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दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटिया का 157 वर्ष

आज 16 नवम्बर को भारतीय गिरमिटिया श्रमिकों को दक्षिण अफ्रीका में 157 वर्ष पुरे हो चुके हैं, उन्होंने अपने लगन और परिश्रम से जो बीज वहां बोये वो आज वहां खूब पुष्पित, पल्ल्वित और सुगन्धित हो रहा है. भारतीय आज वहां अपने देश की संस्कृति और सभ्यता के साथ सफलता के सोपान को छू रहे [...]

November 16th, 2017 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,विचार,शासन,संस्कृति,सामाजिक | Read More »

एशिया के त्रिदेव: भारत-जापान-चीन

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डॉ अजय उपाध्याय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महाशक्तियों की नज़र में भारत एक उभरती एशियाई शक्ति बन चुका है और सैनिक, सामरिक एवं आर्थिक  दृष्टिकोण से भारत ने वैश्विक  स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने की शानदार कोशिश भी जारी रखा है। इसका प्रभाव समय-समय पर कई यद्विपक्षिए मंचों पर देखने को मिलता है।   अभी हाल ही में रूस केकुटनीतिक प्रयास से डोक़लाम विवद को शांतिपूर्ण तरीक़े से ख़त्म कर ब्रिक्स सम्मेलन में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए- तोयेबा जैसे पाकिस्तान पोषित आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाने का प्रयास और म्यांमार यात्रा के बहाने चीन को भी स्पष्ट संकेत देने की भारतीय कोशिश एक सकारात्मक पहल है। बशर्ते सही रणनीति का परिचय देते हुए अन्य देशों को भी इन भारतीय हितों के लिए सहमत किया जा सकें।    वर्तमान में भारत के अलावें एशिया के दो अन्य ताक़तवर देश चीन और जापान है। शक्ति संतुलन और हितों के टकराहट की दृष्टिकोण से ”चीन-जापान” और ”भारत- चीन” में कई सामरिक मुद्दों पर हितों का संघर्ष जगज़ाहिर है। परन्तु जहाँ तक ”भारत-जापान” की बात की जाय तो आज दोनों देशों में काफ़ी नज़दीकियाँ है। इसके पीछे अमेरिकी कूटनीति की बहुत बड़ी भूमिका रहीं है। लगातार घनिष्ट होते पारस्परिक सम्बन्धों में जापानी प्रधानमंत्री  की हाल ही में भारत यात्रा मिल का पत्थर सिद्ध होगा। इसके कोई शक नहीं है कि इन दोनों शक्तियों की नज़दीकियाँ एशिया के शक्ति- संतुलन को भारत के पक्ष में रखेगा और विश्व शांति के लिए शुभ होगा। हालाँकि विभिन्न सुरक्षात्मक चिंताओं एवं आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बावयुद भारत ने चीन को सदैव उचित सम्मान देने की कोशिश की है, लेकिन ड्रैगन चीन की विस्तरवादी नीति और मानसिकता के कारण दोनों के मध्य कहीं ना कहीं आज तक सम्बन्धों को सही मुक़ाम नहीं मिल सका है। इसी तरह चीन और जापान के साथ विवाद के कई वजह आज भी मौजूद है। जैसे दक्षिण चीन सागर के प्रभुत्व की बात हो या कोरियाई प्रायद्वीप में हितों के टकराहट का मुद्दा या फिर सीमा विवाद का प्रश्न। इस ”शक्ति-त्रीकोण” में प्रजातांत्रिक मूल्यों में विश्वास एवं निपुण शासन प्रणालियों  के कारण भारत की पोज़िशनिग बाक़ी के बदलें लगातार मज़बूत हुई हैं।    शुरू से हीं भारत सदैव वैश्विक शांति का अग्रदूत रहा है और विकास के मोर्चे पर अन्य एशियाई देशों के संग कंधे में कंधा मिलाकर चलने का प्रयास करता रहा है। अपने लूक ईस्ट/ ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहद भारत ने सदा से पूर्वी एशियाई देशों के विकास माडल को समर्थन दिया है और साझा सांस्कृतिक एवं धार्मिक मूल्यों के साथ अपनी उपस्थिति को दर्शाया है। इस क्षेत्र में यदि शांति एवं विकास क़ायम रहेगा, तभी एशिया की समृद्धि सम्भव है और इससे भारत को भी मज़बूती मिलेगी। परंतु हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में बढ़ती सामरिक चुनौतियाँ और तनाव ने भारतीय चिंता को बढ़ाया है। इसी तरह पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ते आतंकवाद एवं चरमपंथियों की साज़िश से भारत काफ़ी परेशान रहा है। क्योंकि यें ताक़तें लगातार भारत को कमज़ोर करने की कोशिश में है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत ने इन ग़ैर-राजकीय तत्वों को प्रतिबंधित करने के लिए मोर्चेबंदी जारी रखा है। आज ज़रूरत है कि यदि भारत को एशिया की एक मज़बूत ताक़त के रूप में स्थायी भूमिका निभानी है और अपनी विशिष्ट वैश्विक पहचान क़ायम करनी है तो एक शांतिपूर्ण एशिया के निर्माण में आगे आना होगा और छोटी-बड़ी सभी देशों के साथ समानता के स्तर पर सम्बन्धों का निर्वहन करते हुए सबका साथ-सबका विकास या सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय के नैसर्गिक न्यायपूर्ण व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रयासरत रहना होगा।   विश्व फलक पर विशिष्ट पहचान क़ायम करने की भारत की विदेश नीति निरंतरता के साथ सदैव परिवर्तन के दौर से गुज़री है। अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सद्भाव के साथ एक प्रजातांत्रिक विश्व व्यवस्था को स्थापित  करना भारत की सैद्धांतिक एवं दूरगामी सोंच है। परंतु विगत कुछ वर्षों में विदेश नीति के केंद्र में राष्ट्रीय सुरक्षात्मक ज़रूरतों की अहमियत के साथ-साथ विश्वमंच पर एक शक्ति के रूप में अपनी पहचान क़ायम करना भारत की आवश्यकता है। इस संदर्भ में वैश्विक राजनीति और कूटनीति के स्तर  पर भारतीय नीति निर्माताओं के लिए एक ओर जहाँ कई सामयिक चुनौतियाँ विद्यमान है, यथा- मज़बूत पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान से लगातार मिल रहें बाह्य सुरक्षा का ख़तरा, बढ़ती आतंकवादी वारदाते, आर्थिक गिरावट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगातार गिरती साख का संकट आदि-आदि। वही दूसरी ओर विदेश नीति के संचालन में ऐतिहासिक रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर सम्बद्ध देशों को एक साझा सरोकार के साथ जोड़कर रखना आज बड़ा प्रश्न हैं। यद्यपि विश्व फलक पर भारत ने निरंतर अपनी पहचान क़ायम करने का प्रयास जारी रखा है और इस बावत भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा लगातार विदेशी दौरा जारी है, परन्तु आंतरिक स्तर पर बिना आर्थिक मज़बूती और कोई ठोस कार्यवाही के अन्य देशों के मन मस्तिष्क में भारत के लिए सार्थक लाभ प्राप्त करना मुश्किल है।     (लेखक एसोसिएट प्रोफ़ेसर एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार है) 

September 9th, 2017 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,राजनीति,विचार,शासन | Read More »

ध्रुव गुप्त की मर्मस्पर्शी कवितायेँ

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एक बार फिर माँ सरसो के खेतों से गुज़र रहा था थका-हारा कि पौधों ने पकड़ लिए पांव कहा – बैठो न दादा दो पल कोई जल्दी है ? मैंने थोड़ी जगह बनाई और लेट गया दो खेतों की मेड़ के बीच कुछ देर बातें की हरी पत्तियों पीले-पीले फूलों से और फिर आंखें मूंद [...]

February 5th, 2016 | Posted in Top Story,पर्यावरण,मनोरंजन,युवा मंच,विचार,शासन,शिक्षा,संस्कृति,सामाजिक,साहित्य | Read More »

कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए लिंग जांच होनी चाहिए : मेनका गांधी

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केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है भ्रूण लिंग परीक्षण पर रोक की बजाय सरकार को इसे अनिवार्य  करना चाहिए ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे की ठीक से मॉनिटरिंग हो सके।हालांकि उन्होंने कहा कि यह उनके निजी विचार है और इस पर चर्चा की जानी चाहिए। मेनका गांधी सोनोग्राफी सेंटर्स द्वारा [...]

February 2nd, 2016 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,युवा मंच,राजनीति,राज्य,विकास,विचार,शासन,शिक्षा,सामाजिक,स्वास्थ्य | Read More »

अमेरिकी चुनाव और मुसलमान: एक सोची समझी रणनीति

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आदित्य कुमार गिरि डॉनल्ड ट्रम्प की मुस्लिम विरोधी रणनीति से भारत में भी कुछ लोग खुश हैं। यकीनन वे लोग मैच्योर तो नहीं हैं। अमेरिका ईसाई मुल्क है। वे ऐसे भी सचेत और कट्टर हैं फिर ट्रम्प यह सब क्यों और किसके लिए कर रहे हैं। आखिर उनकी इस रणनीति का सम्बन्ध किससे है ? [...]

January 31st, 2016 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,अर्थव्यवस्था,युवा मंच,राजनीति,विचार,शासन,सामाजिक | Read More »

बहादुर पटेल की कविताएं

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 (1) अनगिन तुम ना एक ऐसा फूल हो जिसमें कई फूलों का रंग कई की गंध समेटे हो कभी सूरज मुखी के फूल सी निहारती हो कभी ऐसे बिखरती हो कि समेटना मुश्किल हो जाता है कभी रातरानी के फूल सी चंपा और चमेली अनगिनत में एक हो कौन सी रंगत में कब उतर आओ कभी [...]

January 31st, 2016 | Posted in Top Story,अध्यात्म,नारी - सशक्तिकरण,फिल्म,मनोरंजन,युवा मंच,विचार,शासन,शिक्षा,संस्कृति,सामाजिक,साहित्य | Read More »

सोलह श्रृंगार

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ब्रह्माकुमार राम लखन विभिन्न श्रंगार और अलौकिक ड्रेसेज़ से परमपिता ने हम ब्राह्मण कुल भूषण आत्माओं को सजाया है। तिस पर भी कोई-कोई बच्चे मिट्टी वाली पुरानी-मैली ड्रेस पहन लेते हैं। कभी विश्व कल्याणी, कभी मास्टर सर्वशक्तिवान, कभी स्वदर्शन चक्रधारी की चमकीली ड्रेस पहन सदा चमकते-दमकते रहना चाहिये। गुणों का श्रृंगार कर मस्तक, गले, कान, [...]

January 30th, 2016 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,युवा मंच,राज्य,विचार,शासन,शिक्षा,संस्कृति,सामाजिक,साहित्य | Read More »

रोहित की आत्महत्या से उठे सवाल

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित की आत्महत्या असामान्य – बर्बर घटना है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामान्य स्थानीय छात्र विवाद को असामान्य बनाकर बुद्धिहीनता और छात्रविरोधी नजरिए का परिचय दिया है। रोहित को आत्महत्या न करनी पड़ती यदि विश्वविद्यालय  ने हठधर्मिता से काम न लिया होता। इस समूचे प्रसंग में हठधर्मिता के अलावा जो [...]

January 26th, 2016 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,युवा मंच,राजनीति,राज्य,विचार,शासन,शिक्षा,सामाजिक,साहित्य | Read More »

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

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January 26th, 2016 | Posted in Top Story,अंतर्राष्ट्रीय,अध्यात्म,अर्थव्यवस्था,खेल-कूद,नारी - सशक्तिकरण,पर्यावरण,पर्सनल फायनेंस,फिल्म,मनोरंजन,युवा मंच,राजनीति,राज्य,विकास,विचार,शासन,शिक्षा,संस्कृति,सामाजिक,साहित्य,स्वास्थ्य | Read More »

किसानों की आर्थिक बदहाली और फलस्वरूप ‘आत्महत्या’

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सारदा बैनर्जी देश में किसानों की आर्थिक बदहाली और उसके परिणामस्वरूप उनकी आत्महत्या की घटनाएं पिछले दो दशकों से एक बहुत बड़ी चुनौती के रुप में सामने आया है। यह बेहद परेशान करने वाली घटना है कि देश का प्रमुख उत्पादक वर्ग एवं देश की अन्नदाता शक्ति गरीबी और आर्थिक तनाव का बुरी तरह से [...]

January 20th, 2016 | Posted in Top Story,अर्थव्यवस्था,पर्यावरण,युवा मंच,राजनीति,राज्य,विकास,विचार,शासन,सामाजिक,साहित्य | Read More »

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