रंजीत कुमार की कविताएं

1. हाथ से न उठाना तुम 

अब तक मुगालते इश्क़ में था
आज टूटकर बिखरा हूँ मैं,
हाथ से न उठाना तुम
काँच का टुकड़ा हूँ मैं।
जो मुझसे इश्क की चाह रखते हो
झुक कर होठों से उठा लो मुझे,
दर्द अगर मेरा तुम्हें भी सालता हो
अपनी आँखों में आँसू सा सजा लो मुझे।
ये ज़माने हैं फरेब इनकी फिदरत है
तुम आगोश में छिपा लो मुझे ,
खरा हूँ कि खोटा है इमां मेरा
दिल देकर एकबार आज़मा लो मुझे।

 2.  तुम , सपना और सूनापन


मेरी आँखों के सपनों में तुम थी
तुमने अपना फोटो निकाल लिया
फ्रेम सूना पड़ा है।

3. जीवन-कविता सा तुम


रोज सवेरे
तुम्हें आँखों में
कविता सा लिए जगता हूँ
सुबह की दिनचर्या में तुम
स्फूर्ति सा मौजूद रहती हो
कलम की स्याही बन
कविता और ग़ज़ल में
ढलती रहती हो
जीवन की साधना और तपस्या में
सफलता के मूलमंत्र सा
समाहित हो तुम
जर्जर थकान के बाद
विश्राम की बालिश बन
फिर से करती हो
नव उर्ज़ा का संचार
तुम्हें सोचते याद करते
पता नहीं कब कैसे
दिन ढल जाता है
दिनभर बजने वाली घंटियों में
कोई भी घंटी तुम्हारी नहीं होती
पर जीवन में
उर्ज़ा और सफलता का शंखनाद
तुम्ही करती हो
इस रिश्ते की महीन डोर
दिखती नहीं है
पर मज़बूत इतनी कि
बाँधे रहेगी हमदोनों को
जन्म-जन्मांतर तक।

रंजीत कुमार अतिथि प्रवक्ता,सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज

शिक्षा, संस्कृति, साहित्य

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