दूरदर्शन के विज्ञापनों का बदलता स्वरुप

रंजना दुबे
अपितु साहित्य समाज का दर्पण है, परन्तु मौजूदा समय में विज्ञापन समाज का दर्पण बन रहा है| मौजूदा भूमंडलीय प्रक्रिया में बाजारवाद के चलते आज विज्ञापन की दुनिया इतनी बहुआयामी और प्रभावी हो गईं है कि वह व्यक्ति के जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है | यहाँ तक की व्यक्ति के मूल्यबोध और और सौन्दर्यबोध भी विज्ञापनी संस्कृति से प्रभावित हो रहें है | वर्तमान पीड़ी भी विज्ञापनी संस्कृति से रागात्मक संबंध स्थापित करती हुई अपने रहन-सहन,जीवनशैली और खान–पान के तौर-तरीके सीख रहीं है | आज के युग में विज्ञापनों का अत्यन्त महत्व है| जूते चप्पलों से लेकर टाई-रुमाल तक हर चीज विज्ञापित हो रही है |लिपस्टिक,पावडर यह तक की नमक जैसी आम इस्तेमाल की वस्तुए भी विज्ञापनों से अछूती नहीं रह पायी है जिस प्रकार सिक्के के दो पहलु है उसी प्रकार विज्ञापन के भी बुरे और अच्छे पहलु है |विज्ञापन अपने छोटे से संरचना में बहुत कुछ समाये हुए हैं |वह बहुत कम बोलकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं यदि विज्ञापनों के इस गुण और ताकत को हम समझने लगे तो अधिकांश विज्ञापन हमारे सामने कोई आक्रमणकारी अस्त्र न रहकर कला के श्रेष्ठ नमूने बनकर उभरेंगे |विज्ञापन की दुनिया को और बेहतर तरीके से समझने के लिए मैंने अपने लेख को कुछ हिस्सों में बाटां है जिसके अंतर्गत विज्ञापन में स्त्रियों की बदलती भूमिका,विज्ञापनकर्ताओं के गुमशुदा व्यक्तित्व की तलाश निश्चित तौर पर विज्ञापन के क्षेत्र में एक नयी दृष्टिकोण को स्थापित करेंगी|

विश्व फलक पर आज विज्ञापन का जो बहुआयामी स्वरुप विकसित हुआ है,उसके पीछे विज्ञापन की एक लम्बी कहानी है | उसकी पृष्ठभूमि विश्व के प्राचीन इतिहास में समाई हुयी है | विज्ञापन के इतिहास के अंतर्गत टी.बी विज्ञापनों पर जोर दिया गया है | विश्व के प्रसिद्ध इतिहासज्ञों और पुरातत्ववेताओं को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि प्राचीनकाल में शासक प्रजा को जिन नियमों से अनुशासित करना चाहते थे, उन नियमों को प्रजा की जानकारी के लिए सार्वजनिक स्थानों पर भित्ति,पटट् आदि पर खुदवा दिया जाता था | इन्हीं सूचनाओं में जगदीश्वर चतुर्वेदी जी विज्ञापन की पृष्ठभूमि तलाशते हैं –“प्राचीन भारतीय समाज में विज्ञापन का लक्ष्य धार्मिक विचारों का प्रचार करना था | सम्राट अशोक के स्तंभों और भित्ति संदेशों,गुफा चित्रों आदि को ‘आउटडोर’ विज्ञापन का पूर्वज कह सकते हैं | ‘इंडोर विजुअल’ सम्प्रेषण कला के पूर्वज के रूप में अजंता, साँची और अमरावती की कलाओं को पढ़ा जा सकता है”1 कुछ लोग मानते हैं कि सन् 1473 ई० में इंग्लैंड में विलियम कैक्ट्सन ने सर्वप्रथम अंग्रेजी भाषा में पहला विज्ञापन एक पर्चे के रूप में प्रकाशित किया | हेनरी सैन्पसन के अनुसार सन् 1650 में सर्वप्रथम विज्ञापन का स्वरुप एक पुस्तक में देखने को मिला, जिसमें चोरी किए गए बारह घोड़ी को लौटाने पर पुरस्कार की घोषणा विज्ञपित के रूप में छपी थी | सन् 1841 में पहली विज्ञापन एजेंसी वाल्नी पाल्मर (Voleny Palmar) स्थापित हो चुकी थी | अमेरिका का पहला विज्ञापन 8 मई,1704 में ‘बोस्टन न्यूज लैटर’ गजट ऑफ़ कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर’ माना जाता है, जिसका प्रकाशन 29 जनवरी,1780 में जेम्स आगस्तस हिक्की के संपादन में कलकत्ता से शुरू हुआ| सन् 1957 में आकाशवाणी ने और 1976 में दूरदर्शन ने व्यावसायिक प्रसारणों का रास्ता साफ़ करके विज्ञापन की दुनिया को आकर्षण रंग-रूप प्रदान किया | टीवी विज्ञापन या टीवी कमर्शियल,जिसे अक्सर बस कमर्शियल, विज्ञापन,ऐड या ऐड फिल्म कहा जाता है का प्रथम प्रसारण 1 जुलाई 1941 को संयुक्त राज्य अमेरिका में किया गया था भारत में सार्वजनिक प्रसारण 1965 से आरम्भ हुआ | विज्ञापन निम्नलिखित प्रकार की है उनमें से प्रमुख है वगीकृत,सूचनाप्रद,राष्ट्रीय,स्थानीय,व्यापारिक |

विज्ञापन की दुनिया आज केवल प्रेस विज्ञापन,रेडियो,टेलीविज़न के विज्ञापन तक ही सीमित नहीं है | फिल्म,टैलेक्स,टेलीफोन,यातायात के साधन आदि ने विज्ञापन का व्यापक क्षेत्र उपलब्ध कराया है | उच्च प्रौधोगिकी ने विज्ञापन को बहुत विस्तार दिया है | आज इंटरनेट विज्ञापन की अलग ही दुनिया है, जिसे ‘वेबवरटाइजिंग’ नाम दिया गया है | इन्टरनेट विज्ञापन, विज्ञापन माध्यमों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है | विज्ञापन के लिए दूरदर्शन पर अनेकों चेंनेल्स आने लगे हैं जो चौबीसों घंटे विज्ञापन दिखाते रहते हैं |

विज्ञापन केवल व्यावसायिक दृष्टी से ही महत्वपूर्ण नहीं है,बल्कि सामाजिक क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है | विज्ञापन कंपनियां विज्ञापन उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के चकर में नैतिकता की सीमाओं का उल्लंघन करने लगती है | इस प्रकार की अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा पर लगाम के लिए विज्ञापन की आचार-संहिता और कानून की व्यवस्था की गई है | आपत्तिजनक विज्ञापनों की शिकायत कोई भी दर्शक भारतीय विज्ञापन परिसद् भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् तथा BCCC SECERETARIAT के समक्ष कर सकती हैं |

आज जहाँ स्त्री विमर्श के अंतर्गत, स्त्री की स्वतंत्रता,आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की बात कहीं जा रही है वही विज्ञापन स्त्रियों के इन रूपों को अपने विज्ञापन में चित्रित कर रहा है | सुधीश पचौरी जी का कहना है कि “विज्ञापनों में नारी की दो छवियाँ ही प्रमुख है | एक गृहणी की और दूसरी आधुनिक मुग्धा नायिका की | मर्द से इस औरत के रिश्ते वही यथास्थितिवादी है | घरेलु सामानों, खाधान्नों, प्रसाधन सामग्री,तेल,घी,घरेलु,उपचार साड़ियाँ,कुकर आदि तमाम चीजों के विज्ञापन में औरतों का गृहिणी उपभोक्ता का रूप प्रमुखतया दिखाया जाता है | यदि विज्ञापित वस्तु से औरत के कार्येक्षेत्र का पता लगाया जाये तो अधिकांश विज्ञापन उसे घर या चौके की महारानी सिद्ध करते हैं | यदि विज्ञापनों की प्रस्तुति देखे तो पायेंगे की किशोरी का कार्येक्षेत्र प्राय: नहाना,सजना-संवरना है और पुरुष को निहारना, उस पर कुर्बान होना है | वह या तो काम में दिन–रात घुटने वाली सेविका या गृहणी, माँ और पत्नी है या फिर पुरुष की तलाश में सजसंवर कर निकली मुग्धा नायिका या अभिसारिका है |”2 सुधीश पचौरी जी का यह तर्क आज के दौर में उस हद तक प्रासंगिक नहीं है जिस हद तक वह तब होती थी जब लिखी गयी थी क्योंकि समाज का बदलता रूप हमलोग कई विज्ञापनों में देख सकते हैं –‘फेयर एंड लवली’ के विज्ञापन में एक पिता अपनी पुत्री के समक्ष एक योग्य लड़का जिसके पास उसकी अपनी गाडी,अपना घर और एक अच्छी नौकरी है का प्रस्ताव रखता है,तब वह लड़की उस प्रस्ताव को ठुकरा देती है क्योंकि अपने निखरे चेहरे के चलते उसमें आत्मविश्वास आता है जिससे वह अपनी आत्मनिर्भरता की बात कहती है जहाँ उसके पास भी अपनी गाडी,घर एवं अच्छी नौकरी होगी तब वह उस लड़के से विवाह करेगी, तब वह समान स्तरिये विवाह होगा | ठीक उसी प्रकार हम BOURNVITA और निरमा सर्फ के विज्ञापन में स्त्रियों के गृहिणी एवं सुधीश पचौरी जी द्धारा व्याख्यायित स्त्रियों की छवि से अलग स्त्री सशक्तिकरणों के सुंदर रूप देख सकते हैं | जहाँ एक माँ अपने बेटे को तैयार करती है जितने के लिए| साथ ही अब घरेलु सामानों का विज्ञापन ख्याति प्राप्त पुरुष वर्ग भी कर रहें है जैसे अभिषेक बच्चन द्धारा प्रेस्टीज कुकर का विज्ञापन हो या फिर अमिताभ बच्चन द्धारा दावत बासमती चावल का विज्ञापन | इन सब के साथ कुछ ऐसे मीडिया पंडित भी है जो मेल प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए सुंदर एवं आकर्षक स्त्री की कामुक छवियों की मदद ले रहें है |

आज विज्ञापन केवल व्यावसायिक दृष्टी से ही अपनी कारगर भूमिका नहीं निभा रहे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी प्रभावकारी माध्यम सिद्ध हो रहे हैं | पारिवारिक और सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर प्रगति एवं परिवर्तन की मुहिम चला रहे हैं | विज्ञापन प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहता है |वह कभी हास्य के माध्यम से,कभी लय के माध्यम से, कभी-कभी भय उत्पन्न करके भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है | विज्ञापन की कलात्मकता एवं सृजनात्मकता इस बात में निहित है कि परिस्थितियों को नए नजरिये से देखने की कोशिश करता है | जिस तरह एक कवि बिम्बों के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करता है | उसी प्रकार एक विज्ञापन भी प्रतीकात्मक रूप से मानवीय इच्छाओं, भावनाओं एवं कामनाओं को स्पर्श करता है | विज्ञापन का इतना व्यापक परिदृश्य एवं महत्वता होने के बावजूद विज्ञापनकर्ता और विज्ञापन लेखक एक गुमशुदा व्यक्तित्व बनकर ही रह गए है | विज्ञापन लिखने वाले एवं विज्ञापन से जुड़े किसी भी व्यक्ति के नामों का जिक्र कहीं भी देखने ,पढ़ने को नहीं मिलता है जो कहीं न कहीं एक वस्तु को प्रमुखता देने के चक्कर में व्यक्ति विशेष की अवहेलना की जा रही है, जो उचित नहीं हैं | क्योंकि विज्ञापन लेखक भी एक साहित्यकार की तरह समाज के नब्जों को टटोलता है फिर जाकर वह इस आधुनिक समाज में फैले स्वकेन्द्रित की भावना से उपर उठकर अपनेपन से भरपूर दादा-पोते के मध्य मधुर सम्बन्ध को ‘सर्फ एक्सेल’ के विज्ञापन के द्धारा एवं दादी-पोते के मध्य स्वाद का वह प्यारभरा सम्बन्ध ‘फार्च्यून’ तेल के विज्ञापन के द्धारा दिखाता है | साथ ही जहाँ राममंदिर एवं बाबरी मस्जिद के कारण हिन्दू–मुस्लिम साम्प्रदायिक विवादों को उत्पन्न करने वाले राजनीतिज्ञों को एक करारा जबाब ‘रेड लेबल टी’ के विज्ञापन के द्धारा देता है | विज्ञापन लेखकों द्धारा ऐसी भावना जिसमें हिन्दू मुस्लिम के मध्य भेद भावना को खतम कर, प्रेम और सौहाद्र की भावना का बीजारोपण दर्शक के मन-मस्तिष्क में किया जाता है | अब हम सब के लिए ये सोचने वाली बात है कि ऐसे व्यक्ति के व्यक्तित्व की गुमशुदगी, विज्ञापन क्षेत्र में हो रहे नाइंसाफी का एक विभत्स रूप है,जिस पर विचार किया जाना चाहिए |

इस तरह से विज्ञापन आधुनिक जीवनशैली और बाजार संस्कृति की बड़ी शक्तिशाली तथा महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहें है | आज विज्ञापन के बिना किसी भी व्यापार का फलना-फुलना असंभव है | साथ ही आज विज्ञापन केवल बिक्री-वृद्धि का साधन ही नहीं अपितु संचार का महत्वपूर्ण माध्यम भी है | किसी भी वस्तु, विचार या सेवा के प्रति उपभोक्ताओं तथा लोगों की निर्णय प्रक्रिया को बदलने की क्षमता से भरपूर विज्ञापनों के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को सभी स्वीकार कर रहें है| क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बाजार में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने के लिए तथा देश में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक जागरूकता लाने के लिए आर्थिक तथा सामाजिक स्तर पर किसी विशिष्ट योजना के विश्वव्यापीकरण के लिए आज विज्ञापनों की भूमिका बहुत प्रभावी हो गयी है | विज्ञापन का इतिहास चिरकालों का एवं विभिन्न माध्यमों का इतिहास है | विज्ञापन का क्षेत्र दिन-प्रतिदिन और विस्तृत होता जा रहा है | विज्ञापन में स्त्रियों के प्रति बदलते सोच को बहुत ही खुबसुरती के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है |

रंजना दुबे हिंदी विभाग,कलकत्ता विश्वविद्यालय में हैं शोधार्थी

Top Story, अर्थव्यवस्था, नारी - सशक्तिकरण, फिल्म, मनोरंजन, युवा मंच, राजनीति, विचार, शासन, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक, साहित्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *