बहादुर पटेल की कविताएं

 (1) अनगिन
तुम ना एक ऐसा फूल हो

जिसमें कई फूलों का रंग
कई की गंध समेटे हो
कभी सूरज मुखी के फूल सी निहारती हो
कभी ऐसे बिखरती हो कि समेटना मुश्किल हो जाता है
कभी रातरानी के फूल सी
चंपा और चमेली
अनगिनत में एक हो
कौन सी रंगत में कब उतर आओ
कभी कलश पादप के फूल सी
मुझे समो लेती हो पूरी तरह से

मैं घास का फूल
तुम्हारी झोली में गिरा सकता हूँ
अनगिन बीज
उनकी रोटी बना सकती हो
या राबड़ी
यह बड़ा उपहार हो सकता है
भूख के लिए
और मेरे जीवन में तुम भूख की तरह हो

मेरे पास बहुत सी कथाएँ हैं
जिनमें खिलते हैं बहुत से फूल
और तुम जब किस्से में उतरती हो
तो फूल तुममें उतर जाते है
और रोज तुम एक अलहदा फूल मुझे सौंपती हो

मैं ही बस एक गुलमोहर सा जलता रहता हूँ
अपने को मिटते हुए
सिर्फ देखता रह जाता हूँ
और तुम ताली बजाती रहती हो

मेरे भीतर एक वसन्त है
जिसमें तुम एक फूल की तरह हो
तुम्हारा नहीं होना
मेरा और मेरे भीतर के वसंत
का पतझड़ होना है ।

  2  सवाल

 इन जुवार के दानों को देखो

किसान के पसीने की बूँदों से बने हैं ये
पसीना शरीर की भट्टी में तपकर धरता है यह रूप
दरअसल उसके पसीने की हर बूँद
स्वाति नक्षत्र की होती है
जो गिरती है बीज की सीपी में

देखो इनको वह अकेला नहीं खाता
जीव- जंतु और पंछियों को देता है उनका हिस्सा
कुछ अपने परिवार के लिए
कुछ रखता है बीज के लिए
बचा हुआ सब हमें लौटा देता है

अब वो क्या क्या जाने
जमाखोरी
उसे नहीं पता सरकार के गोदाम में
कितना सड़ जाता है हर साल
और कितने लोग मर जाते हैं भूख से

वो तो इतना जानता है
कि कर्ज से दब जायेगा
तो क्या बोयेगा इस धरती की कोख में
हम सबकी भूख वह देख नहीं सकता

और उसकी आखिरी नियति
हम सब जानते ही हैं
यह सब सनद रहे
आने वाली पीढ़ी पूछेगी हमसे सवाल ।

बहादुर पटेल

ई-मेल: bahadur.patel@gmail.com

Top Story, अध्यात्म, नारी - सशक्तिकरण, फिल्म, मनोरंजन, युवा मंच, विचार, शासन, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक, साहित्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *