अरुणा शानबाग का गुनहगार घोर पश्चताप की अग्नि में

अरुणा शानबाग की जिंदगी को नर्क बनाकर उसे 42 साल तक कोमा में पहुँचाने व मौत के मुंह में पहुँचाने वाला सोहनलाल पश्चताप की घोर अग्नि में जल रहा है. गांव में मुफलिस जिंदगी काट रहा सोहनलाल ने वह 27 नवंबर, 1973 की रात किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल (मुंबई) में दरिंदगी वाली घटना को अंजाम दिया था.। उस रात सोहनलाल नामक के इस सफाईकर्मी ने अरुणा शानबाग से दरिंदों जैसी हरकत की.

सोहनलाल ने अरुणा के गले को कुत्तों को बांधने वाली जंजीर से कसकर जबरदस्ती की ऐसा करने से अरुणा के दिमाग में ऑक्सीजन जानी बंद हो गई और पूरा शरीर सुन्न हो गया। सोहनलाल उन्हें मरा समझकर वहां से भाग गया। लेकिन अरुणा को मौत नहीं आई, वो कोमा में पहुंच गईं। उसकी त्रासद जिंदगी ने देश भर में इच्छा मृत्यु पर एक देशव्यापी बहस चलाई और आखिरकार इस माह की 17 अप्रैल को उसने इस जहां को अलविदा कर दिया।
अपराध के लिए सोहनलाल को सात साल की कैद मिली जो उसने पुणे के येरवडा जेल में काटी। रिहाई के बाद वह दिल्ली आ गया और एक अस्पताल में काम करने लगा। उसके बारे में कहा गया कि टीबी से उसकी मौत हो चुकी है। एक टीवी चैनल से बातचीत में उसने कहा कि उसे अपने गुनाह की सजा मिल चुकी है। उसका कहना है कि उसने अरुणा के साथ बलात्कार नहीं किया था। पुलिस ने भी बलात्कार का मामला नहीं बनाया था।

सोहनलाल वाल्मिकी यूपी के एक गांव में है, इस खबर के सामने आने के बाद मीडिया ने उस गांव का रुख कर लिया। सोहनलाल के गाँववाले और परिवार वाले सभी कहते हैं कि सोहनलाल पछतावे का जीवन जी रहा है, पल-पल मरता है. फिलहाल मजदूरी करके अपना पेट पलता है. गांव प्रधान रामपाल सिंह के मुताबिक, ‘सोहनलाल की हालत बहुत बुरी है। वह हर रोज मरता है और अपने किए की सजा भुगत रहा है।’ बीते दिनों महाराष्ट के मराठी दैनिक ‘सकाल’ के प्रतिनिधि ने भी पारपा गांव जाकर सोहनलाल से मुलाकात की। अखबार ने शुक्रवार को विस्तार से इसकी रपट प्रकाशित की है। तब से फिर अरुणा की जिंदगी को नारकीय बनानेवाले सोहनलाल को मिडिया ने नए सिरे से दिखाना शुरू कर दिया है.

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