ध्रुव गुप्त की मर्मस्पर्शी कवितायेँ

एक बार फिर माँ

सरसो के खेतों से गुज़र रहा था
थका-हारा
कि पौधों ने पकड़ लिए पांव
कहा – बैठो न दादा दो पल
कोई जल्दी है ?

मैंने थोड़ी जगह बनाई
और लेट गया
दो खेतों की मेड़ के बीच
कुछ देर बातें की हरी पत्तियों
पीले-पीले फूलों से
और फिर आंखें मूंद ली
मैं थका था
पत्तियों ने देर तक दबाए मेरे पैर
फूलों ने सहलाया मेरा चेहरा
हवा ने आहिस्ता चूम लिए मेरे होंठ

ताजा होकर मैं घर लौटा तो
मेरे हाथ में सरसो के ताज़ा फूल थे
मां की तस्वीर के आगे
सरसो के फूल रखकर मैंने कहा –
तू भी मां खूब है
बचपन के बाद आज सीधे
मेरे बुढ़ापे में याद आई तुझे
बेटे के थके,कमजोर बदन पर
सरसो तेल की मालिश ?

 ‘बेवज़ह’

भर रात किस्से गढ़े
कविताएं लिखीं
गुजरे लम्हों को जिया
जो दूर थे
उन्हें कितना याद किया
नींद न आई तब भी

भर रात चांदनी में नहाया
सर्द हवा के थपेड़े सहे
नदी की ठंढी रेत में
भौंचक खड़े रहे
नींद न आई तब भी

भर रात शहर भर घूमा
सड़कों से बोला-बतिआया
रेल की सीटियां सुनीं
सिगरेट पिया, पान खाया
नींद न आई तब भी

सुबह होते ही मैं
इस शहर से चल दूंगा
यह जानते हुए कि
व्यर्थता के अहसास के साथ
यहां रहना है मुश्किल
तो हर कहीं मुश्किल है
नींद अगर नहीं आती है यहां
तो हर कहीं नहीं आती है।

कवि ध्रुव गुप्त, इंडियन पुलिस सर्विस विभाग में कार्यरत हैं 

पटना,(बिहार)
ईमेल-dhruva.n.gupta@gmail.com

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