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सोलह श्रृंगार

ब्रह्माकुमार राम लखन

विभिन्न श्रंगार और अलौकिक ड्रेसेज़ से परमपिता ने हम ब्राह्मण कुल भूषण आत्माओं को सजाया है। तिस पर भी कोई-कोई बच्चे मिट्टी वाली पुरानी-मैली ड्रेस पहन लेते हैं। कभी विश्व कल्याणी, कभी मास्टर सर्वशक्तिवान, कभी स्वदर्शन चक्रधारी की चमकीली ड्रेस पहन सदा चमकते-दमकते रहना चाहिये। गुणों का श्रृंगार कर मस्तक, गले, कान, हाथों पर विभिन्न श्रृंगारों का सेट  सदा धारण किये ही रखना चाहिये। मस्तक की बिन्दी के रूप में आन्नद स्वरूप आत्मा हु। गले के हार के रूप में सदा आनन्द दिलाने वाली बातें ही मुख से निकलनी चाहिये। हाथों के कंगन से सदा कर्मो में आनन्द स्वरूप की स्थिति बनी रहे। कानों का श्रृंगार करने के लिए सदा आनन्द दिलाने वाली बातें ही सुननी व सुनानी चाहिये। कदम-कदम पर आनन्दित रूप का अनुभव करने के लिए सुखमय कार्यों के तरफ ही कदम उठाने हैं। इस प्रकार समय-समय पर अलग-अलग सेट धारण कर सदा ही श्रृंगारी मूर्त बने रहना चाहिए। इतनी सुन्दर-सुन्दर ड्रेसेज छोड़कर कभी देह के सम्बन्ध और पदार्थों वाली मैली ड्रेस पहन बदबू फैलाते तो कभी चमड़ी देखने वाली क्रिमिनल आई की ड़ेस पहने रहते हैं। कभी-कभी तो  दूसरों के अवगुण देखने वाली दागदार ड्रेसों को छोड़ते ही नहीं हैं। कभी-कभी तो आत्म घात करने वाली खूनी ड्रेस भी धारण किये रहते अर्थात् विकर्म करते ही रहते हैं। कोई-कोई आत्मा ही श्रेष्ठ श्रं=गार के सेट धारण करके अपनी सीट पर सदा सेट रहती हैं।

 

अमृत बेले से श्रेष्ठ टाइटिल के ड्रेस धारण कर सद्गुणों से श्रृंगारी मूर्त रहेगें तो ही सतयुगी विश्व महाराजन् की तरह दास-दासियाँ पीछे से ड्रेस उठा कर चलेंगीं। संगमयुगी स्वराजधारी ड्रेस में स्थित होने पर ही पाँचों तत्व व पाँचों विकार अधीन होकर चलेंगे। अगर टाइटिल में टाइट नहीं होंगे तो यही सेवाधारी लूज डेस उतार भी लेंगें। अभी से टाइटिल में सदा टिके रहेगें तो ही सेफ होकर चलेंगे। सेवाधारी भी अधीन होकर चलेंगे। फिर तो दुःखदायी विकार परिवर्तित हो सेवाधारी कहलाएगें। संगमयुगी ड्रेस व श्रृंगार को छोड़ पुरानी ड्रेस का प्रयोग क्यों करते हैं? पुराना लगाव लगने पर ड्रेस पुरानी दिखने लगती है। अमूल्य हीरे तुल्य जीवन को छोड़ फटी-पुरानी ड्रेस में आ जाते हैं। यदि छिपा कर रखी है तो उसे अब जलाकर राख कर दो। बाप-दादा द्वारा दिये हुए दहेज का पूरा-पूरा प्रयोग करो तो ही सदा साथी और दिलतख्त नशीन रहेंगे। उसे छोड़ते ही कभी लोभ तो कभी मोह रूपी फाँसी लग जायेगी। ड्रेस पहनना तो सभी चाहते पर टिप-टाप रहें यह विरले ही जानते हैं। अमृतवेले से सजी हुई सजनियों को ही बाप साथ ले जायेंगे। बच्चों की याद ब्रह्मा बाप को सदा रहती इसलिए वे सारा ही दृश्य शिव बाबा को दिखाते रहते हैं। दुश्मनों को भी सहयोगा-सेवाधारी बनाकर महान बनने वाली आत्माओं को  बाप सलाम करते हैं क्योंकि उनका बाप के साथ-साथ गायन-पूजन होता है।

 

परमपिता के साथ अभी संगम युग पर उच्च भावनाओं को अभिव्यक्त करने के ही  यादगार स्वरूप नव वधु का सोलह श्रं=गार किया जाता है। जैसे भृकुटी के बीच लगायी जाने वाली बिन्दी, आत्मा रूपी तीसरा नेत्र खुले रहने की ही यादगार है। आत्मिक वृत्ति वाला कुमकुम-सिन्दूर भी अभी के ईश्वरीय सुहाग और सौभाग्य का  प्रतीक है। भगवान को सदा नजरों में बसाये रखने की यादगार स्वरूप ही बहुएं सदा काजल लगाये रखतीं हैं। हाथों की मेंहदी का गाढ़ापन उन्नत प्रभु-प्यार को दर्शाता तो शादी के जोड़े में सजी-सजायी रहना और जूडों में सुगन्धित फूलों के गजरा बॉधे रखना निरन्तर ईश्वरीय प्यार व  याद की ही फरियाद करता है। सातवाँ श्रृंगार माँग का टीका जीवन को सही और सीधे रास्ते चलाने और सही निर्णय लेने व मर्यादित जीवन का प्रतीक है। नथ स्वास्थ्य और कर्णफुल बुराई न करने और न सुनने की यादगार में पहने जाते हैं। सोने या हीरे-मोतियों का हार सदा सुहागिन आत्माओं की वचन बद्धता का प्रतीक है। बाजू बंद रूपी ग्यारहवें श्रृंगार से परिवार के सद्गुणों की रक्षा और बुराई पर अच्छाई की जीत मानी जाती है। कंगन से कलाइयां भरी रहना व प्यार भरी अंगुठी पहने रहना प्रभू के अमिट प्यार का प्रतीक मानते हैं। घर की स्वामिनी के रूप में कमर बंद, ईश्वरीय राहों में हिम्मत से सामना करने व अंगूठा प्रभू-प्यार की खुशहाली के रूप में  और पायल की झंकार रूपी सोलहवाँ श्रृंगार सेवा भावना से भागते रहने का प्रतीक  है।

 

लेखक ब्रह्माकुमार राम लखनशान्तिवनआबूरोड (राजस्थान ) से  सम्बद्ध हैं 

 

 

 

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Posted by on Jan 30 2016. Filed under Top Story, अंतर्राष्ट्रीय, युवा मंच, राज्य, विचार, शासन, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक, साहित्य. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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