मकसद क्या है आंदोलन धरनों का?

मनोहर मनोज
क्या इनका मकसद इनके अगूआ लोगों क ी नेतागिरी का कैरियर बनाना है या आंदोलित समस्या के बारे में नियामक सत्ता को वाजिब जानकारी देना है। क्या हमारे लिये एक ऐसा फु ल प्रूफ सिस्टम ज्यादा जरूरी नही जो शासक की मनमानियों पर लगाम लगाने के साथ साथ जनसमस्याओं का त्वरित, निरंतर, संवेदी, व्यापक और बुनियादी समाधान कर सके?
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आम तौर से मीडिया और हमारा सुधी संसार जनआंदोलनों, प्रदर्शनों और धरने की घटनाओं को बड़े सकारात्मक और उच्च नैतिक मानदंडों के आधार पर व्याख्यायित करता है। इसकी बड़ी वजह ये है कि इन घटनाओं को विगत में हमारे देश की आजादी के लिये चले लंबे आंदोलनों की पृष्ठभूमि पर देखे जाने के साथ साथ इसे भारतीय लोकतंत्र के एक बड़े हथियार और औजार दोनो रूपों में परखा जाता है। परंतु, जब हम हम इन आंदोलनों और इसके कारकों पर भावपूर्ण होने के बजाए अर्थपूर्ण तरीके से अपनी गहरी निगाह डालते हैं तो पाते हैं कि जन के नाम पर किये गए इन आंदोलनों के वास्तविक सरोकार जनअस्तित्व और जनभलाई से लबरेज नहीं होते हैं। इनका अंतर्निहित मकसद इन आंदोलन के अगुओं को इस प्रतिनिधि लोकतंत्र में नेतागिरी के क ैरियर की तलाश ही प्रमुख होता है। देखा जाए तो भारत में हुए कुछ बड़े आंदोलनों का सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक फलितार्थ अंतत: इनकी नागरिक व्यर्थता की ओर हीं इशारा करता है। इन आंदोलनों का फलसफा इस बात को दर्शाता है कि बौद्धिक मंथन के अभाव में हुए इन आंदोलनों के परवर्ती प्रभाव से भारत में एक तरफ राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा मिला तो दूसरी तरफ इससे देश में सामाजिक व प्रशासनिक उथल पुथल के साथ सतत विकास की प्रक्रिया बाधित हुई।
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1974 में बिहार में हुआ जनआंदोलन जो महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को लेकर तत्कालीन गांधीवादी नेता जेपी द्वारा आहूत किया गया था। इस आंदोलन ने तो अंतत: देश के सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने में मदद की और ये सभी दल जनता पार्टी के एक प्लेटफार्म पर आकर खड़े हो गए। इस आंदोलन की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल घोषित करना पड़ा जिससे देश की जनता और भडक़ उठी और इस आंदोलन की अंतिम परिणति तब आई जब 1977 में हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस की आजादी के बाद पहली बार मुकम्मल हार हुई। भारत में लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों की दृष्टि से तो यह एक बेहतर घटना साबित हुई क्योंकि पहली बार देश की बहुदलीय लोकतंात्रिक व्यवस्था में एक नये दल को शासन में अवसर मिला। परंतु पार्टी के संगठन और गवर्नेन्स की दृष्टि से यह पार्टी और इसकी सरकार बुरी तरह से विफल साबित हुई। नतीजतन ढाई साल के पश्चात ही पुन: क्रांग्रेस सरकार का आगमन हो गया। संपूर्ण क्रांति का नारा एक मजाक बन कर रह गया क्योंकि इसके जरिये बनी सरकार व्यवस्था में परिवर्तन करने की बात तो दूर एक सामान्य व सतत प्रशासन देने में भी विफल रही।
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कुल मिलाकर यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपूर्णता का प्रतीक साबित हुआ। क्योंकि इस आंदोलन के जरिये देश में जो नेताओं की नयी पौध विकसित हुई वह पौध दरअसल दृष्टि विहीन, पहचान की राजनीति में रची बसी होने के साथ सुशासन को गैर प्राथमिकता देने वाली साबित हुई जिसकी परवर्ती रूप में बिहार में पंद्रह साल के जंगल राज के रूप में देखने को मिला।
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भारत में जनआंदोलनों का दूसरा बड़ा प्रदर्शन 2०11 में लोकपाल की मांग को लेकर हुए अन्ना आंदोलन के रूप में देखने को मिला। भ्रष्टाचार के निवारण के बड़े मुद़दे के साथ लड़े गए इस आंदोलन से भी यह बात भली भांति साबित हो गयी कि कुछ लोगों के बेहद हठी रवैये से यह आंदोलन अपना मोकाम हासिल करने में नाकाम रहा और इस बहाने इसमें शामिल कुछ व्यग्र महत्वाकांक्षी लोगों ने अपनी नेतागिरी का कैरियर बनाने के लिये इस अवसर का दूरूपयोग किया और आम आदमी पार्टी का गठन किया। इस पार्टी को दिल्ली राज्य में सरकार बनाने का अवसर भी मिला पर सबने देखा कि इन्होंने रातोरात केन्द्र में सत्ता आने के लिये इस्तीफे की शहादत के आड़ मे 2०14 का लोकसभा चुनाव भी लड़ लिया । इस वजह से दिल्ली को एक साल के अंतराल में दूसरी बार चुनाव का सामना करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर इन जनआंदोलनों से यह बात भली भांति साबित हुई कि महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी का समाधान तो नहीं ही हुआ उल्टा इससे राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक उथल पुथल, प्रशासनिक अनिर्णय और सतत विकास में बाधा बढ़ी। जहां 1977-8० और 1989-99 के अंतराल में देश में घोर राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा वही अब आम आदमी पार्टी के जरिये दिल्ली में राजनीतिक अस्थिरता का दौर परिलक्षित हो रहा है। राजनीतिक अस्थिरता की इस कालावधि में हमारा आर्थिक विकास भी निरंतरता से महरूम रहा।
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इन दलीलों के जरिये मेरा कहने का मतलब यही है कि लोकतंत्र के फैशन के मुताबिक किये गए इन आंदोलनों से लोकतंत्र को धक्का पहुंचा साथ ही जनता को असुविधा और प्रशासन को भी पंगु बनना पड़ा। पर इसका मतलब यह कत्तई नहीं है कि इन आंदोलनों की आलोचना के जरिये मैं किसी निरंकुश और अधिनायकवादी सत्ता तंत्र और भागीदारी विहीन लोकतंत्र का मैं समर्थन करने जा रहा हूं। मैं इसके जरिये वह बात लोगों तक पहुंचाना चाहता हूं जो भारतीय लोकतंत्र को सौ कदम आगे ले जाने वालें साबित हो, वह यह कि इन आंदोलनों का प्रस्फूटन दरअसल हमारे लोकतंत्र की अपूर्णता और संविधान निर्माताओंं की इसकी डिजायनिंग में रखी गई व्यापक  खामियों का नतीजा है। मेरा कहने का ताल्लुक ये है कि इन सारी परिस्थतियों की वजह हमारे विभिन्न सिस्टमों का फुल प्रूफ नहीं होना है। वह सिस्टम जो पहले तो देश की राजनीति को आजादी के दौरान एक लेवल प्ल्ेायिंग यानी एकसमान राजनीतिक परिवेश नहीं दे पाया। दूसरा ऐसा सिस्टम जो सरकारी के असली स्वरूप नौकरशाही की संरचना को ब्रिटिश भारत के शासन की तर्ज पर जस का तस छोड़ गया। तीसरा एक ऐसा सिस्टम जो लोकतंत्र के चारों अंगों की सूचारू कार्यप्रणाली की परिस्थितियों उत्पन्न नहीं कर पाया। एक ऐसा सिस्टम जो देश में चालाक, जानकार और अधिकारवादी लोगों क ो सक्रियता का अवसर तो दे गया पर पर देश के असंख्य, गंवार, अशिक्षित, वंचित और बेजुबान लोगों की समस्याओं की सुनवाई को प्राथमिकता नहीं दे पाया।
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पहले तो हम यह कहना चाहते हैं कि जिस कांग्रेस पार्टी को 1947 में भारत के शासन का कार्य हस्तानांतरित किया गया वह संविधान में प्रस्तावित बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रतिकुल था। कांग्रेस पार्टी चूंकि पहले आजादी की लड़ाई लडऩे वाली पार्टी थी अत:  पहले से देश में इसका संगठन व समर्थन तैयार बना हुआ था। बाकी पार्टियों को देश के लोकतंात्रिक मैदान में नये सिरे से तैयार होना पड़ा। गांधी जी ने कांग्रेस पार्टी को आजाद भारत में भंग करने की सिफारिश इसी को ध्यान में रखकर की थी। अगर देश में सभी तत्कालील दलों मसलन कांग्रेस, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के साथ राष्ट्रीय सरकार बनी होती तो देश का बंटवारा भी नहीं होता और भारतीय लोकतंत्र की स्थापना में देश में राजनीतिक दलों को नये सिरे से स्थापित होने का अवसर प्राप्त होता। मगर ऐसा नहीं हुआ और देश में सभी नये और छोटे राजनीतिक जमातों में एक रोषपूर्ण माहौल पैदा हुआ जिससे देश में आंदोलनों की संस्कृति का बीजारोपण हुआ।
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इसी तरह से नौकरशाही का मूल स्वरूप जस का तस छोड़ दिया गया जो जनता के प्रति उत्तरदायी होने के बजाए ब्रिटिश दौर की तरह उच्च राजनीतिक नेतृत्व के प्रति उत्तरदायी हो गयी। शक्ति पृथक्कीकरण लोकतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत है। इस सिद्धांत के तहत विधायिक सर्वोच्च थी। परंतु इस पर व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका का ही वर्चस्व बना रहा है। विधायिका का इस्तेमाल एक औपचारिकता और एक रूटीन के तहत इस्तेमाल किया जाता रहा। इसी वजह से विधायिका की बैठक एक स्थापित संवैधानिक तरीके से व एक निर्धारित समय के लिये होने के बजाए कार्यपालिका अपने मनमर्जी से इसका कार्यसमय, कार्यतिथि और कार्यसूची तय करती आई है। पूरे साल में देश के सभी क्षेत्रों के लिये महत्वपूर्ण कानून बनाने, इन कानूनों पर विस्तृत विचार मंथन करने, देश की मूलभूत सामाजिक आर्थिक नीतियों को निरूपित करने और देश की तमाम समस्याओं की प्रस्तुति के लिये विधायिका मुश्किल से साल में 7० बैठक भी नहीं कर पाती। कायदे से संसद की बैठक साल में कम से कम 4 महीनें के लिये सुनिश्चित होना चाहिए । केन्द्रीय विधायिक के इतर लोकतंत्र के दूसरे व तीसरे टायर क ी विधायिका तो और भी पंगु बनाकर इनके कार्यपालिकाओं द्वारा बनाकर छोड़ी गयी हैं।
 इसी तरह से मीडिया जो देश की तमाम समस्याओं को कवरेज करने का एक बेजोड़ अंग हेै उसे संविधान के तहत अभी तक चौठे खंभे का आधिकारिक दर्जा नहीं हैं। न्यायपालिका के काम करने का तरीके में व्यापक बदलाव की गुंजाइश है।
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कहीं ना कहीं हमारे लोकतंत्र की अपूर्णता, इसकी डिजायनिंग में रखी गयी खामियों और हमारी तमाम व्यवस्थाओं की संरचना के फुल प्रूफ नहीं होने से देश में तमाम विपर्यय और व्यतिक्रम की स्थिति पनपती रही है। मिसाल के तौर पर संविधान के निर्माता यह नहीं समझ पाए कि भारत एक विविधताओं से भरा देश हैं जहां विभिन्न बोली भाषा, संस्कृति, भूगोल, जाति, धर्म के लोग हैं वहां लोकतंत्र के बहाने पहचान की राजनीति पनपने के कोई भी अवसर नहीं दिये जाने चाहिए। परंतु ये काम नहीं हुआ और हमारे यहां लोकतंत्र लोकतंत्र के बजाए पहचान की राजनीति परवान चढ़ी जिससे हमारे यहां सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के नारे को इससे काफी चोट पहुंची। इससे हमारी स्थापित राजनीति की सारी रीति नीति गुड गवर्नेन्स केंद्रित होने के बजाए प्रतिनिधि लोकतंत्र के प्रबंधन का एक बैटल फील्ड बन कर रह गया।
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गुणवत्ता प्राप्त पब्लिक लीडरशिप का स्थान पहचान व वर्ग पर आधारित भावुक उपादानों पर गढे गए कु छ चंद लोगों ने ले लिया और सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के प्रमुख निर्धारक तत्व सुशासन हमारे अपूर्ण और गलत डिजायन की गयी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था की बली वेदी पर चढ़ता चला आया। देश के असंख्य वंचित लोगों का सशक्तीकरण कु छ चंद पढे लिख्ेा लोगों के राजनीतिक प्रशासनिक आरक्षण के कथित सामाजिक न्याय के नारे के आगे ओझल होता चला गया। कुल मिलाकर यह लोकतंात्रिक व्यवस्था उन्हीं लोगों को सुनने का तंत्र बन कर रह गयी जो जुबान वाले थे, जो चालाक थे, जो पहचान के आधार पर गोलबंद होकर राजनीतिक लाबी से लेकर ट्रेड यूनियन खड़ा कर सकते थे। जो अशिक्षित, गंवार और बेजुबान थे उनके हितों की सुनवाई की इन बिल्ट व्यवस्था इस सिस्टम ने स्वत: स्फ ूर्त मुहैय्या करने के बजाए लंबी प्रक्रिया और उसके परिणामों के भरोसे छोड़ दी। इन सभी परिस्थितियों की वजह से हमारे यहां स्वस्थ सामाजिक राजनीतिक प्रशासनिक गतिविधियां संचालित होने के बजाए बीमार व नकारात्मक परिस्थितियां उत्पन्न होती रही हैं।
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हमारा मानना है कि यदि हमारी व्यवस्था शासन व प्रशासन के हर स्तर पर एक निरंतर और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली विकसित करती ह,ै जिसमे ब्लाक आफिस से लेकर साउथ ब्लाक तक तथा पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक की प्रशासनिक सोपानों के मार्ग में पडऩे वाले सभी जन सरोकारों, सामाजिक सरोकारों और राष्ट्रीय सरोकारों का तार्किक और औचित्यपरक समाधान की विधिवत संंरचना मौजूद हो तो हमें इन निरर्थक आंदोलनों की कोई गुंजाइश हीं नहीं रहेगी। यदि देश में पब्लिक लीडरशिप के लिये ईमानदार, योगय, संवेदनशील, जनसमस्याओं का बेहतर अध्येता, समाज के सभी वर्गों को जोडक़र उनकी कार्य व प्रतिभा के साथ न्याय करने वाले लोगों की एक ऐसी नर्सरी विकसित होती तो इन लोगों को किसी आंदोलनों के भरोसे नहीं रहना पड़ता।
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देश में एक फुल प्रूफ राजनीतिक-प्रशासनिक-नागरिक-सामाजिक व्यस्था के निर्माण के लिये इन सभी क्षेत्रों और इनके उप क्षेत्रों के लिये निरंतर उचित नीतिगत, कानूनगत, संस्थागत, तकनीकी परिवर्तनों को अंजाम देते हुए सभी सेक्टरों का सिलसिलेवार स्थिति प्रपत्र बनाया जा सकता है। चाहे उपरी स्तर पर विधायिका को प्रखर बनाकर हो, न्यायपालिका को त्वरित और तर्कसंगत बनाकर हो, मीडिया को संविधान के जरिये मान्यता देकर निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ, सजग और सर्वसमावेशी बनाकर हो, नौकरशाही को प्रबंधनमूलक बनाकर हो, देश में पब्लिक लीडरशिप की नयी पौध विकसित करने के लेकर हो, देश में गुड गवर्नेन्स के मार्ग में आने वाली सभी कमियों को दूर करने के लेकर हो और सबसे उपर सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता को वास्तविक अर्थों में पहचान की राजनीति का निर्मूलीकरण कर इसे वास्तविक अर्थ देने के रूप में हो और जनता और संगठनों की सभी समस्याअ ों को अलग अलग फोरम पर त्वरित और बुनियादी सुनवाई को लेकर हम एक ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जिससे अर्थ व भाव में गतिरोध पैदा करने वाले कथित जनआंदोलनों पर नकेल कसा जा सकता है जिसमे जन नहीं समाज में उथल पुथल लाकर नेता बनने की शार्टकर्ट रेस मची हुई है। 
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मनोहर मनोज, संपादक इकोनामी इंडिया और संयोजक, भारत परिवर्तन अभियान
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