संविधान पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए

मनोहर मनोज

26 नवम्बर को संबिधान तिथि के बहाने संसद में हुए संविधान पर बहस में किसी ने इसका वस्तुनिष्ठ विश्लेषण नहीं किया ,बल्कि प्रधानमंत्री सहित सभी ने इसका भावनिष्ठ विश्लेषण ही किया। इस अवसर पर संसद में संविधान का कोरस तो गाया गया पर उसके बीच के कई दरारों को भरने का कही से कल्पनाशील चिंतन नहीं दर्शाया गया। मेरा कहने का मतलब यह नहीं की हमारा संविधान आदर की पात्रता नहीं रखता, बलिक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के संविधान के तौर पर , दुनिया के सभी लोकतंत्र की अच्छाईयों के सर्वसमावेशी संविधान तौर पर और दुनिया के सबसे बड़े लिखित दस्तावेज के तौर पर हमारा संविधान बेहद आदर का पात्र है। पर यह मान लेना कोई भी कृति, संस्था, विचारधारा देश में हर हमेशा के लिए अटल सत्य है तो यह हमारी घोर नासमझी है। हर चीज देश-काल, परिस्थिति के सापेक्ष ही सही होती है। ऐसे में हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में संशोधन का प्रावधान रख कर एक बेहद दूरदर्शितापूर्ण कार्य किया।

परन्तु सबसे बड़ा प्रश्न ये है की संविधान केवल हमारे पोलिटिकल डोमेन की चीज नहीं है ,इसे हमारी बौद्धिक डोमेन के दायरे से जयादा गुजरना चाहिए। क्योंकि संविधानवाद की परिपार्टी ही बौद्धिकतावाद की ही ऐतिहासिक उपज रही है। ऐसे में संविधान के निर्धारण से लेकर संविधान के संशोधन तक केवल संविधान सभा में शामिल राजनीतिज्ञों तथा विधानमंडलों के सदस्यों के भरोसे संविधानवाद को संचालित करना हमारी इस व्यस्था से सही न्याय नहीं करता।
मिसाल के तौर पर भारत में पिछले 70 सालों में 110 के करीब जो संशोधन लए गए है वे केन्द्रीय व प्रांतीय विधानमंडलों की लम्बी स्वीकृति की प्रक्रिया के तहत हुए। जबकि असल सुधारो का ड्राफ्ट हमारे राजनीतिक दलों के मार्फ़त आ ही नहीं सकता। यही वजह है की हमारे देश में राजनितिक सुधारों का एजेंडा बेहद कछुए के चाल से चला है। यही वजह है की दागी प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने में हमें 70 साल से ज्यादा लग गए।

भारत घोर विभिन्नताओं वाला देश है जहा पहचान के आधार पर लोकतान्त्रिक राजनीती की पूरी गुंजाइश छिपी हुई है। हमारा संविधान इन पहचानो के आधार पर राजनीती को अयोग्य नहीं ठहरा पाया है। दूसरा भारत जैसे विशाल देश में जहा प्रत्यक्ष लोकतंत्र संभव नहीं वहां प्रतिनिधिमूलक व्यस्था के लिए दलीय व्यस्था के तहत आदर्श योग्यता निर्धारित करने को लेकर कोई प्रावधान ही निर्धारित नहीं किया। तीसरा संविधान निर्मित करते समय प्रेस जैसी बड़ी और अपरिहार्य लोकतान्त्रिक संस्था के लिए कही से भी अलग प्रावधान नहीं किया गया। इसे आम लोगों की अभिवयक्ति की स्वतंत्रता के साथ ही टैग कर दिया गया। चौथा न्यायपालिका को भगवान का दर्जा दे दिया गया उसकी आलोचना को गैर कानूनी बना दिया गया। पांचवा भारत में संघवाद का अंतिम निर्धारण नहीं किया गया। यह मानकर चला गया की अनवरत समय तक अलग राज्य बनाने के लिए लोग आंदोलन करते रहेंगे और देश में नए राज्यों का निर्माण होता रहेगा।

इस तरह के अभी अनेकोनेक बिंदु है जो संविधान में बदलाव की मांग कर रह है। अभी भी अनेको सवाल ऐसे है जिसमे हमें अपने संविधान को पुनर्निर्धारित करना होगा। कई ऐसी चीजें हैं जिसके बारे में संविधान में उल्लेख तो है पर वह हमारे समक्ष दरश नहीं होता। मिसाल के तौर अवसर की समानता हमारे संविधान की प्रस्तावना में है पर अवसरों का निर्धारण वंश, पारिवारिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक बैकिंग, शहरी व महानगरीय परिस्थिति, आरक्षण, सिफारिश और अपने कनेक्शन से तय हो रही है। ना समान शिक्षा नीति है ना ही एक समान बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता है और ना ही एक समान संवेदनशीलता का प्रदर्शन। सिस्टम अभिजात है और संविधान या तो इस मामले में उपबंध विहीन है, या तो मौन है या उसका उल्लंघन हो रहा है।
मनोहर मनोज इकोनॉमी इंडिया के संपादक हैं.

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