किसान कैसे करें किसानी ?

 प्रवीण कुमार 

आज भारत में कृषि और किसान लगातार संकट में फंसते जा रहे हैं यह बात दो दशको से उठाई जाती रही है कि कृषि क्षेत्र लगातार कमजोर हो रहा है पर पिछले 65 वर्षो में सरकार की आर्थिक नीतियो में  कृषि को जितना तहरिज देना चाहिए था उतना नही दिया गया। यह कडवी हकीकत कि है कृषि क्षेत्र लगातार कम होता जा रहा हैं 80 फीसदी किसानो के पास एक हैक्टर जमीन ही है हरित क्रांति को 45 साल हो गए लेकिन किसानो की आमदनी बढने की जगह पर लगातार घट रही है। यही वजह है कि किसान कर्जे मे डूब रहे हैं। देश की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हमें कृषि क्षेत्र में 5 प्रतिशत से अधिक विकास दर की आवश्यकता है, जबकि अभी हम इसके आधे से भी पीछे हैं।कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले 15 वर्षों में खाद्यान्न संकट और बढ़ सकता है।

 

आज  सोचने की बात है कि आज से 150 साल पहले भारत के किसान, भारत की कृषि किस हाल में थी। 200 साल पहले खेती और किसान की स्थिति बहुत अच्छी थी तो आज उसकी समस्या क्या हो गई और उसको फिर सुधारने के लिए कौन सा रास्ता हो सकता है। सब जानते हैं कि भारत में खेती और कृषि कर्म बहुत ही उच्च दर्जे का व्यवसाय माना गया है और भारतीय समाज में कृषि कर्म और किसानों के लिए खेती करना केन्द्र बिन्दु रहा है। अभी भी ऐसा कहा जाए कि भारतीय समाज कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ है तो यह ठीक ही है। और जो समाज कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ होता है। उस समाज की अपनी कुछ खास तरह की प्राथमिकताएं होती हैं। खास तरह की जरुरतें होती हैं। भारत का समाज पिछले हजारों सालो से कृषि कर्म को केन्द्र में मानकर चलता रहा, तो इसलिए भारत का समाज कुछ विशिष्ट तरह का समाज है। हमारे यहाँ कृषि की जो प्रधानता रही है। उसके पीछे एक तथ्य यह भी है कि भारतीय मौसम और जलवायु कृषि के काफी अनुकूल है। कृषि के बहुत अनुकूल है।

 

भारत सदियो से एक कृषि प्रधान देश रहा है पर स्वतंत्रता के बाद से आज तक भारत के नीति निर्माताओं की सोच में कृषि को कभी प्रधानता मिली नहीं। उनकी सोच में उद्योग ही शीर्ष पर बने रहे। देश में अच्छे इंजीनियर और डॉक्टर पैदा कैसे हों इस पर तो काफी सोच-विचार हुआ पर अच्छे कृषक कैसे पैदा हों, कृषि भूमि कैसे अच्छी हो, कैसे इसका संरक्षण और सदुपयोग हो, पढ़े-लिखे लोग कृषि में कैसे आएं इस पर सोच विचार कतई नहीं हुआ। कृषि संबंधी हमारी सोच, शिक्षा और शोध का इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है कि लोग डॉक्टरी पढ़ कर अथवा इंजीनिरिंग पढ़कर इंजीनियर तो बनना चाहते हैं पर कृषि में कोई स्नातक स्तर की पढ़ाई करने के बाद शायद ही कृषक बनना चाहता हो!  इसके लिए सबसे अधिक कोई जिम्मेदार है तो वह है हमारी सोच और शिक्षा। कृषि संबंधी हमारी शिक्षा प्रणाली में आज और जो कुछ भी सिखाया जाता हो पर यह प्रशिक्षण कतई नहीं दिया जाता कि कृषि कैसे बेहतर तरीके से की जाती है। कृषि से कैसे बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है।

कृषि के प्रति हमारी सोच कितनी भेदभावपूर्ण है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कक्षा बारह तक हम विद्यार्थी को जीव विज्ञान से लेकर भूगोल तथा गणित से लेकर समाज विज्ञान तो पढ़ाना जरूरी समझते हैं पर भारत के कृषि प्रधान देश होने के तमाम दावों के बावजूद स्कूली स्तर पर छात्रों को कृषि विज्ञान पढ़ाया जाना जरूरी नहीं समझा गया!इसकी संभवत एक ही वजह है कि हमने कृषि कर्म को कभी एक श्रेष्ठ और करणीय कर्म माना ही नहीं। कृषि को हम तुच्छ ही मानते रहे। यही वजह है कि स्वतंत्रता के 67 साल बाद आज हम चिंतित हैं कि कैसे कृषि योग्य भूमि को बचाया जाए। कृषक को आत्महत्या से कैसे बचाया जाए। कैसे प्रति हैक्टेयर उत्पादन बढ़े इस पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत हैं.

 

आज किसानो के सामने सिर्फ समस्या है इसके अलावा कुछ नही। किसानो को कदम कदम पर मुसिबतेा का सामना करना पडता है उन्हे आजादी के बाद लगातार सरकारी नीतियों मे उपेक्षा का शिकार होना पडा है। आज हरित क्रांति के 45 वर्ष होने के बाद भी किसानो की स्थिति दयनिय बनी हुयी है। हरित क्रांति के अतिरिक्त श्वेत क्रांति, पीली क्रांति, गुलाबी क्रांति, गोल क्रांति, नीली क्रांति, सिल्वर क्रांति, सुनहरी आदि क्रांतियों ने अपने देश में कई दशक बीत गये परन्तु किसान की स्थिति में मामुली सुधार की कीरण नही दिखती है।यह सोचने के लिए मजबूर करती है। आज कृषि एक बहुत ही जोखिम भरा काम हो गया है। इसलिए किसान खेती करना छोड़ना चाहते हैं. किसान  पहले  कर्ज लेते हैं फिर फसल लगाते हैं, कभी बारिश नहीं होती तो कभी बाढ़ आ जाती है. अगर फसल अच्छी हो तो फसल की इतनी कीमत नहीं मिलती कि किसान का घर चल सके. इस तरह अनिश्चित मौसम अनिश्चित बाजार और कर्ज का दबाव किसानों पर बहुत भार डाल रहा है जिसकी वजह से वे पूरी तरह थक चुके हैं. वही जीवन के दूसरे खर्चे बढ़ते जा रहे हैं और कृषि से होने वाली आय छोटे किसानों के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है. अतः किसानो की समस्याओ को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

 

ये विडंबना ही तो है कि कभी ब्रिटिश हुकूमत ने कृषि से ही लगान लेकर सालों तक भारत से करोड़ों की कमाई की और उन्ही किसानों ने स्वतंत्रता संघर्ष में उन्हें क्या खूब हराया, लेकिन आज वो कृषक समुदाय स्वयं कृषि से इतना डरा हुआ है कि एक बड़ी सी बारिस और कुछ फसलों का नुकसान उसे आत्महत्या कर लेने पर मजबूर कर दे रहा है आखिर कारण क्या है कहाँ गयी उन हिम्मतगर किसानों की हिम्मत. “व्यवस्था”  और व्यवस्था के “रखवालों” को सोचना होगा.

 

 

प्रवीण कुमार 

 

 

 

 

 

 

 

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