केन्द्र व राज्यों के बीच पुनर्परिभाषित होते संबंध

मनोहर मनोज
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों में आज कल के न्द्र और राज्यों के बीच पार्टनरशिप की चर्चा खूब की जाती है। अभी अभी देश के उत्तर पूर्व राज्यों की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान भी यह बात प्रधानमंत्री ने प्रमुखता से डठायी। प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि केन्द्र और राज्य विकास के हर मुद्दे पर तू-तू मै-मैं करने के बजाए आपस में गठबंधन करें इससे दोनो का फायदा होगा। देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी का यह सुझाव बेहद उपयुक्त है और इसे सार्वजनिक चर्चा के व्यापक दायरे में भी लाये जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री का यह ख्याल इसलिये भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंंकि अभी वह केन्द्र के मुखिया हैं और इसके ठीक पहले एक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ऐसे में उनका यह सोचना कि केन्द्र और राज्यों के बीच का अंतरसंबंध एक समान समुचित दिशा की तरफ नहीं जाते हैं और इसीलिये दोनों शासकीस निकायों के बीच एक गठबंधन की भावना का आना जरूरी है।
ऐसे में अब सवाल ये है क्या देश की केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच वास्तव में आपस में समन्वय और पूरकता का अभाव है। सवाल ये भी है कि बिना तालमेल के देश में संघीय शासन की व्यवस्था और लोकतंत्र की त्रिस्तरीय संरचना अबतक चल क ैसे  रही थी? और यदि इनके बीच किसी अवरोध की स्थिति भी थी तो पिछले 67 सालों के दौरान इसमें कोई बदलाव क्यों नहीं लाया गया?  और यदि संविधान की सातवीं अनुसूची में संघीय शासन प्रणाली के तहत केन्द्र और राज्य सरकारों बीच अधिकार व कार्यक्षेत्र के बंटवारे को लेकर यदि कोई बाधा थी तो उसे संवैधानिक उपचारों के मौलिक अधिकारों के तहत क्यों नहीं संशोधित किया गया।
 भारत के संविधान निर्माताओं ने जब केन्द्र और राज्यों के बीच शासन के विषयों और उसके विधायी और कार्यकारी शक्तियों का बंटवारा किया तब उन्होंने इस बात का अनुमान नहीं लगाया कि देश में बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत केन्द्र व राज्यों में जब अलग अलग दलों की सरकार बनेगी तब इनके बीच राजनीतिक गतिरोध की संभावना भी उत्पन्न हो सकती है। इस परिस्थिति में केन्द्र भी राज्य सरकार क ो बरखास्त करने के अपने संवैधानिक अधिकारों का दुरूपयोग कर सकता है तथा राज्य सरकारें भी संघवाद का हवाला देकर केन्द्र के लोककल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वन में कोताही बरत सकती है। वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन दरअसल केन्द्र व राज्यों में अलग अलग राजनीतिक निजाम होने की परिस्थितियों में उभरने वाले केन्द्र राज्य गतिरोध की तरफ इशारा करता है।
आजाद भारत में प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के शासन काल में भारतीय लोकतंत्र में आदर्शवाद के तत्व बेहद प्रभावी थे और इसी के तहत केन्द्र ने राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं किया और उन्हें यथाचित सम्मान दिया। परंतु इंदिरा गांधी के शासन काल में तमाम लोकतंात्रिक मानदंडों की मर्यादा का उल्लंघन हुआ और इसी के तहत देश की राज्य सरकारें केन्द्र की कथपुतली बन कर रह गयीं। केन्द्र ने जब चाहा राज्यो की सत्ता का तख्ता पलट किया जब चाहा वहां का निजाम बदल दिया। कांग्रेस की यह परिपार्टी अटल बिहारी बाजपेयी के एनडीए शासन काल में पहली बार बदली। हकीकत में इस दौरान केन्द्र ने राज्यों में जिस पार्टी की सरकार हो उसके साथ भेदभाव नहीं किया और ना ही किसी प्रदेश का तख्ता पलट किया। हालंाकि इस दौरान कुछ भाजपा शासित राज्यों में कंाग्रेस पार्टी की तर्ज पर केन्द्र से मुख्यमंत्री बनाकर राज्यों में जरूर भेजे गए। परंतु बाजपेयी सरकार ने राज्यों को उनका हक देने में कोई कोताही नहीं की साथ ही इस सरकार ने अपने इस कार्य के लिये किसी तरह से श्रेय लेने का ढि़ंढ़ोरा भी नहीं पीटा।
पिछले यूपीए कार्यकाल की बात करें तो इस दौरान 199० के पूर्व की कांग्रेस सरकारों के तर्ज पर राज्यों के साथ भेदभाव तो नहीं हुआ परंतु कुछ कुछ मामलों में केन्द्र ने गैर कांग्रेस शासित राज्यों के साथ भेदभाव करने में भी कोताही नहीं बरती। साथ हीं यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया अपनी चुनावी भाषणों में राज्यों को दी जाने वाली केन्द्रीय मदद की यह कहकर बारबार दुहाई दी जाती थी मानों केन्द्र ने ऐसा कर राज्यों पर अहसान करता हो। मोटे तौर पर देखा जाए तो कांग्रेस शासित केन्द्र ने राज्यों के हक और उनकी जरूरत का कभी बहुत सम्मान नहीं किया। परंतु केन्द्र और राज्यों के बीच गतिरोध का इतिहास केवल भिन्न राजनीतिक दलों के शासन में रहने की सूरत में पनपा हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। हकीकत ये है कि एक दल की केन्द्र व राज्य में सरकारें होने के बावजूद राज्यों में केन्द्रीय सहायता को असंतोष कई बार देखा गया जिसे कई बार उन्होंने वयक्त भी किया । बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को जिस तरह से इंदिरा गांधी ने मुख्यमंत्री का पद नवाजा उसी तरह से उनके द्वारा राज्यों के वित्तीय अधिकारों की तरफदारी किये जाने के वक्तव्य की वजह से उनसे मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन भी ली गयी।
दरअसल देखा जाए तो देश में राज्यों के वित्तीय अधिकार संविधान के तहत बेहद सीमित हैं और इन्हें अपने विकास कार्यक्रमों के लिये केेन्द्र से स्थानांतरित संसाधनों पर हीं मुख्य तौर पर निर्भर रहना पड़ता है। और यह भी सही है कि केन्द्र में पदारूढ़ सरकारें इस मसले पर पक्षपातपूर्ण रवैया भी अपनाती रही हैं। बहरहाल भारतीय संविधान में संघीय शासन व्यवस्था के प्रावधानों की अपूर्णता का विशलेषण करने के पूर्व केन्द्र व राज्यों के बीच की शासकीय संरचना की सीढीयों को व्यवस्थित करने के मार्ग की कौन कौन सी बाधाएं है उसे देखने का हम प्रयास करते हैं।
केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों व अधिकारों के बंटवारे की वस्तुस्थिति ये है कि दोनो संवैधानिक निकायों में अपने अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा आसक्ति हैं बजाए कि उनमें किसी कार्यक्रम के क्रियान्वन की सुविधाजनकता को ध्यान में रखने के प्रति। मिसाल के तौर पर विदेश, रक्षा और मुद्रा जैसे मसले केंद्र के पास हाने में कोई हर्ज नहीं है। परंतु विकास जनित तमाम मसलों को राज्यों के जिम्मे रखने में भी कोई हर्ज नहीं है। विकास संबंधी कामों में केंद्र द्वारा राज्यों में बार बार टंाग अड़ाया जाना कार्यक्रम के क्रियान्वन में देरी व तमाम तरह की पेचीदिगियां उत्पन्न करता है। गौरतलब है कि देश में विकास कार्यक्रमों को लेकर लगभग 2०० योजनाएं केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित है और इसका पूरा खाका भी केन्द्र सरकार निर्धारित करती है। इसमे केन्द्र और राज्यों के बीच की वित्तीय हिस्सेदारी भी वही निर्धारित करती है। परंतु इन योजनाओं के क्रियान्वन का कार्य असल में राज्य सरकार और उसकी मशीनरी के जिम्मे होता है। हालंाकि देखा जाए तो बहुत सी योजनाएं ऐसी है जिनका क्रियान्वन स्थानीय स्वशासी इकाईयों के मार्फत ज्यादा बेहतर हो सकता है। परंतु इन तीनों टायर के बीच प्रदत्त शक्तियों और उसके उपयोग को लेकर इनके अपने अपने अहंकारी भाव योजनाओं के लागू करने के मार्ग के अड़चनों का बेहतर समाधान नहीं निकाल पाते हैं। आज यह बात बड़ी जरूरी है कि देश में चलायी जा रही सभी सामाजिक आर्थिक योजनाओं की एक बेहतर पुनर्समीक्षा हो और इसके क्रियान्वन की तमाम परिस्थितियों का अवलोकन कर उनके क्रियान्वन की ऐसी आधारभूमि निर्मित हो जिससे कि इनमें समयबद्धता, सुचारूपन, सटीकता का घ्यान रखा जाए। इन योजनाओं की निर्णय प्रक्रिया में सभी तरह की पेचीदिगियों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पचड़ों तथा डिलीवरी मेकानिज्म के छिद्रों का त्वरित निष्पादन हो ना कि केेंद्र और राज्य सरकारें  इनको लेकर एक दूसरे पर तमाम तरह के दोष मंढ़ते रहें।
आम तौर पर हम देखते है कि केंद्र की तरफ से राज्यों पर यह आरोप लगाया जाता है कि केन्द्र के पैसे का वह सदुपयोग नहीं करते हैं। वे केन्द्र की राशि को समयबद्ध तरीके से खर्च नहीं करतें। राज्यों की क्रियान्वन मशीनरी नाकाबिल है वगैरह वगैरह। इसी तरह राज्य सरकारें केंद्र पर सौतेला व्यवहार दर्शाने, राजनीतिक बदले तथा उपेक्षा दिखाने और राज्यों सरकारों के प्रस्तावों को केन्द्र द्वारा लटकाये रखने व इन्हें टालने का आरोप लगाया जाता है।
पर देखा जाए तो केन्द्र और राज्यों के बीच के इन परस्पर आरोपों के राजनीतिक मायने ही ज्यादा हैं। इसमे असली अड़चन संवैधानिक है जिसने राज्यों को वित्तीय मामले में पंगू और केन्द्र पर अत्यधिक निर्भर बना दिया है। इतना हीं नहीं कार्यक्रमों के क्रियान्वन के मामलों में राज्य केन्द्र नियंत्रित प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों पर ज्यादा निर्भर करते हैं।
आज यह  बड़ा महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री मोदी के इस केन्द्र राज्य पार्टनरशिप केआह्वान के बाद केन्द्र राज्य के बीच की शासकीय प्रशासकीय संरचना और इसके बीच के सत्ता तंत्र की सीढी का व्यापक अवलोकन हो। इस बारे में एक राष्ट्रीय स्टेटस पत्र जारी किया जाए और इस आधार पर संविधान में संशोधन की रूपरेखा निर्धारित की जाए।
प्रधानमंत्री मोदी यह चाहते हंै कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश की  सभी राज्य सरकारें उनके शासकीय फैसलों का बेहतर अनुसरण करें इसलिये उन्होंने शायद राज्यों के लिये साझेदार जैसे आदरसूचक शब्द का उपयोग किया है जो शब्द दो संप्रभु देशों के बीच ज्यादा उपयुक्त लगते हैं। परंतु केवल इतना भर कह देने से काम नहीं चलेगा। उन्हें कम से कम सेवा कर जो राज्य नियंत्रित वस्तु कर का सहयोगी कर है उस पर केन्द्र द्वारा वसूली जाने वाली समूची राशि राज्यों को स्थानांतंरित करने की पहल करनी चाहिए।  जिस तरह से देश की भूव्यवस्था, कृषि व्यवस्था, जलसंसाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पुलिस जैसे मसलों को पूरे तौर पर राज्य सरकारों के जिम्मे छोड़ा गया है ऐसे में इन सभी की वित्तीय जरूरतों के लिये भी राज्यों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास किये जाने चाहिए। देश के ऐसे तमाम कानून है जिसमें केन्द्र व राज्यों के बीच की ओवरलैपिंग यानी दोहराव स्थिति है इसे हटाने तथा शासन कार्य में दोनो के बीच समन्वय लाने में होने वाली कठिनाइयों का पूरा पूरा ब्योरा पब्लिक डोमेन में लाया जाना चाहिए। इसके साथ ही इस बात की भी जरूरत है कि राज्य सरकारों के कई कार्यों को भी तीसरे टायर को स्थानांतरित करने का प्रयास होना चाहिए जिससे देश में गुड गवर्नेन्स के मार्ग में आने वाली तमाम बाधाओं का त्वरित समाधान हो और सामाजिक आर्थिक विकास के कार्यक्रमों को बेहद द्रूत गति से बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हो सके। देश में उपर से नीचे तक तक के तंत्र में ऐसा कहीं नहीं महसूस होना चाहिए कि वे अपने शासकीय कार्य को अंजाम देने में थोड़ा भी असहज और घूटन महसूस कर रहे हों।
इन सारे मामले का लब्बोलुआब ये है कि देश में संघीय शासन और त्रिस्तरीय लोकतंत्र की पुनसंरचना इस तरह से की जाए जिससे देश सामरिक और अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक मजबूत राष्ट्र के रूप में दृष्टिगोचर हो, प्रादेशिक तरीके से संतुलित व सामाजिक आर्थिक विकास का लक्ष्य त्वरित रूप से हासिल हो रहा हो और स्थानीय जनसमस्याओं की द्रूत गति से सुनवायी संभव हो। अगर प्रधानमंत्री मोदी इन उद्येश्यों के साथ केंद्र राज्य पार्टनरशिप का नारा आगे बढा़ते हैं तो वास्तव में देश के शासन, प्रशासन और गुड गवर्नेन्स के लक्ष्य को सबसे बड़ा और पहला वास्तविक संबल प्राप्त होगा। परंतु केन्द्र राज्य संबंधों को पुनरपरिभाषित करने के सवाल पर अभी किसी भी सुझाव को आखिरी मान लेना भी उचित नहीं होगा।
मनोहर मनोज इकोनौमी  इंडिया के संपादक है. 
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