्रधानमंत्री ने चुनावी कैमपेन एक स्वयं नेता बनकर किया। इसका खामियाजा इन्हें दिल्ली व बिहार में अपनी पराजय के रूप में देखने को मिली। इसके बाद असम में भाजपा संभली और इन सारी गलतियों से सबक सीखकर इसे दूर किया गया तो वहां एंटी इनकंबेन्सी के माहौल में उसे जीत प्राप्त हुई।
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संसद के संचालन में विपक्ष से समर्थन लेने के मामले में इस सरकार ने संयम और धैर्य का परिचय नहीं दिया। विपक्ष को घेरने के लिये मोदी सरकार द्वारा उनके विगत के भ्रष्टाचार को राजनीतिक तौर पर उठाने का प्रयास किया गया ना कि किसी भ्रष्टाचार मुद्दे की नैतिकता के तहत। कुल मिलाकर मोदी नीत एनडीए सरकार ने अपने दो साल के कार्यकाल में राजनीतिक तौर पर किसी आदर्शवाद और नैतिकतावाद का परचम नहीं लहराया जिसके लिये उनके पूर्वाधिकारी बाजपेयी सरकार जानी गयी जिसने किसी विपक्ष शासित सरकार के साथ ना तो राजनीतिक तौर पर और ना ही प्रशासनिक तौर पर किसी तरह का भेदभाव दर्शाया।
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नीतियों व कार्यक्रमों के मामले में बेहतरीन सरकार
नरेंद्र मोदी नीति मोदी सरकार ने उस मिथक को तोड़ा है जब यह पहले बार बार कहा जाता था कि देश में योजनाओं व कार्यक्रमों की भरमार है पर क्रियान्वन के मामले में फिसड्डी है। मोदी सरकार ने अपने पिछले दो साल के कार्यकाल में तमाम सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों के लिये ना केवल नये सिरे से कई योजनाओं व कार्यक्रमों की बेजोड़ शुरूआत की है बल्कि उनकी मौजूदगी की विश्वसनीयता में इजाफा किया है। मोदी सरकार के इन सभी कार्यक्रमों की तह में जाया जाया और उनकी प्रभावशीलता का विश्लेषण किया जाए तो हमे यह पता चलता है कि इनमें कोई भी योजना खजाना खोलकर, सब्सिडी की बंदरबांट कर और उपरी लोकप्रियता हासिल करने के लिये नहीं शुरू की गयी है जैसे कि विगत की योजनाओं में देखी जाती थीं। नयी योजनाओं में एक सुस्पष्टता, बुनियादी समाधान और दीर्घकालीन दृष्टि दिखायी पड़ती है।
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मसलन सामाजिक क्षेत्र में देखे तों बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं देश में लैंगिक संतुलन तथा नारी सशक्तिकरण की दिशा में एक बुनियादी कदम है। इस योजना को एक सामाजिक आंदोलन का भी शक्ल दिया गया है। आर्थिक क्षेत्र में मोदी सरकार ने क्रमवार तरीके से जिन योजनाओं की घोषणा की उनमे जनधन योजना, जनसुरक्षा योजना, मेक इन इंडिया, आदर्शग्राम योजना, डिजीटल इंडिया, क्लीन इंडिया इन सभी योजनाओं का जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले पर अपने पहले संबोधन 15 अगस्त 2०14 में किया और उसी साल लागू भी किया गया। तदंतर स्किल इंडिया, मुद्रा बैंक योजना, स्टार्टअप इंडिया, प्र्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना, स्टैंड अप इंडिया, उज्जवला योजना प्रमुख हैं। आधारभूत विकास के लिये सागरमाला योजना, सरहद विकास योजना, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, जलपरिवहन योजना घोषित की गयी।
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अलग अलग योजनाओं की यदि समीक्षा की जाए तो हम पाएंगे कि कुछ योजनाएं देश में पहले से चल रही थी परंतु मोदी सरकार ने इन योजनाओं का नाम बदलकर इनकी ब्रंांडिंग बेहतर की तो दूसरी तरफ इन योजनाओं को एक बनी बनायी लीक पर ना चलाकर इन्हें एक अभियान व मिशन का रूप दिया गया। मिसाल के तौर पर देश में ग्रामीण मौद्रिकीकरण के लिये पहले से काम हो रहा था पर जन धन योजना के जरिये इसे एक अभियान का रूप दे दिया गया। इसका नतीजा ये हुआ कि देश में अब तक करीब 22 करोड़ नये बैंक अकाउंट खोले गए और आज की स्थिति में देश में शायद की कोई परिवार बचा हो जिस घर में कोई एक बैंक अकाउंट ना खोला गया हो। इस योजना के जरिये खाताधारकों के मद में किसी भी सरकारी सब्सिडी व किसी तरह का भुगतान बिना किसी अवरोध के संभव हो सकेगा। इस बुनियाद पर सरकार जनधन मोबाइल आधार के त्रिकोण से तमाम योजनाओं का बेहतर क्रियान्वन करने की स्थिति में आ गयी है। देखा जाए तो आधार, प्रत्यक्ष नकद सहायता जैसे कदमों की शुरूआत यूपीए ने ही की थी। परंतु मोदी सरकार ने जन धन एकाउंट खोलवाकर उस योजना को एक दृढ़ आधार प्रदान कर दिया। यहां तक कि रसोई गैस की दोहरी मूल्य नीति यूपीए ने ही शुरू की थी। परंतु मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी से एक करोड़ से ज्यादा अमीर लोगों से रसोई गैस की सब्सिडी छोड़वा कर उस राशि से ग्रामीण बीपीए महिलाओं के लिये फ्री गैस कनेक् शन देने की उज्जवला योजना शुरू कर दी।
जनसुरक्षा योजना देश में तमाम गरीबों के सामाजिक सुरक्षा की एक बेहद जरूरी आवश्यकता थी। इनमे पेंशन, बीमा और दूर्घटना बीमा सभी के लिये प्रावधान लाकर शुरू की गयी जिसके दायरे में अबतक 13 करोड़ लोग जुड़ चुके हैं।
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मेक इन इंडिया कार्यक्रम देश के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में व्यापक निवेश को प्रोत्साहित करने वाली केवल एक दीर्घकालीन योजना ना होकर एक तरह से अभियान है। इस कार्यक्रम का अभी त्वरित लाभ तो हासिल नहीं हुआ है। इस अभियान के मार्ग में अनेक सरकारी अवरोध व प्रतिकुल विदेशी परिस्थितियां भी मौजूद हैं। इस दिशा में मोदी सरकार के लिये मौजूदा वक्त बहुत अनुकूल नहीं है। अन्य देशों की तुलना में भारत में विदेशी निवेश भले ज्यादा आ रहा हो परंतु वह समवेत रूप से अभी भी कम है। देश में अभी विदेशी मुद्रा कोष में करीब एक बिलयिन डालर की कमी आ गयी है। निर्यात की मात्रा काफी घट गयी है। व्यापार घाटा फिर से 4 प्रतिशत के आस पास चला गया है। रक्षा, रेलवे, बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश काफी उदार बनाये जाने के बावजूद भी अभी इसके यथोचित परिणाम सामने नयी आए हैं।
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आदर्श ग्राम योजना एक वृहद स्तर की योजना ना होकर एक सांकेतिक योजना है जो एक माडल ग्रामीण विकास की योजना में भविष्य में तब्दील हो सकती है।
डिजीटल योजना, स्किल इंडिया व स्टार्ट अप योजना मेक इन इंडिया की वृहद योजना का एक हिस्सा है जिसका मकसद देश में सूचना व कौशल विकास की आधारभूत संरचना विकसित कर रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर सृजित करना है। इन सभी योजनाओं का परिणाम दूरगामी ही है। हालांकि मोदी सरकार का दावा है कि देश में अभी तक 3० लाख युवाओं का कौशल विकास हो चुका है तथा डिजीटल इंडिया के तहत देश के दो लाख गांवों को ब्रोडबैंड कनेक्टिीविटी दी जा चुकी है। पर इसके साथ ही यह सुनने में आ रहा है कि स्किल इंडिया के जरिये पैसे की बंदरबांट भी हो रही है।
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देश में स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने तथा छोटे उद्यमियों को उत्साहित करने के लिये मुद्रा बैंक योजना मोदी सरकार का एक यथोचित कदम साबित हुआ है जिसके जरिये इस सरकार द्वारा पहली बार छोटे कारोबारियों को ज्यादा से ऋण सहायता प्रदान क रने के लिये कदम उठाया गया। इसके जरिये अबतक करीब एक करोड़ लोगों ने कारोबार के लिये करीब तीन लाख करोड़ रुपये का लोन लिया है। स्टैंड अप इंडिया देश के अनुसूचित जाति व जनजातियों की उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने के लिये 5०० करोड़ की लागत से शुरू की गयी योजना है जो एक सांकेतिक योजना है।
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प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना जो आगामी खरीफ सीजन से लागू होने वाली है के तहत बताया जा रहा है देश में किसानों के खेती के जोखिम को समुचित रूप से वहन करने के लिये बनायी गयी योजना है जिसमे पहले से कृषि बीमा का दायरा बढाकर इसकी धन राशि 3 हजार करोड़ से बढ़ाकर साढ़े पांच हजार करोड़ रुपये की गयी है। यह योजना किसानों के घावों पर कितना मरहम लगाएगी यह देखना तो बाकी है परंतु मोदी सरकार किसानों के सभी उत्पादों को लागत युकत दाम दिलाने की दिशा में थोड़ा भी टस से मस नहीं हुई है। इसके अलावा किसानों के उत्पादन को सीजन में अति गिरावट से रोकने तथा आफ सीजन में इन उत्पादों की अति वृद्धि से रोकने की दिशा में भी कोई कारगर कदम नहीं उठा पायी है। यही वजह है कि पिछले साल प्याज देश में साठ रुपये किलो तक चला गया वही अब छह रुपये किलो पर आ गया है। आलू सीजन में 3 रुपये किलो तक था जो अब बीस रुपये किलो तक जा चुका है। कृषि जिन्सों की कीमतों में स्थिरता तथा किसानों के लिये कृषि को लाभकारी पेशा बनाने के मामले में मोदी सरकार कुछ खास नहीं कर पायी।  कुल मिलाकर इन तमाम योजनाओं में मोदी सरकार से आशा की कुछ किरणें जरूर जगी है।
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बैंकिंग व वित्तीय मामलों में विफल
एक तरफ यदि हम मोदी सरकार को तमाम सामाजिक आर्थिक योजनाओं की गैर खैराती रवैये को अच्छा कदम मान सकते हैं परंतु इन सभी योजनाओं व कार्यक्रमों क े पीछे का एक बड़ा सच ये है कि ये सभी योजनाएं सरकार के बैंकिंग संस्थाओं के प्रदर्शन पर अवलंबित हैं। खासकर जनधन, जन सुरक्षा, मुद्रा बैंक, स्टार्ट अप, स्टैंड अप योजना। इसमे सरकार के न तो किसी मंत्रालय की, ना तो नौकरशाहों की और ना ही किसी सरकारी विभाग की कार्यदक्षता की परीक्षा हो रही है। सवाल ये है कि आखिर ये सभी योजनाएं हमारी बैंकिग संस्थानों पर निर्भर रहते इन संस्थाओं की कमर तोडऩे वाली साबित क्यों हो रही हैं? क्यों मोदी राज में हमारे सभी राष्ट्रीयकृत बैंक एक एक कर भारी घाटे की ओर उन्मुख हो रहे हैं। पिछले वित्त वर्ष से करीब हर बैंक के तिमाही आंकड़े या तो मुनाफे में भारी गिरावट को प्रदर्शित कर रहे हैं या फिर घाटे को। अभी पिछले दो पखवारे के दौरान देश के करीब सभी बैंक के आंकड़े घाटे की कहानी सुना रहे हैं। इस घाटे की वजह ये बतायी जा रही है कि इन बैंकों के बढ़ते एनपीए के कारण इन्हें इसके लिये मुनाफे की भारी राशि की प्रोवीजिनिंग करनी पड़ रही है। अंदाजा है कि बैंकों की इस तिमाही का कुल घाटा 4० हजार करोड़ रुपये के आसपास चला गया है। सवाल ये है कि मोदी सरकार में बैंकों की एनपीए समस्या लाइलाज क ैसे हो गयी? इसका आकार पाच लाख करोड़ और इसका अनुपात बैंकों की परिसंपत्ति का 6 प्रतिशत तक कैसे पहुंच गया? सवाल है कि इन्ही परिस्थितियों में 9 हजार करोड़ रुपये के कर्जदार यूबी समूह के मालिक विजय माल्या विदेश भागने में कामयाब कैसे हो गए और सरकार मुंह ताकती रह गयी? मोदी सरकार द्वारा नयी बैंक कर्ज वसूली न्यायाधिकरण बनाने की घोषणा जरूर की है परंतु यही सरकार अदानी समूह को एक बैंक विशेष से विशाल कर्जराशि दिलाने में सहायक रही है।
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वित्तीय मामले की बात करें तो इस सरकार के कार्यकाल के दौरान अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के मूल्यों में दो तिहाई तक की गिरावट्र आयी, कोल ब्लाक आबंटन तथा स्पेक्ट्रम आबंटन की नीलामी से से लाखों करोड़ की राजस्व वसूली हुई तथा सब्सिडी बिल मेें भारी गिरावट के बाद इसे अपने वित्तीय घाटे को कम से कम 2 प्रतिशत पर लाने में कामयाब हो जाना चाहिए था परंतु वह नहीं हो पाया। तिसपर सरकार के तमाम बैंक पीएसयू तथा अन्य पीएसयू के घाटों ने इन सभी उपलब्धियों को बराबर कर दिया। ऐसे में मोदी सरकार के आर्थिक प्रदर्शनों को असाधारण कैसे कहा जाए?
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मौलिक सुधारों के मामले में यथास्थिति
निजी तौर पर मोदी सरकार से हमारी अपेक्षा सबसे ज्यादा देश के तमाम हलकों में मौलिक सुधारों को लेकर था। परंतु कुछेक मामलों को छोडक़र मोदी सरकार के काम करने की शैली पुरानी लीक पर चलने वाली ही रही हैं। ये ठीक है कि इस सरकार ने मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सीमम गवर्नेन्स की नीति की बार बार दुहाई दी है। परंतु किसी भी सरकार के असली स्वरूप माने जाने वाली नौकरशाही पर मोदी सरकार का नजरिया मिलाजुलाकर पुराना ही रहा है। यह ठीक है कि इस सरकार ने आजाद भारत में पहली बार बेेकार के कानूनों की समीक्षा की । कुल मिलाकर करीब 1878 फिजूल के कानूनों की पहचान की गयी और इसमे 1175 कानूनों के निरस्त करने का फैसला किया गया। यह एक बेहद बढिय़ा कदम था। परंतु देश में नौकरशाही के सभी मामलों पर मोदी सरकार पुराने सूर व ताल पर थिरक रही है। यही वजह है कि देश में आफिसों की कार्य संस्कृति वही है। प्रधानमंत्री मोदी कहते है कि वे दिन रात मिहनत करते हैं और कभी छुट्टी नहीं लेते। सवाल ये है कि एक मुखिया का काम देश के सभी प्रशासनिक मामलों में एक सिस्टम बनाना है जिससे देश की तीन करोड़ की नौकरशाही देश की जनता के असली सेवक के रूप में काम करे। केवल प्रधान सेवक के चौबीस घंटे काम करने से क्या होता है? जब बाकी सेवक गण जनता के सेवक ना बनकर उनके असल में मालिक रहकर उनके कामों को लंबे समय तक टालते रहें, तबतक काहे का गुड गवर्नेन्स?
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देश की राजनीतिक व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, में मौलिक सुधारों के अनेकों एजेंडे है। यह सही है कि इसमे अनेकों एजेंडे संविधान व कानून में संशोधन से जुड़े है। इसी में जीएसटी कानून अभी करीब एक दशक से झूल रहा है और वह अभी तक राज्य सभा में पारित नहीं हो पाया। फिर बाकी सुधारों की क्या बिसात?
अन्य मौलिक सुधारों में पुलिस सुधार, न्यायपालिका सुधार, चुनाव सुधार, संसदीय सुधार, भ्रष्टाचार का संपूर्ण समाधान, शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र में मौलिक सुधार वगैरह वगैरह शामिल हैं। केवल प्रमाण पत्रों को स्वप्रमाणित करने तथा निम्म वर्ग क ी सेवाओं में साक्षात्कार प्रणाली बंद करने से काम नहीं चलने वाला। उद्योगों में इंंस्पेक्टर राज, ट्रेन में टीटी राज, राजनीतिक दलों में आलाकमान राज, चुनाव में पहचान की राजनीति का राज और मीडिया में सनसनी तथा पक्षपात का राज अभी भी चल रहा है। क्या देश में आरक्षण ही सामाजिक न्याय का केवल प्रतीक है जैसे बिन्दुओं पर मोदी सरकार को न्यायसंगत ठोस फैसले लेने का दमखम दिखाना होगा।
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वादे अमली मामले में लचर
मोदी सरकार ने 2०14 के चुनावों के दौरान कुछ ठोस वादे किये थे। इनमे कुछ वादे सिर्फ प्रतीकात्मक थे जिसे विपक्ष ने भुनाने का प्रयास किया। मसलन विदेश से काला धन आएगा और इससे हर आदमी के अकाउंट में तीन तीन लाख रुपये आ जाएंगे। चुनाव जीतने में भी वैसे ही हर नाजायज चीजें भी जायज मानी जातीे हैं जैसे इश्क और युद्ध में। उत्साह में मोदी ने लोगों को ऐसा बोल दिया होगा। पर असलियत ये है कि एक बार काला धन के रूप में बाहर को जा चुका पैसा बड़ी मशक्कत के बाद भी लाना मुश्किल है क्योंकि दो देशों के बीच की आर्थिक संधियां और अलग अलग प्रत्यर्पण कानून। परंतु मोदी सरकार ने अभी यह केवल तय कर ले अबसे देश से कोई भी काला धन विदेश नहीं जा पाएगा और भारत सरकार की विदेशी कर मशीनरी किसी भी सूरत में इन्हें अपने स्कैनर से दूर नहीं रखेगी। दूसरा हर विदेशी और स्वदेशी काला धन धारक को इसे घोषित कर वैध करना ही होगा।
पर काले धन लाने के वादे की राजनीति से इतर मोदी सरकार ने वन रैंक वन पेंशन लागू करने में जिस तरह से चिल्ल पों की उससे इस सरकार के वादे पूरे करने के जजबे पर सवालिया निशान लग गए। मोदी सरकार को ओआरओपी के लिये महज 8 हजार करोड़ रुपये के इंतजाम करने के वादे को लंबे समय तक टालमटोल के बाद लागू करना पड़ा। मोदी सरकार यूपीए के जमीन अधिग्रहण कानून को पहले संशोधित कर और बाद में उसका इस पर यू टर्न लेना फजीहत का वाहक बना। इससे यह लगा कि यह सरकार कारपोरेट हितों को प्राथमिकता देने वाली सरकार है। मोदी सरकार किसानों के सभी उत्पादों को लाभकारी मूल्य देने को लेकर अभी तक किसी सुगबुगाहट का परिचय नहीं दे रही है। दूसरी तरफ पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अभी भी इस वादे को पूरा करने को लेकर आशावान बने हुए हैं।
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विदेशी मामले में अव्वल
कहावत है कि होनहार बिरबान के होत चिकने चिकने पात। यानी होनहार बच्चे के लक्षण उसके पालने में ही दिखायी देने लगते हैं। मोदी सरकार ने 25 मई, 2०14 को जब पहली बार शपथग्रहण लिया तो उसी समय उसने विदेशी मामले में अपनी पहल का परचम लहराना शुरू कर दिया था। सार्क देशों यानी भारत के सभी पड़ोसी देशों के शासनाध्यक्ष तथा राष्ट्राध्यक्ष शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित थे। मोदी ने भूटान, नेपाल, बांगलादेश, मालदीप तथा पाकिस्तान में नवाज शरीफ के जन्म दिन पर अकस्मात जाकर जिस प्रोएक्टिव रवैये का परिचय दिया वह निश्चित रूप से भारत के अपने पड़ोसी देशों के प्रति एक नये दौर की शुरूआत थी। हालांकि पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद पर रोक नहीं लगाने तथा नेपाल द्वारा अपने नये संविधान द्वारा भारतीय हितों तथा भारतीय मूल के मधेशी लोगों के हितों की अनदेखी करने से दोनो देशों के रिश्ते में खटास आ गयी जो रिश्ते मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्ते में चार चंाद लगा दिये थे और प्रचंड जैसे अनुदार वामपंथी नेता भी जब मोदी के भाषण पर भाव विभोर हुए बिना नहीं रहे।
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मोदी ने अपने दो साल के कार्यकाल में विदेशी मामले में जबरदस्त सक्रियता का परिचय दिया है। जापान, अस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, अमेरिका, रूस, चीन जैसे देशों की सफल यात्राएं आर्थिक मामलों के लिये बेहद अहम थी तो दूसरी तरफ अमेरिका, ब्रिटेन, अस्ट्रेलिया, यूएई में भारतीयों को किये गए संबोधन  विदेशों में भारतीय राष्ट्रवाद का परचम लहराये जाने का प्रतीक था। इससे मोदी द्वारा एनआरआई को भारत में निवेश करने के प्रोत्साहन से जोड़ा जा सकता है।
मोदी की साउदी अरब तथा इरान की यात्रा भारत के स्थानीय अंतराष्ट्रीय राजनीति तथा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की दृष्टि से बेहद अहम रही है। इरान के चबोहर में भारत द्वारा बंदरगाह बनाये जाने का समझौता चीन द्वारा पाकिस्तान के गवादर में बनाये जा रहे बंदरगाह का एक बेहद माकूल व रणनीतिक जबाब रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भारत के गणतंत्र समारोह में मुख्य अतिथि बनाना, यूएनओं के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये की जाने वाली पहल तथा योग को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दिलाना मोदी सरकार का प्रशंसनीय कदम है।
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इसके इतर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तथा वी के सिंह द्वारा मध्यपूर्व में राजनीतिक अशांति के मद्देनजर भारत वंशियों के प्रति जिस तरह से संवेदनशीलता प्रदर्शित की गई और उन्हें त्वरित रूप से भारत लाया गया वह काबिले तारीफ रही हैं। कुल मिलाकर विदेशी मामले पर मोदी सरकार का कार्य अव्वल ठहराया जाना अतिश्योक्ति नहीं माना जाएगा।
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मनोहर मनोज इकोनॉमी इंडिया के संपादक हैं 
राजनीति

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