“देश ने लाल खोया है”

आदित्य कुमार गिरि
पढ़े लिखे लोग ज्यादा निर्मम होते हैं,ज्यादा वस्तुनिष्ठ होते हैं,वस्तुस्थिति को ज्यादा तटस्थ होकर देखने वाले होते हैं, वे आत्महत्या करने लगें तो यह समाज के लिए चिंता करने का समय है।पढ़े लिखे लोग किसी भी समस्या को डिटैच होकर देख सकते हैं।शिक्षा उन्हें मानसिक रूप से ताकतवर बनाती है।जुझारू और संघर्षशील बनती है लेकिन अगर कोई युवा, एकदम यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला युवा,उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा विद्यार्थी अगर तंग आकर,निराश होकर,अपने पीछे अपनी गरीब और लाचार माँ को अकेली छोड़कर आत्महत्या कर ले तो यह परेशान होने वाला समय है।

अब शिक्षा के केंद्र,उसके पैटर्न पर प्रश्न चिन्ह लगाने का समय आ चुका है।ये केंद्र अब विद्यार्थियों को मज़बूत नहीं बना रहे बल्कि वे उन्हें मानसिक रूप से कमज़ोर कर रहे हैं। रोहित की आत्महत्या पर पिछले दिनों से आ रही प्रतिक्रियाओं का गम्भीर अध्ययन कीजिये,यह बेहद परेशान करने वाला अध्ययन होगा।आप यकीनन ‘डिस्टर्ब’ होंगे। अशोक वाजपेयी द्वारा मुद्दे का राजनीतिकरण सबसे परेशान करता है।अशोक जी एक साहित्यकार हैं,कवि हैं।अरविंद केजरीवाल से लेकर राहुल गाँधी तक ने मुद्दे का राजनीतिकरण किया।

नरेंद्र मोदी द्वारा कही बात कि ‘देश ने एक लाल खोया है’ को गम्भीर व्यक्तव्य हैं. रोहित जैसों की आत्महत्याओं को सामाजिक क्षति के रूप में देखा जाना चाहिए और लोग भी इसे ऐसे ही देखें क्योंकि राजनीतिज्ञ इसका इस्तेमाल केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने में करेंगे लेकिन इसकी गहराई को कोई नहीं देखेगा। हाँ,यह वाक्य एक प्रधानमंत्री का है, आप कहेंगे उसका बयान होना चाहिए था कि हम जाँच करेंगे लेकिन उस पीएम ने मुद्दे पर संवेदनशील तरीके से रिएक्ट किया। यह चीज़ एकेडेमिक, राजनीतिक रूप से आपको जरूर पीएम को घेरने के मुद्दे के रूप में दिखे लेकिन मैं उस पीएम के इस बयान को बेहद ‘सीरियस एंगल’ से देखना चाहूँगा।

पीएम मोदी ने देश में एक विद्यार्थी की आत्महत्या को क्षति के रूप में देखा है।वे इसको इसी तरह देख भी रहे हैं। वे हज़ारों बार भारत को युवाओं का देश कह चुके हैं, दुनियाभर में घूम घूमकर भारत की ‘ब्रांडिंग’ की प्रक्रिया में खूब ऊर्जा,खूब उत्साह,खूब शक्ति वाले युवाओं से भरा देश कहते हैं,वैसे देश में उनका एक छात्र मरता है,तब वे दुःखी होते हैं।वे दूसरों द्वारा की गई राजनीति के परे एक अभिभावक की सी भूमिका में रियेक्ट करते हैं।

मैं भी यहीं से परेशान हूँ। आखिर विद्यार्थी क्यों आत्महत्या कर रहे हैं।देश में एक विद्यार्थी की आत्महत्या असल में शिक्षा व्यवस्था की हार है। ध्यान रहे रोहित स्कूल या कॉलेज स्तर का विद्यार्थी नहीं था,वह यूनिवर्सिटी स्तर का विद्यार्थी था।यानी वह देश दुनिया को लेकर एक समझ रखता होगा।वह इस कदर निराश क्यों हो गया कि आत्महत्या कर ली। क्या इसे किसी वीसी या मंत्री या राजनीति से अलग हम शिक्षकों और शिक्षण व्यवस्था(उसके दर्शन) को दोषी के रूप में नहीं देख सकते ??

क्या हैदराबाद विश्वविद्यालय के किसी प्रोफेसर ने रोहित की आत्महत्या को अपनी हार के रूप में देखा ?? क्या किसी प्रोफेसर ने खुद को दोषी माना ?? क्या नरेंद्र मोदी की जगह या उनकी तरह कोई प्रोफेसर भावुक हुआ ?? मैं किसी विद्यार्थी की आत्महत्या को इस एंगल से क्यों न देखूँ ? पारम्परिक शिक्षण में यह अब एक प्रॉब्लम दिख रही है। पिछले दिनों से यह चीज़ देखने में आ रही है कि युवाओं में असन्तोष और क्रोध की जगह निराशा ने घर कर लिया है।’एंग्री यंग मैन’ तो फिर भी ठीक था,पर निराश, नीरस यंग मैन इज़ नॉट गुड।

अब यह चिंता का विषय है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने अगर सुसाइड ही किया है तब हम चिंतित हों।यह चिंता करने का ही समय है। एक इतनी कम उम्र का लड़का,विद्यार्थी,पढ़ा लिखा लड़का,यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति करने वाला,जुझारू लड़का सुसाइड करता है तब यानी शिक्षण संस्थान फेल हो रहे हैं। आप अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि पहले के युवाओं में व्यवस्था से असन्तोष था,गुस्सा था,वह कुछ कर गुज़रना चाहता था,बदलना चाहता था कम से कम सुसाइड तो नहीं करता था। वह व्यवस्था से नाराज़ था, अपना गुस्सा, अपना क्रोध व्यक्त करता था लेकिन इतना कमज़ोर नहीं था कि सुसाइड कर ले।

तो क्या अब शिक्षण संस्थानों पर प्रश्न चिन्ह लगाने का समय है ? क्या शिक्षण के केंद्र विद्यार्थियों को आशावादी बनाने की जगह निराशावादी बना रहे हैं ?? यह जरूर सोचना चाहिए।
आदित्य कुमार गिरि अतिथि प्रवक्ता, हिंदी विभाग,सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज (कलकत्ता विश्वविद्यालय)
ईमेल-adityakumargiri@gmail. com

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