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अम्बर कुमार चौधरी की कविताएँ

****फूलमंडी****                      

एक ऐसी जगह
जहाँ होता है फूलों का सौदा
एक, दो, तीन या चार नहीं
कई – कई जाति के
फूलों का बाज़ार
यह वही फूल हैं
जो अपने – अपने
निवास स्थान में
पत्तियों और टहनियों के बीच
एक मधुर मुस्कान खिलाती है
यह वही फूल हैं
जिन्हें खुद पता नहीं
कब इन्हें तोड़
एक ऐसी जगह ले जाते हैं
जहाँ सिर्फ हो गैरों की चहल
एक के ऊपर एक लाद
दुकानदार करते हैं सौदा
जिसकी जितनी ताज़गी
उसका उतना मोल
बढ़ गया है मांग फूलों का
इतना कि
खिल जाते हैं फूल
बिन शोर
बिन शोर
देख फ़ायेदा
फूलों के इस बाज़ार का
लगी है बनने ‘मंडी फूलों की’
हर तरफ
हर तरफ
हर तरफ |

 कंडेक्टर

अध खुले आँखों को मसलते हुए
मैं चलता हूं तुम्हारे सफर
ठण्ड की ठिठुरन
सूरज की तपीश
को कर अनदेखा
रख कंधे पर एक झोला
अपने बच्चे को सोते देख
पत्नी को अपने
धीरे से
जा रहे हैं कह
चल देना
मैं चलता हूं तुम्हारे सफर
गाड़ी का स्टार्ट होना
मेरा गेट पर
बांस की तरह खड़े हो
ज़ोर – ज़ोर से मुशाफिरों को
उनकी मंज़िल तक ले जाने का
आवाज़ लगाना
मुशाफिरों को चढ़ाना
मंजिलों पर उतारना
ना – ना गलत सोच रहे हैं आप
मैं कोई समाजसेवी नहीं
मैं तो आप जैसा ही हूं
अपना पेट
अपने परिवार का पेट भरने का
यह मेरा रोज़गार है
मौका मिलते ही मुशाफिरों को
चाचा, चाची, दीदी, भईया
कहकर
हाथ फैला
मानो भिखारियों की तरह
अपने हक़ का पैसा माँगना
कुछ का पैसे दे देना
तो कुछ का
बाद में देंगे
बाद में देंगे
बोलकर टालते जाना
मानो मेरा हक़ ही नहीं
इन पैसों में
दिनभर गेट पर खड़े रह
सूअर का बच्चा, हरामी
ऐसे गालियों का
मेरे कानों को
आदत – सा  हो जाना
देर रात होते ही
गाड़ी से उतर
मैं चलता हूं अपने सफ़र
अपने घर
अध नींद में घर पहुंचना
अपने बच्चे को सोते हुए ही देखना
और
खाना खा
सो जाना |

  जलन 

हाथ में थे झाडू
मुहँ किये बंद
सहे सारी वेदना
आँखें नम

चेहरे पे चमक
मुख पे बोल
हाथों में अब कलम
तो क्यों उनको जलन
तो क्यों उनको जलन

 उत्पत्ति ! नये धर्म की

नये स्थान और नए वेश में
शक्तियों के अहंकारों में चूर्ण
मनुष्यता को भूल
खुशहाल भविष्य का लोभ दिखाकर
करवा दी उत्पत्ति ‘नये धर्म की’ |

     अधेड़ उम्र

आँखों की उसकी ‘वो’ नज़र
हाथों की उसकी ‘वो’ गतिविधियाँ
उसके
सफ़ेद बाल
चेहरे की झुर्रियां
आँख पर उसके
वह मोटा – सा चश्मा
धीमा अपना – सा स्वर
मानो
सब कुछ छुपा दिया
उस ‘अधेड़ उम्र’ का |

        मैं

रंग – विरंगे
चमकीले कपड़ों  में
नंग मैं |
पैर थिरकाती
कमर मटकाती
ज़ुल्फ बिखराती
जाम पिलाती
सबको लुभाती,

नोटों की बारिश में
खुद को अकेला पाती
मैं |

लेखक शोधार्थी हैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में  एवं संपादक हैं  ”उन्मुक्त”  पत्रिका के

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Posted by on Mar 12 2016. Filed under संस्कृति, साहित्य. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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