युवाशक्ति का महाउद्घोष – भाग 1

मनोहर मनोज

आज युवा शक्ति का सर्वत्र उद्घोष ही नहीं बल्कि महा उद्धघोष हो रहा है। परिवारों में, समाज में, मार्केट में, फिल्मी दुनिया में, राजनीति में हर जगह इस वर्ग की दुहाईका मानों एक स्वर्ण काल आभासित हो रहा है। युवा वर्ग की जरूरत, रूचि और पसंद के हिसाब से मार्किट में तमाम प्रोडक्ट की लॉन्चिंग  कर उसका बाजार तैयार कियाजाता है। समाज इस वर्ग को जोश और ज़माने का पर्याय मान कर अपनी दशा और दिशा निर्धारित करना चाहता है। परिवारों की बात करें तो हर परिवार अपने नौजवान सदस्य के ऊपर अपनी परवरिश का समूचा दारोमदार देखता है। और हर युवा अपने माँ बाप के आसरे का सहारा बनने की जद्दोजहद में होता है। फिल्मी दुनियामें युवा मनोभावों को उकेरने और चित्रित करने की पटकथा सबसे अव्वल दिखाई देती है और अंत में राजनीति की बात करें तो दुनिया के सबसे बड़े युवा देश भारत की बहुदलीय और प्रतियोगी लोकतान्त्रिक चुनावी व्यस्था में युवाओ की दुहाई का तो जबरदस्त दौर ही चल रहा है।

 

देश की जनसख्या का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा भारतमें एक बहुत बड़ा वोट बैंक होने के कारण राजनीतिक दलों की सफलता का एक बड़ा पैमाना बन चुका है। पूरी दुनिया में लोग यह मानते है की युवा वर्ग की प्रभावशीलताएक सर्वकालीन, पारलौकिक और दिक दिगंत गुंजायमान अवधारणा रही है। क्योकि मानव सहित हर जैविक प्राणी के आविर्भाव से लेकर अवसान तक तथा जीवन कीहर अवस्थाओ ऐज, फेज और स्टेज में हम जो अपना सफर पूरा करते है उसकी सबसे चमत्कृत और रोमांचक अवस्था युवावस्था ही तो होती है। जन्म और बचपन केबाद आने वाली युवा अवस्था एक ऐसी अवस्था है जो हमारे जीवन, समाज, परिवार, देश और युग सभी को एक निर्णायक मोड़ प्रदान करने वाली साबित होती है। यहअवस्था एक ऐसे मोड़ से गुजरती है जो कही भी मूड़ सकती है। अच्छी दिशा में भी तो बुरी दिशा में भी, अनुशासित प्रवृति में भी तो अराजक प्रवृति में भी, तपोनिष्ठप्रवृति में भी तो ऐययाशी प्रवृतियों में भी, सकारात्मक व रचनातमक प्रवृतियों में भी तो इसके उलट नकारात्मक और विध्वंसक प्रवृतियो में भी, कर्मयोगी के रूप में भीतो कामचोर के रूप में भी, लम्बी रेस के घोड़े के रूप में भी तो शार्टकट तरीके से हासिल करने वाले के रूप में भी।

 

 

एक सुसंस्कृत और भद्र परुष के रूप में भी तो उलट एकअसभ्य और अपराधी प्रवृति के रूप में भी। एक ईमानदार और चरित्रवान के रूप में भी तो इसके उलट बेईमान व भ्रष्ट व्यकति के रूप में भी। एक स्वप्नदर्शी,आदर्शवादी, सिद्धांतवादी और नैतिकवादी व्यक्ति के रूप में भी तो इसके उलट रातो रात बड़ा पा लेने के रूप में भी। कुल मिलाकर इसके मायने ये है की यह अवस्था ऐसीहै जो अंग्रेजी में मेक और ब्रेक के कहावत को चरित्रार्थ करती है।

 

यह एक दुधारी तलवार की तरह है जो एक युवा को सैनिक और सिपाही भी बना सकती है तो दूसरीतरफ  उसे एक दूर्दांत अपराधी भी बना सकती है। यह तो हमारे सिस्टम, समाज और सरकारों का दायित्व है की वह इस युवा वर्ग के जोश, प्रतिभा और जजबे को कौनसा रूप प्रदान करते हैं। क्योकि प्रतिभा तो एक अपराधी में भी होता है और एक सैनिक में भी होता है। प्रतिभा तो एक आतंकवादी विस्फ ोटक बनाने वाले के पास है तोदूसरी तरफ  हमारे रक्षा संस्थान के वैज्ञानिक के पास भी है, केवल रास्ते अलग है। एक वैध रास्ता है तो दूसरा अवैध। एक रास्ता सामाजिक है दूसरा रास्ता असामाजिक है। एक रास्ता कानूनसम्मत है तो दूसरा गैरकानूनी है।

 

अब सवाल ये है की क्या इन सारे परिप्रेक्ष्यों और सामाजिक परिस्थितियों में युवा वर्ग की क्या केवल दुहाई दीजाएगी या इनकी दशा और दिशा का एक व्यापक एजेंडा भी विचारित और निर्धारित होगा। यह सही है की देश काल और परिस्थिति के मुताबिक युवा वर्ग की मानसिकता, प्रवृति और विचारभूमि बदलती रहती है। परन्तु युवावस्था जो एक स्टेज ऑफ़  लाइफ  है उसके पोषण, संस्कार, शिक्षा, प्रशिक्षण और परितोषण की एकतयशुदा नीति भी तो होनी चाहिए। हमारी युवा नीति का तकाजा है की उनके स्वास्थ्य, मन:स्थिति, कौशल निर्माण, व्यक्तित्व और पेशेवर जरुरतो को लेकर हमारे देश में कैसा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार है ।  जारी ………..

 

मनोहर मनोज इकोनॉमी इंडिया के संपादक हैं 

युवा मंच, राजनीति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *